कठिन है रहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो/बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो/तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है/मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो
शुक्रवार, दिसंबर 12, 2008
कफन बेचने वाले से जिंदा छोड़ देने की अपील
कृषि एवं खाद्य संगठन (एफएओ) ने विश्व भर में व्याप्त भुखमरी के बारे में जो आंकड़े जारी किए हैं, उसके अनुसार खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों के कारण दुनिया में करीब एक अरब लोग भुखमरी के शिकार हैं। दुनिया इस वक्त एक तरफ आर्थिक मंदी से जूझ रही है, तो दूसरी तरफ घटती आमदनी और खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों के कारण विकासशील देशों की एक बड़ी आबादी भुखमरी की समस्या से जूझ रही है। चावल और दालों की कीमतों में हुई बढ़ोत्तरी की वजह से इसी साल 11 करोड़, 90 लाख लोग भुखमरी की स्थिति में आ गए हैं। हेती, फिलीपींस और इथियोपिया जैसे देशों में खाने-पीने की चीजों की आसमान छूती कीमतों की वजह से दंगे हुए हैं। भारत ने बढ़ती कीमतों की मार से गरीब जनता को बचाने के लिए निर्यातों पर कुछ हद तक प्रतिबंध लगाए, इसके कारण आयातक देशों में कीमतें बढ़ने लगीं। ये सच है कि संकट की मुख्य वजह मांग और आपूर्ति में बढ़ता फासला है, लेकिन सवाल यह है कि पिछले तीस सालों में खाने-पीने की चीजों के दाम इतनी ऊंचाई पर कभी क्यों नहीं पहुंचे? जब आर्थिक उन्नति के दिन थे, तब तो सहायता जुटाना कठिन होता था, लेकिन अब तो दुनिया बेहद कठिन दौर से गुजर रही है। गरीबों की अब कौन सुने, जब अमीरों की हालत खुद ही खराब है. स्थिति यह है कि दानदाता देश आर्थिक संकट का हवाला देकर अब गरीब देशों को आगे सहायता देने में असमर्थता जाहिर कर सकते हैं। जिससे गरीबी और भुखमरी से पहले से ही काफी परेशान लोगों के आगे और अधिक उपेक्षित होने की आशंका गहराती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी पर गौर करें, तो वर्तमान आर्थिक संकट से गरीब देश सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं और लगभग 50 ऐसे देशों के लिए खतरा सबसे अधिक है, जो केवल कुछ उत्पादों के निर्यात पर निर्भर रहते हैं। गौरतलब है कि अभी दुनिया में दो किस्म के गरीब देश हैं-एक वे जिनके पास तेल और गैस है और एक वैसे देश जिनके पास तेल-गैस नहीं है। गरीब देशों में इधर विकास भी हुआ, लेकिन ये विकास लगभग पूरी तरह केंद्रित रही केवल तेल और खनिज के निर्यात करने वाले देशों के लिए जिनमें अंगोला, सूडान और इक्वेटोरियल गिनी जैसे देश आते हैं। मगर दूसरे कमजोर देशों में इस बात का खतरा अधिक है कि अगर ऊर्जा के स्रोत और खाद्यान्न महंगे होत चले गए तो और संकट में घिर जाएंगे। गरीब देशों की स्थिति में व्यापक सुधार न होने की एक अहम वजह यह भी है कि विदेशों से जो सहायता दी जाती है, वह सहायता मुख्य रूप से सामाजिक परिवर्तनों के लिए दी जा रही है, न कि गरीब देशों के संरचनात्मक बदलावों के लिए या ऐसे कामों के लिए जिससे उनकी उत्पादन क्षमता और आमदनी बढ़ सके। इसलिए दुनिया इस वक्त जिस भयंकर मंदी के दौर से गुजर रही है उसमें भुखमरी जैसी समस्या से निपटने के लिए व्यापक मानवीय दृष्टि के साथ-साथ धैर्य से वैकल्पिक विकास नीति की ओर अग्रसर होने की जरूरत अब पूरी दुनिया में महसूस की जा रही है।बकौल साहिर लुधियानवी, कफन बेचने वालों से हम जान की भीख मांग रहे हैं, जिन्होंने दुनिया में यह हालत पैदा की है।
रविवार, दिसंबर 07, 2008
इंसानियत के बौने पड़ते जाने का बराबर डर बना रहा
छह दिसंबर एक उदास और नजरअंदाज कर दिये जाने लायक आम तारीख की तरह बीत गया, जो एक बड़ी राहत की बात है। देश-विदेश के अधिकांश आम जनों के लिए हर तारीख की तरह महज एक आम तारीख, मगर इतिहास की स्मृतियों और अस्मिता के घावों को बार-बार खरोंचने की सियासत करने वालों के लिए खास तारीख। आतंकवाद के बढ़ते संजाल के कारण देश इस वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक गंभीर मंथन के दौर से गुजर रहा है, मगर ऐसे दौर में भी क्षेत्रीय, जातीय और धार्मिक संरचनाओं को तार-तार करने वाली वाचाल राजनीति लिहाजों से बिल्कुल परे जाकर निजी स्वार्थों को तरजीह दे रही है। अयोध्या के पूरे घटनाक्रम को लेकर सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं, अपना-अपना पक्ष है और उनके पक्ष-विपक्ष के बीच फंसा हुआ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र निरुपाय-सा लगता है।
नारों, जुलूसों और अतिवादी-अस्मितावादी राजनीति के कारण जब भी दंगे-फसाद होते हैं, आतंकी हमले होते हैं, तो सियासत से मजहब से कोसों दूर देश के दिहाड़ी मजदूर, गरीब कामकाजी वर्ग के लोग ही इसकी बलि चढ़ते हैं। पिछले कुछ समय से विजय और दुख व्यक्त करने वालों के पाटन में पिछले एक-डेढ़ दशक से पिसने वाली गरीब जनता कल भी रोटी के लिए जीवन-संघर्ष करने निकलेगी, मगर मजहब की सियासत के कारण इंसानियत के बौने पड़ते जाने का बराबर डर बना रहा। ताजा जनगणना रिपोर्ट को देखें तो इस देश में स्कूल और अस्पतालों की संख्या से ज्यादा धार्मिक स्थल हैं, मगर और-और धार्मिक स्थलों के निर्माण की अनंत कड़ी अनवरत जारी है। वह सामाजिक ताना-बाना, जिसमें एक के बगैर दूसरे का बिल्कुल काम नहीं चलता था, अब इतिहास बनता जा रहा है। वर्तमान राजनीति का यह सबसे डरावना पक्ष है कि जब अदालतों में लाखों मुकदमे लंबित हैं और सालों से लोग न्याय की बाट जोहते रहते हैं, तब अदालतों और संवैधानिक प्रक्रिया से बाहर सियासत के खुदमुख्तार काजी अपनी शैली में इंसाफ करने में मुब्तिला हैं। छह दिसबंर, 1992 के बाद से आज तक देश के अनेक भागों में, अनेक तरीकों से वे अपने-अपने हिसाब से इंसाफ कर रहे हैं। उनके इंसाफों से घायल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र डिगते आत्मविश्वास और हिलती हुई बुनियाद के कारण संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।
विभाजनकारी राजनीति के कारण पहले देश टुकड़ों में बंटा, पांच लाख लोग तब सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए थे और तकरीबन दस लाख लोग बेघरबार हुए थे। जिसका घाव अब भी बुजुर्गों के सीने में हरा हो जाता है। वक्त का तकाजा यह है कि विजय और दुख व्यक्त करने वालों और उनसे अलग अपनी कथित प्रतिबद्धताओं के कारण उनकी आलोचनाओं में मुब्तिला लोगों को अब भी उस देश के बारे में सोचना चाहिए, जिसमें प्रत्येक नागरिक को निर्भीक, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक तरीके से जीने का हक हो. पता नहीं यह सपना कब सपना से हकीकत में बदलेगा?
नारों, जुलूसों और अतिवादी-अस्मितावादी राजनीति के कारण जब भी दंगे-फसाद होते हैं, आतंकी हमले होते हैं, तो सियासत से मजहब से कोसों दूर देश के दिहाड़ी मजदूर, गरीब कामकाजी वर्ग के लोग ही इसकी बलि चढ़ते हैं। पिछले कुछ समय से विजय और दुख व्यक्त करने वालों के पाटन में पिछले एक-डेढ़ दशक से पिसने वाली गरीब जनता कल भी रोटी के लिए जीवन-संघर्ष करने निकलेगी, मगर मजहब की सियासत के कारण इंसानियत के बौने पड़ते जाने का बराबर डर बना रहा। ताजा जनगणना रिपोर्ट को देखें तो इस देश में स्कूल और अस्पतालों की संख्या से ज्यादा धार्मिक स्थल हैं, मगर और-और धार्मिक स्थलों के निर्माण की अनंत कड़ी अनवरत जारी है। वह सामाजिक ताना-बाना, जिसमें एक के बगैर दूसरे का बिल्कुल काम नहीं चलता था, अब इतिहास बनता जा रहा है। वर्तमान राजनीति का यह सबसे डरावना पक्ष है कि जब अदालतों में लाखों मुकदमे लंबित हैं और सालों से लोग न्याय की बाट जोहते रहते हैं, तब अदालतों और संवैधानिक प्रक्रिया से बाहर सियासत के खुदमुख्तार काजी अपनी शैली में इंसाफ करने में मुब्तिला हैं। छह दिसबंर, 1992 के बाद से आज तक देश के अनेक भागों में, अनेक तरीकों से वे अपने-अपने हिसाब से इंसाफ कर रहे हैं। उनके इंसाफों से घायल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र डिगते आत्मविश्वास और हिलती हुई बुनियाद के कारण संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।
विभाजनकारी राजनीति के कारण पहले देश टुकड़ों में बंटा, पांच लाख लोग तब सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए थे और तकरीबन दस लाख लोग बेघरबार हुए थे। जिसका घाव अब भी बुजुर्गों के सीने में हरा हो जाता है। वक्त का तकाजा यह है कि विजय और दुख व्यक्त करने वालों और उनसे अलग अपनी कथित प्रतिबद्धताओं के कारण उनकी आलोचनाओं में मुब्तिला लोगों को अब भी उस देश के बारे में सोचना चाहिए, जिसमें प्रत्येक नागरिक को निर्भीक, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक तरीके से जीने का हक हो. पता नहीं यह सपना कब सपना से हकीकत में बदलेगा?
बुधवार, दिसंबर 03, 2008
वे हक्का-बक्का कर देना चाहते हैं सबको

ब्रिटेन में रहनेवाली नाईजीरियन मूल के अश्वेत कवि बेन ओकरी 1959 नाईजीरिया में पैदा हुए। बचपन लंदन में बीता, फिर नाईजीरिया लौट गए। थोड़े समय बाद ही स्कालरशिप लेकर ब्रिटेन पढ़ने के लिए आ गए...और फिर यहीं बस गए। ब्रिटेन के अनेक विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट की मानद उपाधि, एक उपन्यास के लिए 1991 में बुकर पुरस्कार, 2001 ब्रिटिश सरकार के ओबीई से सम्मानित। इनके अलावा और अनेक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार।
अंग्रेजी में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध लेखन। अनेक पुस्तकें प्रकाशित। नाईजीरिया के गृहयुद्ध को विषय बनाकर कई उपन्यास लिखे। हाल में उनके लिखे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव संबंधी संस्मरण (संदर्भ-बराक ओबामा) खास चर्चित रहे। इन दिनों ब्रिटेन में रहते हैं। हमारे अग्रज आदरणीय यादवेंद्र जी ने इसे उपलब्ध कराया है और ख्वाब का दर के लिए हिंदी में अनूदित किया है।
अंग्रेजी में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध लेखन। अनेक पुस्तकें प्रकाशित। नाईजीरिया के गृहयुद्ध को विषय बनाकर कई उपन्यास लिखे। हाल में उनके लिखे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव संबंधी संस्मरण (संदर्भ-बराक ओबामा) खास चर्चित रहे। इन दिनों ब्रिटेन में रहते हैं। हमारे अग्रज आदरणीय यादवेंद्र जी ने इसे उपलब्ध कराया है और ख्वाब का दर के लिए हिंदी में अनूदित किया है।
स्वप्न की संतानें
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बेन ओकरी
(अगस्त, २००३ में द गार्जियन में प्रकाशित यह कविता मार्टिन लूथर किंग के प्रसिद्ध भाषण आइ हैव ड्रीम की चालीसवीं सालगिरह पर लिखी यह कविता उन्हें ही समर्पित है। )
उन्हें होगा नहीं अब सब्र
जब तक और ज्यादा न दिया जाए उन्हें
क्योंकि ये संतानें हैं स्वप्न की
ये स्वप्नदर्शी बच्चे
सूरज के सभी रंगों के पहने हैं परिधान
श्वेत और अश्वेत
और वर्णक्रम के सभी रंगों के बच्चे
और स्वप्न के सभी रंगों के बच्चेउ
न्हें होगा नहीं अब सब्र
जब तक और ज्यादा न दिया जाए उन्हें
पर और ज्यादा आखिर चाहते क्या हैं वे?
वे चाहते हैं यह धरती और सितारे
और लुभावना स्वर्ग भी
वे चाहते हैं आजाद होना
वे चाहते हैं आजाद होना
और वे तमाम संभावनाएं भी
जिसे जिसे आजादी देती है जन्म
और साथ ही आजादी की रौब
और अंधेरे खतरे भी
वे चाहते हैं उन्मादी ढंग से प्यार करना
वे नहीं चाहते बंध जाना किसी परिभाषा की गिरफ्त में
वे नहीं चाहते बंध जाना किसी परिभाषा की गिरफ्त में
वे नहीं चाहते खींच दी जाए कोई सीमा रेखा उनके सामने
वे नहीं चाहते याचना करें
मानवीय विस्तार के रास्ते
वे चाहते हैं पूरा-पूरा हक सर्जना का
वे चाहते हैं पूरा-पूरा हक सर्जना का
पृथक दिखने का अप्रत्याशित, उद्दाम या असाधारण होने का
और सीमाओं को जब चाहें लांघ आने का
वे नहीं चाहते अनुकंपा या बंधना सोच के किसी चौखट में
वे नहीं चाहते अनुकंपा या बंधना सोच के किसी चौखट में
वे मुखालफत करना चाहते हैं
खुद अपने खिलाफ भी
वे चाहते हैं खुशी से झूमें, नाचें-गाएं
उन सबके लिए जो खुश नहीं हुए कभी
इस धरती पर आगमन से उनके
वे चाहते हैं सृष्टि के सर्वोत्तम धनों को प्यार करना
संगीत में, कला में और स्वप्न में भी
वे आजादी से हासिल
वे आजादी से हासिल
सबसे ऊंची मंजिल प्राप्त करना चाहते हैं
बगैर किसी बहस-मुबाहिसे के
वे अचानक प्रकट होकर विस्मित कर देना चाहते हैं
जैसे कर देता है कोई देवदूत
वे हक्का-बक्का कर देना चाहते हैं सबको
चुटकी बजाते ही जैसे कर देते कई बार असाधारण जन
वे चाहते हैं पराजित हो जाना हिम्मत हारे बगैर
वे चाहते हैं पराजित हो जाना हिम्मत हारे बगैर
जैसे खोजियों को स्वीकार करनी पड़ती है कई बार नियति
वे चाहते हैं तलाश करना कुछ नया
पूरी सदाशयता से जैसे करते हैं धुनी तीर्थयात्री
उनके लिए होता है न तो बहुत ज्यादा कुछ
और न ही बहुत कम-
सपने देखना यदि यह संभव हो सके मनुष्य से
और पूरा करना उस निस्सीम जीवन के अथाह जादू वाले स्वप्न
इसीलिए तो वे छोड़ देते हैं निर्बिंध आजादी को
कि गाए हर दिन अपने बदलाव का गीत
वे ही हैं इस सृष्टि के नए योद्धा और अधिपति
अब तक के समय की पीड़ा से
और इतिहास के प्रणय से उद्भूत सर्वश्रेष्ठ उत्साह हैं वे-
वे संतानें हैं स्वप्न की
वे संतानें हैं स्वप्न की
और मन या फौलाद की नहीं है बनी ऐसी कोई कारा
जो थामकर नियंत्रित कर सके
अब उन सबके वेग को
धक्के मार कर धराशायी कर दिए हैं उन्होंने लौह कपाट
वे सब के सब
संतानें हैं स्वप्न की।
-हिंदी अनुवाद - यादवेंद्र
सोमवार, दिसंबर 01, 2008
सरकार इस जनता को भंग करके दूसरी जनता चुन ले

मुंबई में देश के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद वहां की आम लोग जहां एनएसजी कमांडो और सुरक्षा बलों की हर कामयाबी पर भारत माता के नारा लगा रहे थे, वहीं जन गण के भाग्य विधाता बने हुए अधिनायकों के प्रति बेहद गम-ओ-गुस्से का इजहार कर रहे थे। देश के जिन पहरुओं पर आतंककारी ताकतों के खिलाफ हरसंभव कड़ी कार्रवाई करने की महती जिम्मेदारी है, वे इसकी जगह प्रत्येक आतंकी हमले के बाद अनुग्रह राशियों की राजनीति करने शहीदों के घर पहुंचकर किसी भी स्थिति को वोट बैंक बनाने के लिए पहुंच जाते हैं। बेहद क्षोभ की बात यह है कि पिछले कुछ सालों से ऐसी राजनीति से तंग आ चुकी जनता में इन दिनों नेताओं को लेकर जितना गुस्सा और आक्रोश है, वह इससे पहले शायद कभी नहीं देखा गया। इस वजह से देश की राजनीति में हड़कंप ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं आई। जब सैकड़ों लोगों की जान चली गई, हजारों अनाथ हो गए, तब जाकर भारत के भाग्य विधाताओं की अंतरात्मा ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए उत्प्रेरित किया। वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकारों ने जिस तरह जनता के आक्रोश पर प्रतिक्रिया जाहिर की है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
राजनीति के इस विकृत रूप का ही परिणाम है कि मुंबई की घटना में अपने इकलौते पुत्र को खो चुके शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने केरल और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों से मिलने से इनकार कर दिया और शहीद हेमंत करकरे की विधवा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सहायता राशि की पेशकश को ठुकरा दिया। हर उम्र और हर वर्ग के लोगों में नेताओं के प्रति इतना अधिक गुस्सा है कि कई और नेता जनता के गुस्से का शिकार हो चुके हैं। मगर धैर्यपूर्वक जनता की भावनाओं को समझने की जगह नेतागण बौखलाहट भरी प्रतिक्रिया में इसे कुछ मुट्ठी भर लोगों की पश्चिमपरस्ती और अराजकतावादी कदम ठहरा रहे हैं। जबकि मीडिया में आम लोगों की प्रतिक्रियाएं जिस तादाद में आ रही हैं, उससे स्पष्ट है कि देशभर की जनता सीधे-सीधे कड़ी और गंभीर कार्रवाई चाहती है, न कि अनंत काल तक इसके लिए सिर्फ आश्वासन। इस वक्त देश की जो स्थिति है, उसको बेहद अहम तरीके से जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की यह कविता अभिव्यक्त करती है :
अखबार का हॉकर सड़क पर चिल्ला रहा था
कि सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है
अब कड़े परिश्रम, अनुशासन और दूरदर्शिता के अलावा
और कोई रास्ता नहीं बचा है
एक रास्ता और है
कि सरकार इस जनता को भंग कर दे
और अपने लिए दूसरी जनता चुन ले।
राजनीति के इस विकृत रूप का ही परिणाम है कि मुंबई की घटना में अपने इकलौते पुत्र को खो चुके शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने केरल और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों से मिलने से इनकार कर दिया और शहीद हेमंत करकरे की विधवा ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सहायता राशि की पेशकश को ठुकरा दिया। हर उम्र और हर वर्ग के लोगों में नेताओं के प्रति इतना अधिक गुस्सा है कि कई और नेता जनता के गुस्से का शिकार हो चुके हैं। मगर धैर्यपूर्वक जनता की भावनाओं को समझने की जगह नेतागण बौखलाहट भरी प्रतिक्रिया में इसे कुछ मुट्ठी भर लोगों की पश्चिमपरस्ती और अराजकतावादी कदम ठहरा रहे हैं। जबकि मीडिया में आम लोगों की प्रतिक्रियाएं जिस तादाद में आ रही हैं, उससे स्पष्ट है कि देशभर की जनता सीधे-सीधे कड़ी और गंभीर कार्रवाई चाहती है, न कि अनंत काल तक इसके लिए सिर्फ आश्वासन। इस वक्त देश की जो स्थिति है, उसको बेहद अहम तरीके से जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की यह कविता अभिव्यक्त करती है :
अखबार का हॉकर सड़क पर चिल्ला रहा था
कि सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है
अब कड़े परिश्रम, अनुशासन और दूरदर्शिता के अलावा
और कोई रास्ता नहीं बचा है
एक रास्ता और है
कि सरकार इस जनता को भंग कर दे
और अपने लिए दूसरी जनता चुन ले।
रविवार, नवंबर 30, 2008
आतंकवाद की राजनीति के बाद अब राजनीतिक आतंकवाद

यह बेहद हैरतअंगेज है कि देश पर हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले से लहूलुहान मुंबई की मुक्ति के बाद महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने इसे छोटी-मोटी घटना बताया, वहीं वस्त्र पुरुष रूप में सरकार की किरकिरी करवा चुके केंद्रीय गृहमंत्री को आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी ओर ऑपरेशन के समय राजनीति के बजाए एकजुटता की बात करने वाली भाजपा ने मुंबई हमले के दौरान दिल्ली चुनाव को ध्यान में रखकर अपने इश्तहारों में राजनीति की और बाद में तो खैर राजनीतिक बयानबाजी करते हुए वह प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर उतर आई। दिल्ली में हुई आतंकी घटना के बाद कांग्रेस पार्टी के अंदर भी केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल की भूमिका को लेकर जबर्दस्त आलोचना शुरू हो गई थी और मुंबई हमले के बाद इसकी जिम्मेवारी से बचना उनके लिए संभव भी नहीं रह गया था। दूसरी ओर जिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के.नारायणन ने दो साल पहले ही यह कहकर सबको चौंका दिया था कि आतंकवादी समुद्र के रास्ते देश पर बड़े हमले की योजना बना रहे हैं, के बावजूद खुफिया स्तर पर आखिर क्यों नहीं कोई कारगर कदम उठाया गया?
आतंकवाद से निपटने के मामले में सरकार की नीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि एक ऐसे नरम देश की बनने लगी है, जिसमें आतंकवाद से लड़ने का वह जज्बा और जुनून नहीं है जो अमेरिका और ब्रिटेन ने दिखाया है। दूसरी ओर बार-बार गृहमंत्री के नीरस और रटे-रटाए बयानों की वजह से लोगों में जो भयंकर जन आक्रोश पैदा हुआ है, उसने तमाम राजनीतिक दलों को इस वक्त सुरक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। इसलिए सत्ताधारी यूपीए सरकार में जब सहयोगी दलों ने भी शिवराज पार्टी की कार्यशैली को लेकर ऊंगली उठाना शुरू कर दिया, तो शायद कांग्रेस के पास दृढ़ता और राजनीतिक दूरदर्शिता दिखाने के लिए इस्तीफे की राजनीति के अलावा कोई और कारगर विकल्प नहीं बचा था। शिवराज पाटिल के इस्तीफे को कांग्रेस अपनी जिन परंपरा में देखने का प्रस्ताव कर रही है, दरअसल वह जिस महान परंपरा की बात कर रही है उतनी नैतिकता की बात करना शायद आज की राजनीति में बेमानी है। एक मामूली रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेकर जिस कांग्रेस पार्टी के निवर्तमान रेल मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया था, उसको इतने आतंकवादी हमलों के बाद जाकर इस्तीफे की परंपरा याद आई?
आदेश मिलने के पंद्रह मिनट बाद ही ऑपरेशन के लिए तैयार एनएसजी के कमांडो अफसरशाही की लेटलतीफी के कारण सुबह पांच बजे मुंबई पहुंच पाए और जब पहुंचे तो वहां उन्हें ऑपरेशन स्थल तक पहुंचाने के लिए न तो कोई वाहन था और न जरूरी चीजें। आपदा प्रबंधन के लिए बढ़-चढ़कर बात करने वाली सरकार की लचर व्यवस्था बार-बार उजागर होती रही है, मगर इसको पहले से क्यों नहीं दुरुस्त किया जाता है? आतंक के सदमे से निस्तब्ध जनता के मन में अनेक सवाल हैं और आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हर राजनीतिक दल उन सवालों को भुनाने की कोशिश में है। नये गृहमंत्री पी.चिदंबरम को हालांकि पहले से गृह मंत्रालय का थोड़ा अनुभव है, लेकिन आतंक के विरुद्ध सरकार क्या रणनीति अपनाती है, लोगों के आत्मविश्वास को कैसे वापस लाती है इसके लेकर नये गृह मंत्री की कार्य-कुशलता को लेकर तमाम लोगों की निगाह उन पर लगी रहेगी।
शुक्रवार, नवंबर 28, 2008
मुंबई की नृशंस घटना पर कराची, पाकिस्तान से हफ़ीज़ चाचड़
पाकिस्तान के कराची शहर में बीबीसी हिंदी सेवा के रिपोर्टर हैं जनाब हफ़ीज़ चाचड़. उन्होंने आज दोपहर हमारे लिए यह लेख लिखकर भेजा है.
इटली से मेरे दोस्त अहमद रज़ा ने फोन कर कहा कि मुंबई में होने वाली अप्रिय घटना नहीं होनी चाहिए थी और जो कुछ हो रहा है, काफ़ी बुरा हो रहा है. उन्होंने मुझे बताया कि पूरी दुनिया के लोग यह सोच रहे हैं कि इसमें पाकिस्तान का हाथ है और इटली सहेत पूरे योरोप में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के या पाकिस्तानी नागरिक अपने आप को दोषी महसूस कर रहे हैं. वे अपना परिचय देते समय पाकिस्तानी कहते हुए डर रहे हैं. उन्होंने यह कह कर फोन बंद कर दिया कि पाकिस्तान और भारत के बीच संबंधों पर मुंबई घटनाक्रम का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.
अहमद रज़ा-जैसे बहुत से पाक-भारत दोस्ती की भावना से प्रेरित पाकिस्तानी मुंबई में होनेवाली गोलीबारी और धमाकों से दुखी हैं और सब का यही विचार है कि आतंकवादी और अतिवादी ताक़तें दोनों देशों की दोस्ती पर आघात है. भारतीय समाचार पत्रों को पढ़ते समय लग रहा है कि मुंबई में हुए हमलों के बाद भारत में गुस्सा, दुख और हताशा दिख रही है और साथ ही झलक रही है सभी भारतीयों की आंखों से बेबसी कि कब तक वो ऐसे हमलों का सामना करते रहेंगे? जब वो 90 के दशक में हुए विस्फोटों को बुरी याद की तरह भुला चुके थे तो 2006 में रेल में हुए विस्फोटों ने मुंबई को एक बार फिर घायल कर दिया. वो ज़ख्म अभी भरे नहीं थे कि मुंबई में सबसे बड़ा 'सुनियोजित आतंकी हमला' हो गया.
इस हमले से व्यापक जन-धन के नुक़सान के साथ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में भारत की प्रतिष्ठा पर इतनी तगड़ी चोट हुई है कि भारतीयों का आक्रोश में हो जाना स्वाभाविक है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मुझे आज एक निर्बल और शक्तिहीन लग रहा है. कुछ मुठ्ठी भर आतंकियों ने भारत के ख़ुफिया तंत्र को चकमा देकर मुंबई में डर और भ्य का माहौल पैदा कर दिया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा खौफनाक हमला तो आजादी के तुरंत बाद कश्मीर में कबायली आक्रमण के रूप में हुआ था. मुंबई में घंटों तक जिस तरह दहशत तारी रही उसकी तुलना बगदाद, काबुल या बेरूत आदि से की जाए तो ग़लत नहीं होगा.
दक्षिण एशिया में पाकिस्तानी जनता आतंकवाद और चरमपंथ से सब से अधिक प्रभावित हुई है और पाकिस्तानियों को आतंक की ओर धकेलने में उन की सरकार का ही हाथ रहा है. पाकिस्तान के अधिकतर बड़े शहर आत्मघाती हमलों, बम धमाकों और आतंकवादी गत्तिविधियों के साक्षी रहे हैं. सरकार ने अमेरिका की ओर से शुरु की गई आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अच्छी भूमिका तो निभाई है लेकिन देश के भीतर अपनी छवि को और ख़राब कर दिया है. मुंबई हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादी लिप्त हैं यह केवल भारतीय नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोग कह रहे हैं.
कुछ महीने पहले जब सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ ने सत्ता को त्याग किया तो उस के तुंरत बाद पाकिस्तान प्रशासित कशमीर में जिहादी गुट फिर से सक्रीय हो गए जिन पर परवेज़ मुशर्रफ ने पांच साल पहले प्रतिबंध लगाया था. सरकार की ओर से इन जेहादी गुटों पर अभी भी प्रतिबंध है लेकिन पाकिस्तान प्रशसित कशमीर सहेत पूरे देश में सक्रीय हो रहे हैं. यही गुट राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की इसेलिए तीखी आलोचना कर रहे हैं क्योंकि उन्हों ने भारत के साथ बहतर संबंध स्थापित करने की कोशिश की है.
पाकिस्तान में जब भी अवामी सरकार का गठन होता है तो भारत एक दम से दुशमन के रुप में सामने आता है और कशमीर मुद्दा गर्माता है. आप को याद हो गा कि 2006 में जब जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार थी तो विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ती जारी कर कहा था कि पाकिस्तान ने कभी भी नहीं कहा कि कशमीर उस का अटूट अंग है. लेकिन अब जबकि यहाँ पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार है तो कुछ तत्व यह कह रहे हैं कि कशमीर तो पाकिस्तान का ही अटूट अंग है. आसिफ़ ज़रदारी के नेतृत्व वाली सरकार ने कई बार कहा है कि वह भारत के साथ अपने संबंधों को और मज़बूत करने के हर संभव प्रयास कर रही है.
पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार और ख़ुफिया एजेंसी ईएसई के बीच घमासान युद्ध चल रहा है. ईएसई पीपुल्स पार्टी की सरकार से इसलिए भी नराज़ है कि उस ने भारत के साथ बहतर संबंध स्थापित करने की बात कही है. कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने जब ईएसई को गृह मंत्रालय के मातहत करने केलिए एक अधिसूचना जारी की थी तो उस ने सरकार को गिराने की धमकी दी थी. प्रधानमंत्री ने 24 घंटों के भीतर अधिसूचना वापस ले ली थी.
कुछ दिन पहले विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने ख़ुफिया एजेंसी ईएसई के राजनीतिक पाथ (Political Wing) को ख़त्म करने की घोषणा की थी जो चुनाव में धांधली और राजनेताओँ को ब्लैकमेल करने में लिप्त रहा है. विदेश मंत्री की घोषणा के थोड़े समय बाद एक वरिष्ट सैन्य अधिकारी ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है.
कुछ दिन पहले विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने ख़ुफिया एजेंसी ईएसई के राजनीतिक पाथ (Political Wing) को ख़त्म करने की घोषणा की थी जो चुनाव में धांधली और राजनेताओँ को ब्लैकमेल करने में लिप्त रहा है. विदेश मंत्री की घोषणा के थोड़े समय बाद एक वरिष्ट सैन्य अधिकारी ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है.
राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी देश के ख़ुफिया तंत्र पर अपना नियंत्रण चाहते हैं जो कि अभी सेना के पास है, इसलिए ईएसई और सरकार के बीच तनाव है. आसिफ ज़रदारी ने हिंदुस्तान टाईम्ज़ की शिखर सम्मेलन में सेना को उस समय करारा झटका दिया जब उन्हों ने कहा कि पाकिस्तान अपने प्रमाणु हथ्यारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा. कुछ वरिष्ट सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति के इस ब्यान की कड़ी शब्दों में भर्त्सना की और एक ने यह भी कह दिया कि राष्ट्रपति ज़रदारी को इस विषय पर कोई जानकारी नहीं है. सेना को दूसरा झटका तब लग जब उन्हों अपनी पत्नी बेनज़ीर भुट्टो के शब्द दोहराए “There is a little bit of India in every Pakistani and a little bit of Pakistan in every Indian.” और फिर कहा था कि “I do not know whether it is the Indian or the Pakistani in me that is talking to you today.” अहमद रज़ा सहेत बहुत से पाकिस्तानियों ने भारत पाकिस्तान के संबंधों के इस नए युग का स्वागत किया और यदि कोई नराज़ हुए तो वह हैं जेहादी गुट.
मुंबई में आतंकियों ने भारत और पाकिस्तान की दोस्ती पर हमला किया है और राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी को संदेश दिया है कि वह भारत और पाकिस्तान की दोस्ती को किर्चुं में भिखेरने की शक्ति रखते हैं. मुंबई में आतंक का कब्जा हो जाने के बाद भले ही दोनों देशों के नेतृत्व आतंकवाद के खिलाफ कुछ कड़े शब्द कहे हों, लेकिन यथार्थ यह है कि पिछले साढ़े चार साल में दोनों देशों के मान-सम्मान से खिलवाड़ करने वाले आतंकी संगठनों का दमन करने से जानबूझकर बचा गया. एक सच्चाई यह भी है कि दोनों देशों ने कभी भी मन, वचन और कर्म से आतंकवाद से मिलजुलकर लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं प्रदर्शित की.
जब तक आतंकवाद का एक जुट हो कर मुक़ाबला न किया गया तो मुंबई जैसी घटनाएँ फिर होनी के संभावना है. आतंकवाद और चरमपंथ का एक जुट हो कर मुक़ाबला करने में ही दोनों देशों केलिए भलाई है. यही वह उपाय है जिससे दोनों जनताओँ के स्वाभिमान की रक्षा हो सकती है.
गुरुवार, नवंबर 27, 2008
भारत की छवि एक लुंजपुंज देश की बनती जा रही है
आतंकी हमले ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को एक बार फिर दहलाकर रख दिया है। संसद पर हुए हमले को छोड़ दें तो आतंकवादियों ने इतने व्यापक हमले अब तक नहीं किए थे। अब तक आतंकवादी सिलसिलेवार बम धमाके करते रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने होटलों और अस्पतालों में घुसकर स्वचालित हथियारों से गोलीबारी की है और लोगों को बंधक बनाया है। मुंबई में आतंकियों ने हमले भी कुछ अलग तरीके से किए हैं। बम धमाके करने के बाद उन्होंने कई जगहों को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की है। जिसके बाद कभी न थमने वाली मुंबई की रफ्तार दहशत के मारे थम-सा गया है। पिछले कई महीनों से देश ने जितने आतंकवादी हमले झेले हैं, उसके बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि एक लुंजपुंज देश की बनती जा रही है। इसकी तस्दीक इस बात से भी होती है कि मुंबई की इन आतंकवादी घटनाओं के फौरन बाद इंग्लैंड की क्रिकेट टीम बीच में ही दौरा बीच में छोड़कर स्वदेश लौट रही है और भारत भ्रमण पर आने वाले विदेशी पर्यटक अपने कार्यक्रम को मुल्तवी करने लगे हैं।
मुंबई के पूरे घटनाक्रम को ध्यान से देखें तो आतंकवादी होटलों में विदेशी मेहमानों के पासपोर्ट की तलाशी ले रहे थे और ब्रिटिश तथा अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना रहे थे। जिससे साबित होता है कि इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था अब इतनी पुख्ता और सख्त है कि वहां किसी भी तरीके से आतंकी नृशंस घटनाओं को अंजाम देने में बेहद कठिनाई महसूस कर रहे हैं। इसलिए इन देशों के आम नागरिकों को आतंकवादी अब दूसरे देशों में निशाना बनाने लगे हैं। आतंकवादियों ने ताज और ओबेरॉय होटल को काफी सोच-समझकर निशाना बनाया है, क्योंकि इन होटलों में सैकड़ों विदेशी पर्यटक ठहरते हैं। इसलिए सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों को यह कहना बिल्कुल सही है कि आतंकवादियों ने अनायास इन होटलों को निशाना नहीं बनाया। यह सब जान-बूझकर और काफी सोच-समझकर किया गया है। कुछ टीवी चैनलों को ईमेल भेजकर डेकन मुजाहिदीन नामक संगठन ने इन घटनाओं की जिम्मेदारी ली है, जिसका नाम इससे पहले कभी नहीं सुना गया। इसलिए आतंकवादियों की यह एक रणनीति भी हो सकती है, ताकि सही दिशा में चलने वाली जांच को गुमराह किया जा सके। आतंकी हमलों के बाद सरकार के रटे-रटाए जुमले सुन-सुनकर आम जनता यह मानने लगी है कि हुक्मरानों की नजर में आम लोगों की जान की कीमत कुछ खास नहीं है। इसलिए लगातार हो रही आतंकवादी घटनाओं के कारण देश के भीतर जन-आक्रोश बढ़ता जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आतंकवादी घटनाओं के बाद इससे निपटने के लिए जितने भी तरीकों पर चर्चा होती है, उसके बारे में अब तक के अनुभवों से यही दिख रहा है कि सारी कवायद शायद चर्चाओं तक ही सिमटकर रह जाता है। वक्त का यही तकाजा है कि आतंकवाद पर किसी भी तरह के सियासत को परे रखकर पूरा ध्यान गंभीरता से ठोस कार्रवाई पर केंद्रित किया जाए।
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