मंगलवार, जून 05, 2007

घर में क्या था कि तिरा गम उसे गारत करता

घर में क्या था कि तिरा गम उसे गारत करता
रखते थे एक हसरत-ए-तामीर, सो है
मुझे ऐसा लगता है कि चचा ग़ालिब ने बेहद दुखी और नाउम्मीद होकर ही शायद इस शेर में खुद को व्यक्त किया होगा. वक्त गवाह है कि अपने समय के हर बड़े शायर को जमाने भर के गम को तो झेलना ही पड़ा उससे भी कहीं ज्यादा शायद लोगों ने उन्हें अपने तईं परेशान करने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी. मिर्जा के बेहद करीबी शागिर्द मौलाना मुसद्दस खां हाली ने लिखा है कि बुढ़ापे में भी उनकी शायरी, उनकी प्रतिभा से जलने वाले लोग गालियों से भरे खत उन्हें भेजते थे. मिर्जा इससे इतना परेशान हो गए थे कि लिफाफा खोलने से पहले ही उनका हाथ कांपने लगता था. हाली ने लिखा है कि ऐसे एक दोपहर को जब वे मिर्जा के पास बैठे थे तो डाकिये ने खत लाकर दिया. हाली यह जानते थे कि आजकल मिर्जा के पास कैसे-कैसे खत आते हैं. मिर्जा ने उन्हें लिफाफा खोलने को कहा. एक बार तो वे सहमे लेकिन मिर्जा ने जब दोबारा कहा तो उन्होंने लिफाफा खोला. खत में बहुत खराब-खराब गालियां थी. मिर्जा ने पूछा कि क्या लिखा है? तो इसका जवाब देने में हाली को अटपटा लगा. मिर्जा हाली के हाथ से खत लेकर खुद ही पढ़ने लगे. खत पूरा पढ़ने के बाद ठहाका लगाकर हंसे. हाली ने हैरत से उन्हें देखा कि अरे ये तो हंस रहे हैं? मिर्जा ने कहा कि कमबख्त मुझे इस उम्र में मां की गालियां देता है. देखिये हाली साहब कमबख्त को गाली देने का भी शऊर नहीं है. अरे, इनसान जब बच्चा होता है तब वह सबसे ज्याद करीब अपनी वालिदा के होता है, जवानी में बीवी के- तो उस वक्त जब उसे गाली अपने सबसे करीबी से जोड़कर दी जाए तो उसे गुस्सा आता है. बुढ़ापे में अगर मुझे बेटी की गाली देता तो एक बात थी लेकिन कमबख्त गाली दे रहा मुझे मां की. यह कहने के बाद मिर्जा और जोर-जोर से ठहाके लगाने लगे. तो साहिबो, ऐसे जिंदादिल शायर चचा ग़ालिब.
जब तवक्को ही उठ गई ग़ालिब
क्या किसी का गिला करे कोई

मंगलवार, मई 29, 2007

हिंदी साहित्य की पत्रिकाओं में इन दिनों ऐसे-ऐसे तेजस्वी संपादकों का आगमन हो रहा है कि वे अपनी कथित टी.आर.पी. बढ़ाने के लिए खुद भी नंगई पर उतर आए हैं और प्रतिष्ठित लेखकों को भी अपनी लंपटता से परेशान कर रहे हैं. इस तथाकथित साहित्यिक युद्ध में अमानवीयता का बोलबाला बढ़ता जा रहा है. क्या यही है मनुष्य के साथ खड़े होने वाले साहित्य का मानवीय पक्ष?

बुधवार, मई 16, 2007

ये क़िस्सा है रोने रुलाने के क़ाबिल


आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर और उर्दू के बेहद मकबूल शायर मिर्जा असादुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ मिर्जा गालिब के बिना गदर की कोई कहानी पूरी नहीं होती लेकिन इस समय हिंदी और उर्दू के आलिम-ओ-फाजिल जिस नुक्त-ए-नजर से शायद उस दौर को देखने की जहमत नहीं उठा रहे हैं. जफर न सिर्फ एक अच्छे शायर थे बलि्क मिजाज से भी बादशाह कम, एक शायर ज्यादा थे. मुगल सल्तनत के आखिरी ताजदार बहादुरशाह जफर अपनी एक गजल में फरमाते हैं-

या मुझे अफ़सरे-शाहाना बनाया होता

या मेरा ताज गदायाना बनाया होता

अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने

क्यों ख़िरदमंद बनाया न बनाया होता

यानी मुझे बहुत बड़ा हाकिम बनाया होता या फिर मुझे सूफ़ी बनाया होता, अपना दीवाना बनाया होता लेकिन बुद्धिजीवी न बनाया होता. भारत के पहले स्वतंत्रता आंदोलन के 150 साल पूरे होने पर जहाँ बग़ावत के नारे और शहीदों के लहू की बात होती है वहीं दिल्ली के उजड़ने और एक तहज़ीब के ख़त्म होने की आहट भी सुनाई देती है. ऐसे में एक शायराना मिज़ाज रखने वाले शायर के दिल पर क्या गुज़री होगी जिस का सब कुछ ख़त्म हो गया हो. बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने मरने को जीते जी देखा और किसी ने उन्हीं की शैली में उनके लिए यह शेर लिखा:
न दबाया ज़ेरे-ज़मीं उन्हें, न दिया किसी ने कफ़न उन्हें

न हुआ नसीब वतन उन्हें, न कहीं निशाने-मज़ार है
बहादुर शाह ज़फ़र ने दिल्ली के उजड़ने को भी बयान किया है. पहले उनकी एक ग़ज़ल देखें जिसमें उन्होंने उर्दू शायरी के मिज़ाज में ढली हुई अपनी बर्बादी की दास्तान लिखी है:
न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ

जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते ग़ुबार हूं

मेरा रंग-रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछड़ गया

जो चमन ख़िज़ां से उजड़ गया, मैं उसी की फ़स्ले-बहार हूं

पढ़े फ़ातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढ़ाए क्यों

कोई आके शमा जलाए क्यों, मैं वो बेकसी का मज़ार हूं

मैं नहीं हूं नग़्म-ए-जांफ़ज़ा, मुझे सुन के कोई करेगा क्या

मैं बड़े बिरोग की हूं सदा, मैं बड़े दुखी की पुकार हूं,
बहादुर शाह ज़फ़र ने अपनी एक और ग़ज़ल में अपने हालात को इस तरह पेश किया है:
पसे-मरग मेरे मज़ार पर जो दिया किसी ने जला दिया

उसे आह दामने-बाद ने सरे-शाम ही से बुझा दिया

मुझे दफ़्न करना तू जिस घड़ी, तो ये उससे कहना कि ऐ परी

वो जो तेरा आशिक़े-ज़ार था, तहे-ख़ाक उसके दबा दी

यादमे-ग़ुस्ल से मेरे पेशतर, उसे हमदमों ने ये सोच कर

कहीं जावे उसका न दिल दहल, मेरी लाश पर से हटा दिया

मैंने दिला दिया मैंने जान दी, मगर आह तूने न क़द्र की

किसी बात को जो कभी कहा, उसे चुटकियों से उड़ा दिया
दिल्ली के हालात को दर्शाते हुए उनके कुछ शेर इस प्रकार हैं:
नहीं हाले-दिल्ली सुनाने के क़ाबिल

ये क़िस्सा है रोने रुलाने के क़ाबिल

उजाड़े लुटेरों ने वो क़स्र उसके

जो थे देखने और दिखाने के क़ाबिल

न घर है न दर है, रहा इक ज़फ़र है

फ़क़त हाले-देहली सुनाने के क़ाबिल
एक और ग़ज़ल में लिखते हैं:
न था शहर देहली, ये था चमन, कहो किस तरह का था यां अमन

जो ख़िताब था वो मिटा दिया, फ़क़त अब तो उजड़ा दयार है
एक और ग़ज़ल में लिखते हैं:
क्या ख़िज़ां आई चमन में हर शजर जाता रहा

चैन और मेरे जिगर का भी सबर जाता रहा

क्या खुशी हर इक को थी, कर रहे थे सब दुआ

जब घुसी फ़ौजे नसारा हर असर जाता रहा

क्यों न तड़पे वो हुमा अब दाम में सय्याद के

बैठना दो दो पहर अब तख़्त पर जाता रहा

रहते थे इस शहर में शम्सो-क़मर हूरो-परी

लूट कर उनको कोई लेकर किधर जाता रहा

आगूं था ये शहर दिल्ली अब हुआ उजड़ा दयार

क्यों ज़फ़र ये क्या हुआ यौवन किधर जाता रहा
सुफ़ियाना और देसी रंग में डूबी हुई उनकी मनोस्थिति और हालात को दिखलाती हुई एक ग़ज़ल है:
कौन नगर में आए हम कौन नगर में बासे हैं

जाएंगे अब कौन नगर को मन में अब हरासे हैं

देस नया है भेस नया है, रंग नया है ढ़ंग नया है

कौन आनंद करे है वां और रहते कौन उदासे हैं

क्या क्या पहलू देखे हमने गुलशन की फुलवारी में

अब जो फूले उसमें फूल, कुछ और ही उसमें बासे हैं

दुनिया है ये रैन बिसारा, बहुत गई रह गई थोड़ी सी

उनसे कह दो सो नहीं जावें नींद में जो नंदासे हैं
दिल्ली से अपने विदा होने को बहादुर शाह ज़फ़र ने इन शब्दों में बांधा है:
जलाया यार ने ऐसा कि हम वतन से चले

बतौर शमा के रोते इस अंजुमन से चले

न बाग़बां ने इजाज़त दी सैर करने की

खुशी से आए थे रोते हुए चमन से चले
निर्वासन के दौरान बहादुर शाह ज़फ़र के हालात को दर्शाती उनकी इस मशहूर ग़ज़ल के बिना कोई बात पूरी नहीं होगी:
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में

किसकी बनी है आलमे-ना-पायदार में

बुलबुल को बाग़बां से न सय्याद से गिला

क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार में

कहदो इन हसरतों से कहीं और जा बसें

इतनी जगह कहां है दिले दाग़दार में

एक शाख़े-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां

कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालज़ार में

उम्रे-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन

दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई

फैला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में

कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए

दो गज़ ज़मीं भी मिल न सकी कूए-यार में

शनिवार, मई 05, 2007

आख़िर यह किसकी दुनिया है?

दुनिया भर की सरकारों के प्रतिनिधियों और वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन की रिपोर्ट को प्रकाशित कर दिया है. इस रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे नया कहा जा सके. न ऐसा कुछ है जिसकी आशंका पहले न जताई गई हो. जो बात नई है वह यह कि अब तक जो आशंकाएँ जताई जा रही थीं वो धरातल पर दिखने लगी हैं. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले दिनों में पानी का संकट होगा, फसलें चौपट हो जाएँगी और तरह-तरह की बीमारियाँ फैलेंगी. अगर पारा इसी तरह चढ़ता रहा और औसत तापमान डेढ़ से ढाई प्रतिशत बढ़ गया तो 20 से 30 प्रतिशत वनस्पतियाँ और जानवरों की प्रजातियाँ ख़त्म हो जाएँगी.
पानी की किल्लत झेलने वाले देश अफ़्रीका के होंगे. बारिश के पानी से होने वाली फसल 50 फीसदी कम हो जाएगी. वह भी अफ़्रीकी देशों में. फसल की पैदावार कम होगी मध्य और दक्षिण एशिया में. ज़ाहिर है बीमारियाँ भी इन्हीं देशों में फैलेंगी. जब सब आँकड़े बता रहे हों कि भुगतेंगे वो जो वास्तव में जलवायु परिवर्तन के दोषी कभी नहीं थे. तो रिपोर्ट में इसे स्वीकार भी करना पड़ा. इस रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग के बहाने से एक पुराने सवाल को फिर से कुरेद दिया है कि आख़िर यह दुनिया किसकी है और किसके लिए है?
इसे कौन नहीं जानता कि पिछली दो सदियों में प्रदूषण के लिए मूल रुप से कौन ज़िम्मेदार रहा है? जो उद्योग पर उद्योग लगाते चले गए और विकसित देश बन गए उनका नाम इस रिपोर्ट में पीड़ितों की सूची में नहीं है. नाम उनका है जो ग़रीब हैं और अगर गरीबी से थोड़ा उबरे हैं तो अभी भी विकसित नहीं हुए हैं. विकासशील हैं. वो पहली और दूसरी दुनिया में नहीं गिने जाते वो तीसरी दुनिया के देश कहलाते हैं. निश्चित रुप से यह रिपोर्ट और ऐसी कई रिपोर्टें तीसरी दुनिया के देशों के लोगों को तकलीफ़ पहुँचाती है. लेकिन क्या यह तकलीफ़ उन्हें संवेदनशील भी बनाती है? शायद नहीं. जैसी वैश्विक समाज में ग़रीब देशों की स्थिति है वैसी ही तीसरी दुनिया के देशों में ग़रीब लोगों की है.
क्या यह सच नहीं है कि सीवरों और नालियों का रास्ता रोकने वाला कचरा कोई और जमा करता है लेकिन उससे आई बाढ़ झुग्गियों और निचली बस्तियों में रहने वाले लोग झेलते हैं? सड़कों पर धुँआ कारें उगलती हैं और दमे से लेकर टीबी तक के शिकार वो लोग होते हैं जो या तो बसों में सफ़र करते हैं या फिर जिन्हें बस का सफ़र भी नसीब नहीं. दिल्ली में यमुना प्रदूषित हो गई तो किसे फ़र्क पड़ रहा है. कार वाले यमुना के पुल तक पहुँचते-पहुँचते शीशे चढ़ा लेते हैं ताकि सड़ाँध से बच सकें लेकिन उनका क्या जिनके लिए यमुना का पानी ही निस्तारी का एक मात्र साधन था? चाहे दिल्ली हो या मुंबई या लखनऊ या पटना. अमीर या धनी समाज को लगता है कि अगर उसे सहना नहीं पड़ रहा है तो वह चिंता भी क्यों करे? और अगर चिंता करता भी है तो अपनी ग़लती सुधारने की जहमत कभी नहीं उठाता. न उनकी किसी को चिंता है और न वे ख़बर बनते-बनाते हैं. भारत जैसे देश में भी क्रिकेट की शीर्ष संस्था की बैठक तो पहली ख़बर होती है लेकिन दुनिया भर के ग़रीबों की पीड़ा 'डाउन-मार्केट' ख़बर होने के नाते भीतर के पन्नों में औपचारिक ख़बर बनी रह जाती है.
तो फिर अफ़्रीकी देश भुगतें, दक्षिण एशियाई देश सहें तो इससे पश्चिमी देशों को क्योंकर तकलीफ़ होने लगी? उन्हें न्यूऑर्लियान्स में आई भयानक बाढ़ और फ़्राँस की भयानक गर्मी और यूरोप का तूफ़ान अभी भी अपवाद की तरह लगता है. ग़रीब, चाहे लोग हों, समाज हो या फिर देश, उसका प्रारब्ध ही सहना है.
यह कौन सी दुनिया है और किसकी दुनिया है और यह दुनिया ऐसी है क्यों?

सोमवार, अप्रैल 02, 2007

जे.एन.यू. के भूतपूर्व विद्यार्थी रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविताएँ

दोस्तो,
विद्रोही जी जे.एन.यू.परिसर में अक्सर शाम को गंगा ढाबा पर बैठे हुए मिल जाते हैं. सुबह पुस्तकालय के पास, दोपहर को पूर्वांचल होस्टल के पास उन्हें अक्सर देखा जा सकता है. वे अपनी पोशाक से तो फटेहाल हैं लेकिन अध्ययन और संवेदना के स्तर पर वे बेहद सुलझे हुए और नेक इनसान हैं. वे भी कभी जे.एन.यू. के विद्यार्थी थे लेकिन अपनी राजनीति रूझानों के कारण उन्हें निष्काषन का दंश झेलना पड़ा. मैं जब वहां विद्यार्थी था तब से लेकर आज तक उन्हें उसी रूप में देखता आ रहा हूँ लेकिन उनके विचार अप-टू-डेट रहते हैं. वे कविताएं कागज पर नहीं, मन-ही-मन लिखते रहते हैं. मैंने उनकी कुछ कविताएं रिकार्ड करके कागज पर उतारा औऱ उसे लोगों के सामने पेश करना आवश्यक समझा. यहां पेश हैं उनकी वह कविताएं जिसे आप चाहें तो बी.बी.सी. की साइट पर भी देख सकते हैं.-डॉ.पंकज पराशर

नई खेती

मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता

मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा.
* * * * * *

औरतें
कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी
ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है
और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है

मैं कवि हूँ, कर्त्ता हूँ
क्या जल्दी है
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ
औरतों की अदालत में तलब करूँगा
और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा
मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा
जो श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किए हैं
मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा
जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं

मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा
जो दुर्बलों ने भुजबलों के नाम की होंगी.

मैं उन औरतों को
जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर
और चिता में जलकर मरी हैं
उन्हें फिर से ज़िंदा करूँगा और उनके बयानात
दोबारा कलमबंद करूँगा
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया?
कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया?
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई?

क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में
ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झाँका तक नहीं
और जब बाहर निकली तो वह कहीं उसकी लाश निकली
जो खुले में पसर गयी है माँ मेदिनी की तरह

औरत की लाश धरती माता की तरह होती है
जो खुले में फैल जाती है
थानों से लेकर अदालतों तक

मैं देख रहा हूँ कि जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है
चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित और तमगों से लैस
सीना फुलाए हुए सिपाही
महाराज की जय बोल रहे हैं.

वे महाराज जो मर चुके हैं
महारानियाँ जो अपने सती होने का इंतजाम कर रही हैं
और जब महारानियाँ नहीं रहेंगी तो नौकरियाँ क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियाँ कर रही हैं.

मुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता नौकरानियों की होती है
जिनके पति ज़िंदा हैं और रो रहे हैं

कितना ख़राब लगता है
एक औरत को अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना
जबकि मर्दों को रोती हुई स्त्री को मारना भी बुरा नहीं लगता

औरतें रोती जाती हैं,
मरद मारते जाते हैं
औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं
औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं
मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूँगा.
* * * * * *

कवि से संपर्क का पता है-
द्वारा-पंकज पराशर
सी-208, पांडव नगरदिल्ली-110092
e.mail-pkjppster@gmai.com

शुक्रवार, मार्च 30, 2007

राम नाम को कण-कण में बसाने की परम्परा


राम के नाम पर राजनीति करने वालों के लिए “ कण-कण में बसे हैं राम ” भले एक लच्छेदार नारे के सिवा कोई और महत्व नहीं रखता हो. एक ऐसी संस्कृति, जिसमें राम नाम को कण-कण में बसाने की परम्परा है. इसी परम्परा के तहत इस संप्रदाय से जुड़े लोग अपने पूरे शरीर पर “ राम-राम ” का गुदना अर्थात स्थाई टैटू बनवाते हैं, राम-राम लिखे कपड़े धारण करते हैं, घरों की दीवारों पर राम-राम लिखवाते हैं, आपस में एक दूसरे का अभिवादन राम-राम कह कर करते हैं, यहां तक कि एक-दूसरे को राम-राम के नाम से ही पुकारते भी हैं.
ये और बात है कि इस संप्रदाय की आस्था न तो अयोध्या के राम में है और ना ही मंदिरों में रखी जाने वाली राम की मूर्तियों में. इनका राम हर मनुष्य में, पेड़-पौधों में, जीव-जन्तु में और समस्त प्रकृति में समाया हुआ है.

भक्ति आंदोलन का असर
छत्तीसगढ़ में भक्ति आंदोलन का व्यापक असर रहा है. मंदिरों पर सवर्णों ने धोखे से कब्जा कर लिया और हमें राम से दूर करने की कोशिश की गई. हमने मंदिरों में जाना छोड़ दिया, हमने मूर्तियों को छोड़ दिया. ये मंदिर और ये मूर्तियाँ इन पंडितों को ही मुबारक. किसी समय 'अछूत' मानी जानेवाली जातियों या दलितों के बीच इसका गहरा असर देखा जा सकता है.
छत्तीसगढ़ में ही जन्मे गुरु घासीदास की परम्परा को मानने वाले सतनामी, कबीर की परम्परा वाले कबीरपंथी और रामनामी संप्रदाय से जुड़े ऐसे लोगों की संख्या छत्तीसगढ़ में लाखों में है.
इनमें रामनामी संप्रदाय को माननेवाले आज भी लोगों के लिए कौतुहल के विषय बने हुए हैं.
राज्य के जांजगीर-चांपा के एक छोटे से गांव चारपारा में एक दलित युवक परशुराम द्वारा 1890 के आसपास स्थापित रामनामी संप्रदाय की स्थापना को एक ओर जहां भक्ति आंदोलन से जोड़ा जाता है.

मंदिर चाहिए न मूर्ति
भाजपा के राम मंदिर आंदोलन को अल्पज्ञानियों का आंदोलन मानने वाले मेहत्तरलाल का कहना है कि जिस राम के नाम पर दंगा-फसाद हो, उस राम की ज़रुरत हमें नहीं है.
वे मानते हैं कि अयोध्या की पूरी लड़ायी केवल सत्ता और कुर्सी की है. जिनकी आस्था राम नाम में है, उनके लिए मंदिर और मूर्तियों का कोई महत्व नहीं है. यही कारण है कि रामनामी न तो मंदिर जाते हैं और ना ही मूर्ति पूजा करते हैं.

रामनामी अपनी श्रद्धा के अनुसार शरीर में गोदना गुदवाते हैं
लेकिन निर्गुण संतों की आध्यात्मिक परम्परा में वे रचे-बसे हैं. शुद्ध शाकाहारी व नशा जैसे व्यसनों से दूर, हिंदू समाज की तिलक-दहेज जैसी परम्परा के कट्टर विरोधी इस संप्रदाय के अधिकांश लोग खेती करते हैं और बचे हुए समय में राम भजन का प्रचार.
इस संप्रदाय में किसी भी धर्म, वर्ण, लिंग या जाति का व्यक्ति दीक्षित हो सकता है.
रहन-सहन और बातचीत में राम नाम का अधिकतम उपयोग करने वाले रामनामियों के लिए शरीर पर राम नाम गुदवाना अनिवार्य है.
अपने शरीर के किसी भी हिस्से में राम नाम लिखवाने वालों को रामनामी, माथे पर दो राम नाम अंकित करने वाले को शिरोमणी, पूरे माथे पर राम नाम अंकित करने वाले को सर्वांग रामनामी और शरीर के प्रत्येक हिस्से में राम नाम अंकित कराने वालों को नखशिख रामनामी कहा जाता है.

पहचान का संकट
शरीर के विभिन्न हिस्सों में राम नाम लिखवाने के कारण इस संप्रदाय से जुड़े लोग अलग से ही पहचान में आ जाते हैं. लेकिन सिर से लेकर पैर तक, यहां तक की जीभ व तलवे में भी स्थाई रुप से राम नाम गुदवाने वाले रामनामियों के सामने अब अपनी पहचान का संकट खड़ा हो गया है.
कारण है रामनामियों की नयी पीढ़ी का राम नाम गुदवाने की अपनी परम्परा से दूर होते चले जाना. रामनामी संप्रदाय की नयी पीढ़ी मात्र ललाट या हाथ पर एक या दो बार राम-राम गुदवा कर किसी तरह अपनी परम्परा का निर्वाह कर लेना चाह रही है.
ज़ाहिर है, आधुनिकता के दूसरे आयामों ने भी नई पीढ़ी को प्रभावित किया है.
धर्म-कर्म से ज़्यादा लोग दिखावे में लगे हुए हैं. अब कुछ नहीं किया जा सकता. शायद 5 साल या 10 साल बाद, 120 सालों का रामनामी समाज खत्म हो जाएगा, एक युग खत्म हो जाएगा.
साल में एक बार लगने वाले रामनामी भजन मेले में संप्रदाय के लोग मिलते-बैठते हैं जहाँ नए लोगों को दीक्षित किया जाता है. लेकिन मेले में दीक्षित होने वालों की संख्या धीरे-धीरे लगातार कम होती चली जा रही है. पांच वर्ष की उम्र में अपने माथे और बाद में पूरे शरीर पर राम-राम लिखवाने वाले फिरतराम मानते हैं कि नयी पीढ़ी में राम नाम गुदवाने का आकर्षण कम हो रहा है. रामनामी समाज के रीति रिवाज भी टूट रहे हैं. बच्चे तो अब शरीर पर कुछ लिखवाने में ही डरते हैं. नए सौंदर्यबोध और आधुनिक विषयों के जीवन में प्रवेश ने भी इस संप्रदाय के ढाँचे को तोड़ना शुरु कर दिया है. धर्म-कर्म से ज़्यादा लोग दिखावे में लगे हुए हैं. अब कुछ नहीं किया जा सकता. शायद 5 साल या 10 साल बाद, 120 सालों का रामनामी समाज खत्म हो जाएगा, एक युग खत्म हो जाएगा.

शनिवार, मार्च 24, 2007

औरतों की पत्थर मार मार कर हत्या करने की प्रथा


ईरान के कड़े इस्लामी क़ानूनों के तहत व्यभिचार के आरोप में औरतों की पत्थर मार मार कर हत्या करने की प्रथा रही है.लेकिन इस्लामी क्रांति के 22 साल बाद वहाँ उदारवाद की हवा चलने लगी है और ईरानी जनता का एक हिस्सा कट्टरवादी इस्लाम से मुँह मोड़ने लगा है.ख़ास तौर पर विश्वविद्यालय के छात्रों ने तो सड़कों पर उतर कर हिंसक विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए कट्टरवादी मौलवियों के कुछ फ़ैसलों के ख़िलाफ़ अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर किया है.सुधारवादी सांसद जमीला कादीवर के हवाले से भी कहा गया है कि औरतों को संगसार करने की प्रथा ख़त्म होने वाली है.हालाँकि इस्लामी क़ानून संगसारी की इजाज़त देता है, लेकिन ईरान में इस तरह की सज़ा दिए जाने की घटनाएँ लगातार कम होती जा रही हैं.पिछले साल की पहली छमाही में दो महिलाओं को यह सज़ा सुनाई गई और उसके बाद से अब तक किसी को भी यह सख़्त सज़ा नहीं दी गई है.विरोधईरान में उदारवादियों और महिला संगठनों की ओर से इस क़ानून का लगातार विरोध किया जाता रहा है.यही नहीं पश्चिमी देशों, ख़ास तौर पर यूरोपीय संघ ने भी इन क़ानूनों का कड़ा विरोध किया है.ईरान के सुधारवादी विदेशों में अपने देश की छवि को लेकर ख़ासे चिंतित हैं.ईरानी संसद की महिला सदस्य इस मामले में लंबे अर्से से आंदोलन चलाती आ रही हैं.उनका कहना है कि इसे क़ानून की किताबों से हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि क़ुरआन में इस बारे में साफ़ साफ़ कुछ नहीं कहा गया है.इस अभियान से जुड़ी एक महिला सांसद जमीला कादीवर ने तेहरान के एक अख़बार को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि न्यायपालिका के अध्यक्ष ने एक सर्कुलर जारी करके संगसारी की सज़ा न देने की हिदायत दी है.पिछले साल दो महिलाओं को संगसारी की सज़ा दिए जाने से ऐसा लगा था कि दक्षिणपंथी तत्त्व प्रशासन पर हावी हो गए हैं और वे उदारवादियों को दबाने के लिए ऐसे क़दम उठा रहे हैं.