गुरुवार, जनवरी 22, 2009


पाब्लो नेरुदा को कैंसर होने की जानकारी जब डॉक्टर ने दी (बाद में वे इसी बीमारी से मरे) , तो बताते हैं कि उन्होंने ये कविता लिखी. हालांकि नेरुदा के कुछ आधिकारिक विद्वानों का कहना है कि किसी ने उनके नाम से यह कविता लिखकर प्रचारित कर दी. बहरहाल जो भी हो-एक संबल की तरह ये कविता मुझे मित्र सरीखे बड़े भाई यादवेंद्र जी ने भेजी है- पेश है वह कविता....

इसकी यहां बिल्कुल मनाही है



इसकी यहां बिल्कुल मनाही है

कि विलाप करता जाए कोई और किए से कुछ भी न सीखे

कि कोई उठे सुबह एक दिन

और न हो उसकी आंखों में स्वप्न एक भी

कि कोई चिहुंक-चिहुंक जाए

अपनी ही स्मृतियों के डर से...

इसकी यहां बिल्कुल मनाही है


कि चेहरे से तिरोहित हो जाए मुस्कान मुश्किलों से जूझते हुए

कि उसमें जज्बा न जीवित हो उसके लिए लड़ने का

कि जैसे प्यार करने का दम वह भरे

कि सब कुछ बिसार दिया जाए बारी-बारी से

डर जब समेटने को फैलाने लगे अपनी विकराल बांहें...

या कि बीच में ही छूट जाए किसी का

अपने स्वप्नों के एक दिन साकार होने पर से भरोसा...

इसकी यहां बिल्कुल मनाही है


कि मान लें हम जरूरत क्या

कि समझें आसपास एक-दूसरे को

कि कम कर दें अपना दखल

साथियों के जीवन में

कि करने लगें अनदेखी

दूसरे के खुश होने के इतर ढंग की....

इसकी यहां बिल्कुल मनाही है


कि कोशिशें छोड़ दें हम खुशी की

कि मर जाने दें हम आशाएं

कि गुंजाइश विस्मृत कर दें बेहतरी की...

कि मान लें यही अंत में थक-हारकर

दुनिया बेहतर बन जाएगी

हम जैसों के बगैर भी....
इसकी यहां बिल्कुल मनाही है

बुधवार, जनवरी 21, 2009

कब तक रहेंगे हमारे तारे जमीं पर?


फिल्म-संगीत की दुनिया में एक ओर जहां भारत एआर रहमान को गोल्डन ग्लोब अवार्ड मिलने का जश्न मना रहा है, वहीं ऑस्कर अवार्ड के पहले ही दौर से तारे जमीं पर के बाहर हो जाने से भारतीय फिल्म जगत के साथ आम सिने प्रेमियों को भी निराशा हुई है। तारे जमीं पर को भारत की ओर से विदेशी भाषा की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए नामांकित किया गया था और यह सौभाग्य भी इससे पहले केवल तीन फिल्मों की ही मिला था-मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे और लगान को। ऑस्कर अवार्ड्स के इतिहास में ये तीसरा मौका है जब भारत की फिल्म सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्मों की श्रेणी में नामांकित की गई, लेकिन ये दोनों भी ऑस्कर अवार्ड नहीं जीत पाईं। इससे पहले भारत के प्रख्यात फिल्म निर्देशक सत्यजित राय को सिनेमा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए विशेष ऑस्कर सम्मान दिया गया था। ध्यान देने लायक बात यह है कि सिनेमा के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान को मद्देनजर रखते हुए जिन ऑस्कर कमिटी ने उन्हें सम्मानित किया था, उन्हें यह विशिष्ट योगदान उनकी किसी फिल्म विशेष में नजर नहीं आया।

मुंबई फिल्म उद्योग हर साल लगभग 800 फिल्में बनाता है, जबकि हॉलीवुड में महज सौ के आसपास फिल्में बनती हैं। इस समय भारतीय फिल्म उद्योग की अंतरराष्ट्रीय फिल्म बाजार में भागीदारी 3.5 अरब डॉलर की है, जबकि अंतरराष्ट्रीय फिल्म बाजार 300 अरब डॉलर का है। इससे निश्चय ही पश्चिमी फिल्मों के बड़े बाजार का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन ऑस्कर को लेकर भारतीय जनमानस में यह सवाल उठता है कि ऑस्कर के जो मानदंड हैं, उनके हिसाब से हमारी फिल्मों की गुणवत्ता में कहां कमी रह जाती है? उन कमियों को दूर करने और बेहतरीन फिल्म बनाने के लिए भारतीय फिल्मकार क्यों नहीं ईमानदारी से कोशिश करते हैं? सत्यजीत राय की फिल्म पथेर पांचाली, आगंतुक आदि पूर्वी भारत के लोकक्षेत्र की संवेदना को जिस भाषा और कला-कौशल से सामने लाती हैं, उसे विश्व सिनेमा के किसी भी प्रतिमान पर निर्भीकता से रखा जा सकता है। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में बेहतरीन कॉस्ट्यूम डिजाइन के लिए अवश्य भानु अथैया को ऑस्कर अवार्ड मिल चुका है, मगर किसी भारतीय फिल्म को ऑस्कर अब तक हासिल नहीं हो सका है। तारे जमीं पर के ऑस्कर की दौर से बाहर हो जाने के बाद फूहड़ मसालेदार फिल्मों को आम जनता की मांग बताकर पल्ला झाड़ने में सिद्धहस्त भारतीय फिल्मकारों को निश्चय ही अब गुणवत्ता, बेहतर पटकथा, तकनीक और भाषा की संवेदनशीलता को लेकर आत्ममंथन करना चाहिए। फिर कोई कारण नहीं है कि हम इस क्षेत्र में बेहतर उपलब्धि हासिल न कर पाएं।

शुक्रवार, जनवरी 16, 2009

आईसीसी की रैंकिंग के अजूबे तो देखिये!


अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानी आईसीसी द्वारा जारी क्रिकेट इतिहास के शीर्ष टेस्ट और एकदिवसीय बल्लेबाजों की जो सूची सामने आई है, उनमें मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर का नाम शीर्ष बीस खिलाडि़यों के बीच भी नहीं है। इसमें इकलौता भारतीय नाम सुनील गावस्कर का है और वह भी बीस शीर्ष बल्लेबाजों की सूची में सबसे अंतिम यानी बीसवें नंबर पर। रिकार्डों और करिश्माई खेल के बेताज बादशाह होने के बावजूद आईसीसी की एकदिवसीय बल्लेबाजों की सूची में सचिन तेंदुलकर 12 वें नंबर पर हैं। इसी से आईसीसी की रैंकिंग प्रणाली के लिए बनाए गए मानदंडों की यांत्रिकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। दूसरी ओर, आईसीसी की शीर्ष बीस खिलाडि़यों की दिलचस्प सूचियों में सचिन ही नहीं, बल्कि ब्रायन लारा और स्टीव वॉ सरीखे बल्लेबाजों के नाम नहीं हैं। आईसीसी की सूची में जिन खिलाडि़यों को जगह दी गई है, वे निश्चय ही अच्छे और बड़े खिलाड़ी हैं या रहे हैं, मगर सचिन तेंदुलकर सरीखे खिलाड़ी को आखिरकार कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है?
माना कि रेटिंग तय करने के जो तरीके अपनाए जाते हैं उसके हिसाब से सचिन तेंदुलकर के अंक कम हैं, लेकिन इससे रेटिंग तय करने के जो तरीके हैं वे बेहतर और न्यायसंगत तो नहीं हो जाते हैं? क्रिकेट के इतिहास में सिर्फ 25 बल्लेबाज टेस्ट क्रिकेट में 900 या अधिक रेटिंग अंक हासिल कर सके है, जबकि एकदिवसीय में 20 बल्लेबाजों ने 850 रेटिंग अंक का आंकड़ा पार किया है। आईसीसी की रेटिंग पर टीम इंडिया के वामहस्त ओपनर गौतम गंभीर की यह टिप्पणी आम भारतीय की प्रतिक्रियाओं का लगभग प्रतिनिधित्व करती है कि मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को किसी रैंकिंग की कोई जरूरत नहीं है और अंकों की तकनीकी बारीकियों में जाने के बजाए लोग मानते हैं कि सचिन और लारा की किसी से तुलना नहीं की जा सकती है। गौरतलब है कि सचिन और ब्रायन लारा के मामले में स्वयं आईसीसी को इस बात का एहसास है कि रेटिंग तय करने के लिए जो तरीके अपनाए गए हैं, वह बेहतर और निर्दोष नहीं है। इससे स्पष्ट पता चलता है कि इस तरह की सूचियों को जारी करके जाने-अनजाने आईसीसी विश्व के बेहतरीन खिलाड़ियों के साथ-साथ अपनी गरिमा के साथ भी न्याय नहीं कर पाती है।

गुरुवार, जनवरी 15, 2009

पाक से आर्थिक संबंध का समीकरण


गृह मंत्री पी चिदंबरम की इस चेतावनी को मुंबई हमले के बाद बयानबाजियों की श्रृंखला में एक और बयान मानने की भूल नहीं करनी चाहिए कि यदि पाक हमें सहयोग नहीं करता है, तो हम उसके व्यापारियों को क्यों प्रोत्साहित करें? उनके पर्यटकों की आवभगत क्यों करें और अपने पर्यटकों को पाकिस्तान भेजकर किसी भी रूप में उसकी अर्थव्यवस्था में योगदान करें? क्योंकि आरोपियों को सौंपने और उन पर कारüवाई के लिए भारत द्वारा तमाम सबूत उपलब्ध करा देने के बाद पाकिस्तान अब तक सबूत का ही राग आलाप रहा है। जबकि वांछित अपराधियों और आतंकी सरगनाओं पर कार्रवाई के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों के अनुरोध पर पाकिस्तान ने कोई कार्रवाई नहीं की है। दुर्योग से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी अब तक मुंबई आतंकी हमले के मुद्दे पर अपेक्षित दृढ़ता प्रदर्शित नहीं की है। पाक के साथ क्रिकेट मैच पर ऊहापोह को दूर करने के लिए कूटनीतिज्ञ इस बात पर सहमत हुए कि क्रिकेट ही नहीं, पाकिस्तान के साथ तमाम संबंधों की समीक्षा की जाए। जाहिर है, उस दायरे में क्रिकेट भी है। क्योंकि जमीनी स्तर पर युद्ध जीतने से पहले कूटनीतिक स्तर पर विजय के लिए प्रतिपक्षी को अलग-थलग करना बेहद जरूरी होता है।
गृह मंत्री का बयान इस लिहाज से और महत्वपूर्ण है कि भारत ने पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया हुआ है, जबकि पाकिस्तान ने भारत को यह दर्जा तब भी देना जरूरी नहीं समझा, जब संबंध बिल्कुल सामान्य थे। जबकि भारत के साथ व्यापार के मामले में भारत के मुकाबले पाकिस्तान कहीं ज्यादा लाभ कमाता है। सांस्कृतिक मोर्चे पर भी भारत ने पाकिस्तान के कई कलाकारों-लेखकों को स्थायी वीजा दिया हुआ है, जिनमें मरहूम क्रांतिकारी शायर अहमद फराज और गुलाम अली का नाम उल्लेखनीय है। जबकि पाकिस्तान ने विश्व स्तर की सम्मानित गायिका लता मंगेशकर तक को वीजा देने की तकलीफ नहीं उठाई। इन सवालों के घेरे में यह बात भी आती है कि पाकिस्तान हो या कोई अन्य देश, सांस्कृतिक और आर्थिक मामलों में एकपक्षीय और असंतुलित स्थिति बहुत दिनों तक नहीं झेली जा सकती। मुंबई आतंकी हमले के पहले से पाकिस्तान के साथ यह असंतुलन कायम है और इसको दूर करने की दिशा में पाकिस्तानी हुक्मरानों ने कभी ईमानदारी से कोशिश नहीं की। इसके बावजूद कूटनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए भारत जो कर रहा है, उसी की एक कड़ी के रूप में गृह मंत्री के बयान को देखा जाना चाहिए।

बुधवार, जनवरी 14, 2009

गोल्डन ग्लोब की बात ही कुछ और है


भारतीय संगीत जगत के लिए बेहद खुशी का यह पहला मौका है, जब किसी भारतीय ने गोल्डन ग्लोब पुरस्कार जीता है। रहमान पहले भारतीय हैं जिन्हें किसी भी वर्ग में गोल्डन ग्लोब अवार्ड मिला है। बेहतर संगीत रचना के साथ-साथ पुरस्कृत गीत जय हो...जय हो...को पार्श्व गायक सुखविंदर के साथ एआर रहमान ने अपनी आवाज भी दी है। गोल्डन ग्लोब अवार्ड फिल्मों के लिए दिए जाने वाले ऑस्कर पुरस्कारों के बाद सबसे प्रतिष्ठित माने जाते हैं और इस बार मुंबई की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर को चार वर्गों में नामांकित किया गया था और इसने चारों अवार्ड जीत लिए। इस फिल्म की कथा भी बेहद रोचक है, जिसमें कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रम के जरिए झुग्गियों में रहने वाले एक व्यक्ति के अमीर बनने की कहानी के पीछे मुंबई की तस्वीर दिखाती इस फिल्म में संघर्ष और इंसानियत की भावना को जिस तरीके से दिखाया गया है, उसे देखने के बाद सभी को अपना संघर्ष छोटा लगने लगता है। स्लमडॉग मिलियनेयर के गीत जय हो... में सुर और प्रेम का अद्भुत संगम है। यह एक सुखद संयोग है कि दिल से, साथिया, गुरु, युवराज, युवा-जैसी अनेक फिल्मों में गुलजार और रहमान की जुगलबंदी श्रोताओं को अपना कायल बना चुकी है। मुंबई की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म का संगीत अत्यंत लोकप्रिय हो चुका है।
एआर रहमान के लिए अवार्ड मिलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन ख्याति, प्रतिष्ठा और मान्यता के लिहाज से गोल्डन ग्लोब की बात ही कुछ और है। स्लमडॉग के संगीत के लिए रहमान को कुछ ही दिन पहले क्रिटिक्स अवार्ड भी मिला है। पुरस्कृत गीत जय हो...के गीतकार स्वयं गुलजार मानते हैं कि एआर रहमान जादुई प्रतिभा के धनी हैं और वे संगीत को जिस वैश्विक ऊंचाई पर ले गए हैं, वहां तक अन्य कोई भारतीय संगीतकार पहुंचने में कामयाब नहीं हो पाया है। वंदे मातरम और मां तुझे सलाम जैसी संगीत रचना को अपनी पुरकशिश आवाज में गाकर उन्होंने संगीत के रसिक श्रोताओं के साथ-साथ-साथ आम जनों के बीच भी जनप्रिय बना दिया। सिंथेसाइजर वाद्य के लिए दंतकथा के नायक सरीखी लोकप्रियता हासिल करने वाले रहमान संगीत के जादूगर सहित अनेक विशेषणों से नवाजे गए हैं और अब तो उचित ही लोग उनके लिए ऑस्कर पुरस्कार की कामना करने लगे हैं।

मंगलवार, जनवरी 13, 2009

आखिर कैसे सब कुछ पाक-साफ दिखता रहा?


सत्यम के नए निदेशक की पहल अब तक के सबसे बड़े कारपोरेट घोटाले का शिकार बनी देश की चौथी बड़ी साफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स सर्विसेज को गंभीर संकट से उबारने की कोशिशों के तहत सरकार ने नए निदेशक मंडल की जो घोषणा की है, उसका संपूर्ण कारपोरेट जगत ने स्वागत किया है। साफ्टवेयर के क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना खासा दबदबा रखने वाले सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की साख बरकरार रखने के लिए यह सरकारी प्रयास जरूरी हो गया था। सरकार ने सत्यम का कामकाज अबाधित रखने के लिए एचडीएफसी के अध्यक्ष डॉ.दीपक पारेख, नैस्कॉम के पूर्व अध्यक्ष किरण कार्णिक और सेबी के पूर्व सदस्य एवं कानूनी मामलों के जानकार सी.अच्युतन की नियुक्ति करके काफी हद तक उद्देश्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शा दिया है।

हालांकि इन निदेशकों को सरकार ने नियुक्त किया है, लेकिन नवनियुक्त तीनों निदेशकों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा और वे स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगे। नए निदेशकों को इन चुनौतियों से सबसे पहले जूझना होगा कि आखिर कैसे इतने लंबे समय तक यह गड़बड़झाला चलता रहा और ऊपर से सब कुछ पाक-साफ दिखता रहा? कारपोरेट गवर्नेंस के लिए पुरस्कृत होने वाली इस कंपनी की साख को देखकर जिन निवेशकों ने इस कंपनी पर अपना भरोसा जताया, उनके भरोसे और धन दोनों की सुरक्षा कैसे बहाल होगी, इससे भी जूझना होगा। वैश्विक मंदी के इस दौर में जब हर तरफ से निराशाजनक खबरें आ रही हैं, उस माहौल में सत्यम के इस महाघोटाले के बाद इस कंपनी के पचास हजार कर्मचारियों का भविष्य भी अधर में लटक गया है। ऐसे में कंपनी मामलों के मंत्री प्रेमचंद गुप्ता का यह बयान कि नया बोर्ड संकट की इस घड़ी में कंपनी को जिम्मेदार नेतृत्व प्रदान करेगा, ताकि कर्मचारियों का मनोबल बना रहे और उपभोक्ताओं का विश्वास भी बहाल रहे, महत्वपूर्ण है। लेकिन इस घटनाक्रम से जाने-अनजाने सरकार भी सवालों के घेरे में तो आ ही गई है कि इतने लंबे समय से यह सब चलने के पीछे कहीं-न-कहीं से सिस्टम का सहयोग तो रहा होगा। बहरहाल, नए निदेशक मंडल पर कंपनी की साख, ग्राहकों का विश्वास और कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाने की जो महती जिम्मेदारी आई है, उम्मीद की जानी चाहिए इन उसे नए निदेशक मंडल के काबिल सदस्य बेहतर तरीके से पूरा कर पाएंगे।

रविवार, जनवरी 11, 2009

शिबू सोरेन का भयंकर कुर्सी मोह


तमाड़ विधानसभा सीट के उपचुनाव में मिली हार से मुश्किल में फंसे झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के तमाम राजनीतिक हथियार जब नाकाम हो गए और संप्रग की बैठक में अपेक्षित समर्थन मिलने की आशा भी क्षीण हो गई, तब जाकर उन्होंने इस्तीफा देने का संकेत दिया है। चुनाव हारने के बावजूद वे यह दलील देते रहे कि वे दोबारा चुनाव लड़ेंगे और इत्तफाक से जामताड़ा के विधायक विष्णु भैया ने इस्तीफा देकर वहां से गुरुजी को चुनाव की पेशकश भी कर दी। मगर ऐसा लगता है कि संप्रग को सोरने का यह दांव ठीक नहीं लगा, जिसके बाद स्वाभाविक ही उनका सुर बदल गया। झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का आलम यह कि राज्य ने पिछले तीन सालों में चार मुख्यमंत्री देखे हैं और निर्दलीय विधायकों का वहां ऐसा दबदबा रहा है कि निर्दलीय मधु कौड़ा लगभग दो सालों तक वहां मुख्यमंत्री रह चुके हैं। गौरतलब है कि 2005 में विधानसभा चुनाव के बाद राज्यपाल ने सबसे पहले शिबू सोरेन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन निर्दलीय विधायकों ने उनका समर्थन नहीं किया, जिसके बाद मजबूरन उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

पिछले साल अगस्त में शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री का पद संभाला था और संविधान के तहत उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा का होना जरूरी है। अमेरिका के साथ परमाणु करार के मसले पर वामपंथी दलों के समर्थन वापसी के बाद केंद्र की संप्रग सरकार को बचाने के एवज में शिबू सोरेन को झारखंड की कुर्सी तोहफे के रूप में मिली थी। राजनीतिक उलटफेर और गुणा-गणित में माहिर गुरुजी के सामने उसी समय से यह बड़ी चुनौती थी कि वे अपने कुनबे को कैसे एकजुट रखते हैं। मगर जब चुनाव में जनता ने उनका सारा हिसाब-किताब बराबर कर दिया, तब भी वे जिस तरीके से कुर्सी बचाने की जुगत भिड़ा रहे हैं, वह लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। यह एक असाधारण स्थिति है, जब राज्य की जनता ने उन्हें विधायक बनने की पात्रता देने से भी इनकार कर दिया है। दूसरी बात यह है कि केंद्र सरकार ने समर्थन देने के एवज में उन्हें मुख्यमंत्री पद का तोहफा देने के लिए तेईस माह पुरानी मधु कौड़ा सरकार को हटाने के लिए जिन तरीकों का अनुसरण किया किया था, उस पर भी राजनीतिक टिप्पणीकारों ने सवाल उठाए थे। जनता के इस फैसले के बाद उचित यही है कि वे पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए ससम्मान ढंग से पद त्याग दें और अगले चुनाव में जाने का धैर्य दिखाएं।