कठिन है रहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो/बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो/तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है/मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो
गुरुवार, दिसंबर 29, 2011
आज के हालत-ए-हाजरा पर यादवेन्द्र का नजरिया
बुधवार, दिसंबर 14, 2011
अचूक अवसरवादियों का 'नया दौर'
शनिवार, दिसंबर 10, 2011

48 वर्षीय नसरीन सतूदेह इरान की बेहद लोकप्रिय मानव अधिकार वकील और कार्यकर्ता हैं जो अपने कट्टर पंथी शासन विरोधी विचारों के लिए सरकार की आंख की किरकिरी बनी हुई हैं.अपने छात्र जीवन में खूब अच्छे नंबरों से पास होने के बाद उन्होंने कानून की पढाई की पर वकालत करने के लाइसेंस के लिए उन्हें आठ साल का लम्बा इंतजार करना पड़ा.उन्होंने सरकारी महकमों और बैंक में भी नौकरी की पर इरान के पुरुष वर्चस्व वाले समाज में आततायी पिताओं के सताए हुए बच्चों और शासन के बर्बर कोप का भाजन बने राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए क़ानूनी सहायता प्रदान करने के कारण उन्हें दुनिया भर में खूब सम्मान मिला.पिछले राष्ट्रपति चुनाव की कथित धांधलियों में उन्होंने खुल कर विरोधी पक्ष का साथ दिया...नतीजा सितम्बर 2010 में उनकी गिरफ़्तारी और अंततः जनवरी 2011 में ग्यारह साल की एकाकी जेल की सजा...जेल में रहते हुए उन्हें अपने परिवार से भी नहीं मिलने दिया जाता था इसलिए कई बार उन्होंने विरोध स्वरुप अन्न जल ग्रहण करने से इंकार कर दिया...उनकी सेहत निरंतर बिगडती जा रही है.दुनिया में मानव अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले अनेक लोगों और संगठनों ने उनकी रिहाई की माँग की है.जेल की अपनी एकाकी कोठरी से उन्होंने अपनी बेटी के लिए जो चिट्ठी लिखी,उसका अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है:
मेरी सबसे दुलारी मेहरावे...मेरी बेटी..मेरी शान...मेरी ख़ुशी,
एविन जेल के वार्ड न.209 से में तुम्हें सलाम भेजती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि तुम्हारा समय ठीक से बीत रहा होगा.मैं तुमसे बगैर किसी चिंता,उदासी और आँसू के मुखातिब होना चाहती हूँ..बल्कि तुम्हारे लिए और तुम्हारे छोटे भाई के लिए प्यार और दुआओं से भरे दिल के साथ तुमलोगों को सलाम करती हूँ.
मुझे अपने प्यारे बच्चों से दूर हुए छह महीने हो गए.इन छह महीनों में ले दे के ऐसे मौके बिरले ही आए हैं जब हम एक दूसरे को आमने सामने देख पाए हैं...वो भी सिक्योरिटी गार्ड की मौजूदगी में ही.मुझे इस बीच में तुम्हें ख़त लिखने की इजाज़त कभी नहीं दी गयी...ना ही तुम्हारी कोई फोटो मुझतक पहुँचने दी गयी...न हमें बगैर किसी की मौजूदगी के मिलने ही दिया गया. मेरी प्यारी मेहरावे,कोई और क्या समझेगा मेरे दिल का दर्द जितना तुम समझ सकती हो..जिन हालातों में हम एक दूसरे के साथ मिल पाए,इसका भी तुम्हें पता है.हर बार...तुमलोगों से मिलने के बाद हर बार और यहाँ तक कि यहाँ रहते हुए हर रोज मैं अपने आपसे ये सवाल पूछती हूँ कि दुनिया जहान के काम करते हुए मैंने कहीं अपने बच्चों के हक़ को इज्जत और अहमियत देनी बंद तो नहीं कर दी.मेरी बच्ची,तुम्हारी समझदारी का खूब भरोसा करते हुए भी किसी और बात से ज्यादा मुझे इस बात की फ़िक्र रहती है कि तुम्हारे मन में यह कभी नहीं आना चाहिए कि मैंने अपने ही बच्चों के हक़ न्योछावर कर दिए.
मेरी सबसे प्यारी मेहरावे, अपनी गिरफ़्तारी के बाद पहले दिन से ही मैं तुम्हारे और तुम्हारे भाई के अधिकारों के ऊपर गौर करती रही हूँ..तुम्हारी उम्र का ध्यान करते हुए मुझे तुम्हारी चिंता ज्यादा रहती है...कि तुम मुश्किल हालातों में कितना खुद को ढाल पाओगी...कि कितनी गहराई से उनको समझ पाओगी...तुम्हारी हिम्मत और सहनशक्ति...सबसे ज्यादा इस बात से परेशान रहती हूँ कि मेरी गिरफ़्तारी और सजा को लेकर स्कूल में तुम्हारे दोस्त कहीं तुमसे मिलने जुलने और बोलने से तो परहेज नहीं करने लगेंगे. हाँलाकि मेरे मन के अंदेशों को धराशायी होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा...अब मैं...या ये कहना बेहतर होगा कि हम...अपनी मान्यताओं और विश्वासों के प्रति ज्यादा मजबूती के साथ खड़े हुए हैं.
तुम्हारी ताकत और सहनशक्ति मुझसे कमतर कतई नहीं है मेरी बेटी.एक बार मैंने तुमसे कहा था: ऐसा कभी मत सोचना मेरे बच्चे कि मुझे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है...या कि मैंने कोई ऐसा गलत काम किया जिस से मुझे ऐसी सजा दी जाये... मैंने जो कुछ भी किया देश के कानून के अंदर किया...गैर क़ानूनी कुछ भी नहीं किया...मुझे खूब अच्छी तरह याद है कि इस पर तुमने अपनी नन्हीं हथेलियों से मेरा चेहरा सहलाते हुए जवाब दिया था: ममी,मुझे सब मालूम है...जानती हूँ मैं...उस दिन जिस भरोसे से तुमने ये शब्द बोले थे उससे मैं अपनी बच्ची की गुनहगार बनाने की आशंकाओं से सदा के लिए उबर गयी थी.
मेरी बच्ची,स्कूल में साथ पढने वाले बच्चों के बर्ताव के बारे में भी मेरी तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं...जाहिर है,इस पीढ़ी के बच्चे पिछली पीढ़ी से ज्यादा समझदार और सयाने हैं. यही कारण है कि यहाँ मैं किसी चिंता के बोझ से मुक्त हूँ, अपनी विश्वासों पर पक्की खड़ी हूँ...दर असल मुझमें यह शक्ति तुम्हारी और तुम्हारे पिता की वजह से आई.
प्यारी प्यारी मेहरावे, मुझे हमारी साथ साथ बितायी हुई खुशनुमा यादें बार बार जेहन में आ रही हैं.यहाँ जेल में रात में जब मैं सोने जाती हूँ तो याद आते हैं वो पल जब मैं घर रहते हुए तुम्हें सुलाया करती थी.मैं तुम्हें तरह तरह की लोरियां और गीत सुनाया करती थी,पर तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद थी वो परियों वाली लोरी.कोई रात ऐसी नहीं बिताती थी जब तुम उसको सुनने की जिद न करो...और मैं शुरू हो जाती थी:
मेरी प्यारी बच्ची,बच्चों के हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए मेरा सबसे बड़ा संबल और प्रेरणा तुम ही थीं.उस समय भी मैं सोचती थी..और अब भी भरोसा है कि बच्चों के हक़ कि लड़ाई में मिली कामयाबी का सबसे बड़ा फायदा मेरे अपने बच्चों को मिलेगा.जब भी मैं बर्बरता से जूझते किसी मासूम का केस लड़ कर कोर्ट से घर लौटती तो सबसे पहले तुम दोनों को बांहों में भींच लेती और देर तक इस आत्मीय गिरफ्त से छूटने से बचती रहती.अब आज यहाँ रहते हुए मैं इस बर्ताव के बारे में बार बार सोचती हूँ...शायद देर तक तुम दोनों के साथ ऐसे लिपटने से मैं जुल्मों के सताए बच्चों को कुछ दिलासा दे पाती होऊं.
मुझे याद है एक बार तुमने बड़ी संजीदगी से कहा था कि तुम नहीं चाहती कि कभी भी 18 साल की हो जाओ.मेरे पूछने पर तुमने टपक से जवाब दिया था कि इस उम्र में पहुँचते ही तुम्हें बचपने को अलविदा कहना पड़ेगा...तुम बचपने को मिलती ख़ास तवज्जो से कभी महरूम नहीं होना चाहती.मैं इस जवाब से मिली ख़ुशी को कभी शब्दों में बयान नहीं कर सकी मेरी बेटी...मुझे खूब याद है कि तुम कोई ऐसा मौका नहीं छोड़तीं जब मेरे या तुम्हारे पिता के सामने ये साबित करना हो कि तुम अब भी बच्ची ही हो,18 साल की सयानी नहीं हुई...और हमारे लिए तुम्हारे बचपने की हिफाजत करना..और उसको सम्मान देना कितना जरुरी था.
मेरी प्यारी बच्ची, जैसे मैंने तुम्हारे बाल अधिकारों को भरपूर सुरक्षा और सम्मान देने की पूरी कोशिश की वैसे ही अपने तमाम मुवक्किलों के साथ भी बर्ताव किया...उनके हकों की अनदेखी मैंने कभी नहीं की. जब जब मेरे मुवक्किल मुश्किल में पड़े या उनको सलाखों के पीछे धकेला गया,मैंने अपना दिन रात नहीं देखा और उनकी हिफाजत के लिए मौके पर डटी रही.जिन्होंने मुझे अपनी मदद के लिए बुलाया है उनको बीच मंज्धार में छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूँ? कभी नहीं..मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती.
अब ख़त को पूरा करने से पहले एक बार मैं तुमसे कहना चाहती हूँ कि तुमलोगों के और तुम्हारी तरह के दूसरे बच्चों के बाल अधिकारों की हिफाजत को ध्यान में रख कर और तुमलोगों के बेहतर भविष्य की सोच कर ही मैंने यह पेशा अपनाया था.और मुझे पूरा पूरा भरोसा है कि मेरे और मेरी तरह के हालातों में रह रहे बहुतेरे परिवारों की तकलीफ व्यर्थ नहीं जाएगी...दर असल इन्साफ तभी प्रकट होता है जब चारों ओर घनघोर निराशा छाने लगती है...हम इन्साफ की उम्मीद करना भी छोड़ देते हैं.मुझे अपने कहे पर पूरा भरोसा है.तुम्हारे लिए मेरी दुआ सिर्फ भरपूर ख़ुशी और सुख भरे बचपने की है.
प्यारी प्यारी मेहरावे,मुझसे जिरह करने वालों और जजों के लिए इस वजह से गुस्सा नहीं पालना की वे मेरे साथ ऐसा सुलूक कर रहे हैं...बल्कि अपनी बाल सुलभ मुलायमियत और खूबसूरती के साथ उनसे पेश आन...उनके लिए अमन और चैन की दुआएं माँगना...ऐसा करोगी तो उनके साथ साथ हमें भी खुदा ऐसे ही अमन और चैन के आशीर्वाद देगा.
यहाँ रहते हुए कोई ऐसा पल नहीं आता की तुम्हें याद न करती होऊं...तुम्हारे लिए सैकड़ों चुम्बन...
-तुम्हारी माँ नसरीन
-चयन एवं अनुवाद- यादवेन्द्र
गुरुवार, नवंबर 11, 2010
चिर काल तक यह जीवन फलता-फूलता रहेगा
बहुत दिन हुए....बहुत दिन हुए खुद के ही ब्लाग को देखे हुए. वक्त गुजरता गया और गुजरते वक्त ने कभी इतनी मोहलत नहीं दी कि मुड़कर इधर आ सकूं. पर देर आयद दुरुस्त आयद. आज आया. ...और आते ही भाई यादवेन्द्र जी ने यह कविता उपलब्ध करवाई है और वादा किया है कि अब वे निरंतर ख्वाब का दर पर दस्तक देते रहेंगे. तो लीजिए लंबे अरसे बाद आज इब्तिदा कीजिए, इस कविता से.....मंगलवार, मार्च 23, 2010
विधवा ब्राह्मण महिलाओं को कितना जानते हैं आप?
हम भारतीय घर से बाहर निकलते ही अक्सर इतने शुचितावादी और नैष्ठिक होने लगते हैं कि यह तो लगभग भूल ही जाते हैं कि हमारी स्वाभाविक जिंदगी इन चीजों के कारण अस्वाभाविक और अप्राकृतिक हो जाती है. ....और दूसरों पर उंगली उठाने और राय बनाने में तो हमारी जल्दबाजी का जवाब नहीं. मेरे गांव की एक जवान विधवा यहां दिल्ली आकर कुछ करना चाहती है...नौकरी...घरेलू दाई का काम...मेहनत-मजदूरी का कोई भी काम जिससे अपना और एक बच्ची का पेट पल जाए. मगर उस विधवा ब्राह्मणी को आज की तारीख में भी दोबारा शादी करने की इजाजत नहीं है. उसे क्या किसी भी विधवा को आज भी मिथिला के ब्राह्मण समाज में पुनर्विवाह की अनुमति नहीं है. गांव में मेहनत-मजदूरी करने का तो खैर कोई सवाल ही नहीं, क्योंकि इससे गांव के अलंबरदार ब्राह्मणों की नाक कटेगी....अफसोसनाक बात यह है कि इन नाजुक नाक वालों की नजर उसके शरीर पर तो है...मगर उसके पेट और उसकी नीरस, बेरंग जिंदगी पर बिल्कुल नहीं. उस महिला को यदि गांव में ही मजदूरी करने दी जाए तो दिल्ली स्लम होने से बचेगी...गांव उजड़ने से बचेगा...हम उसके अथाह दुख के सागर में डूबने और झूठ बोलने से बचेंगे और श्रम से अर्जित धन की शक्ति से उस विधवा महिला का जीवन भी उतना दुखमय नहीं रहेगा, फिलहाल जितना है.
बुधवार, मार्च 17, 2010
हत्या औऱ आत्महत्या से बचा स्त्री का जीवन

पिटने का मामला और खास तौर पर औरतों के पिटने का...बड़ा पुराना है....लगभग आदिम राग है....
बुधवार, मार्च 10, 2010
ये साथ निभाता रहे मरते दम तक....
एरमा बोमबेक्क (१९२७-१९९६) अमेरिका की बेहद लोकप्रिय हास्य लेखिका मानी जाती हैं. गरीब परिवार में जनमी एरमा को घरेलू स्थितियों को केंद्र में रख कर हास्य रचनाएँ लिखने का शौक बचपन से ही था, जो बाद में इतना लोकप्रिय हुआ कि वे दुनिया में सबसे ज्यादा छपने वाली स्तंभकार बन गयीं. ..अपनी लोकप्रियता के शिखर पर उनके कॉलम अकेले अमेरिका और कनाडा के नौ सौ अख़बारों में हफ्ते में दो बार छपा करते थे और उनके पाठकों की संख्या कोई तीन करोड़ आंकी गयी थी. इसके अलावा उन्होंने टीवी के लिए खूब कम किया और १५ किताबें भी छपीं जो सभी बेस्टसेलर्स रहीं. शादी के बाद डॉक्टरों ने उन्हें बच्चा जनने में अक्षम घोषित कर दिया, इसीलिए उन्होंने एक बेटी गोद ली..पर आसानी से किसी बात से हार न मानने वाली एरमा बाद में दो बेटों की वास्तविक माँ भी बनीं.अमेरिका में स्त्रियों को बराबरी का हक़ दिलाने की लड़ाई में वे अग्रणी भूमिका में रहीं,इसी कारण उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति की परामर्श दात्री समिति का सदस्य भी बनाया गया.एरमा ने ज्यादा कवितायेँ तो नहीं लिखी हैं पर उनकी कुछ प्रेरणात्मक कवितायेँ बहुत लोकप्रिय हैं.बहुतेरे कविता संकलनों में शामिल उनकी प्रस्तुत कविता उस समय लिखी गयी जब गुर्दे की असाध्य बीमारी से जूझती हुई वे आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही थीं.
अगर एक बार फिर से जीने को मिलता
अगर एक बार फिर से जीने को मिलता
तो बीमार होने पर मैं बिस्तर पर दुबक के आराम करती..
और इस गफलत में तो कतई न रहती
कि एक दिन मेरे काम न करने से
ये पृथ्वी छोड़ देगी
अपनी धुरी पर गोल गोल घूमना..
मैं गुलाब जैसी दिखने वाली मोमबत्ती जलाती जरुर
जो पड़े पड़े गर्मी से पिघल के
होने लगी थी बदशकल..
मैं खुद बतियाती काम
और सुनती दूसरों कि ज्यादा से ज्यादा
आए दिन दोस्तों को डिनर पर जरूर बुलाया करती
चाहे कालीन दागो दाग
और सोफा बदरंग ही क्यों न दिखता रहता...
करीने से सजी धजी बैठक में
पालथी मार के बैठी बैठी खाती पॉप कोर्न..
इसकी ज्यादा परवाह नहीं करती
कि फायेर प्लेस में आग जलाने से
इधर उधर उड़ने बिखरने लगती है राख...
दादा जी के जवानी के बेसिर-पैर के
धाराप्रवाह बतंगड़ को सुनने को
बगैर कोताही बरते देती ढेर सारा समय...
चाहे झुलसाने वाली गर्मी हो
तब भी चढाने को न कहती कार का शीशा
और अच्छी तरह सजे संवारे बालों को
उड़ उड़ कर बिखरने देती बे तरतीब...
घास से लग जाने वाले धब्बों की चिंता किये बगैर
बच्चों के साथ लान में पसर कर बैठती
और खूब बैठा करती...
टीवी देखते हुए कम और जीवन को निहारते हुए ज्यादा
रोया करती जार जार
फिर अचानक हंस पड़ती
बे साख्ता...
कुछ खरीदने को जाती
तो यह विचार मन में बिलकुल न लाती
कि इस पर मैल न जमे कभी
या कि ये साथ निभाता रहे मरते दम तक ही...
मैं कभी नहीं करती कामना
अपने गर्भ के आनन् फानन में निबट जाने की
और एकएक पल का आनंद
इस एहसास के साथ लेती
कि मेरी कोख में पल रहा यह अद्भुत प्राणी
ईश्वर के चमत्कार में हाथ बंटाने का
मेरे सामने इकलौता और आखिरी मौका है..
बच्चे जब अचानक पीछे से आते
और चूम लेते मेरे गाल
तो ये भूल के भी न कहती:
अभी नहीं...बाद में..
अभी हटो यहाँ से..
और हाथ धो कर आ जाओ खाना खाने की मेज पर...
मेरे जीवन में खूब सघन होकर तैरते होते
आई लव यू और आई एम सॉरी जैसे तमाम जुमले..
अगर एक बार फिर से जीवन
जीने को मिल जाता तो...
मैं पकड़ लूंगी एक एक पल को
देखूंगी..निहारूंगी..जियूंगी..
और बिसारुंगी तो कभी नहीं..
छोटी छोटी बातों पर छोडो पसीना बहाना
इसकी भी ज्यादा फ़िक्र मत करो
कि तुम्हे कौन करता है पसंद कौन ना पसंद
किसके पास क्या है...कितना है..
या कौन कौन कर रहा है क्या क्या..
प्यार करने वाले सभी लोगों के साथ के
साझेपन का आनंद चखो...
उन तमाम चीजों के बारे में ठहर कर सोचो
जिनसे ईश्वर ने हमें समृद्ध किया है..
ये भी जानने की कोशिश करो
कि क्या कर रहे हो
अपनी मानसिक,शारीरिक
भावनात्मक और आध्यात्मिक बेहतरी के लिए..
जीवन इतना खुला और अ-सीमित भी नहीं
कि इसको यूँ ही फिसलता हुआ गुजर जाने देते रहें..
बस ये तो एक आखिरी मौका है
इकलौता मौका
एक बार जब ये बीत गया
तो समझो बचेगा नहीं कुछ शेष...
मेरी दुआ है
आप सबके आज पर
हुमक कर बरसे ईश्वर की कृपा...
-चयन और अनुवाद- यादवेन्द्र
शुक्रवार, मार्च 05, 2010
जहाँ से मिट जाएँ सभी तरह के डर...
इब्तिसाम बरकत फिलिस्तीन मूल के उन सक्रिय मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और रचनाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपने जन्म स्थान से बल पूर्वक विस्थापन का दंश बचपन में झेला है..जेरुसलम के पास के एक गाँव में जनमी बरकत को तीन साल की उम्र में ही १९६७ का अरब-इस्राएल युद्ध देखना पड़ा और अपना जन्मस्थान छोड़ने को मजबूर होना पड़ा. अपने इस अनुभव को उन्होंने अपने बहुचर्चित संस्मरण में प्रस्तुत किया है-उनका कहना है कि सिर्फ छह दिन तक चले इस युद्ध में दो लाख से ज्यादा फिलिस्तीनी लोगों को अपना जन्म स्थान छोड़ने को मजबूर होना पड़ा.फिलिस्तीन देश के नक़्शे से मिटा दिए जाने के बाद उनको इस्राएल का नागरिक बन के स्नातक तक कि पढाई वेस्ट बैंक में करनी पड़ी,पर आगे की पढाई के लिए वे अमेरिका आ गयीं .वहां रहते हुए उन्होंने कई तरह के कम किये--अध्यापन से लेकर पत्रकारिता और लेखन तक. वे दुनिया भर में होने वाले मानव अधिकार हनन का विरोध करने के साथ साथ युद्धों का भी मुखर विरोध करती हैं.उन्होंने भाषाओँ की नैतिकता और वंचित लोगो की आपबीती रिकॉर्ड करने के नए नए प्रयोग किये हैं.अरब देशों और इस्राएल की जनता के बीच साझा रचनात्मक सेतु बनाने की उनकी कोशिशों को भरपूर सराहना मिली है. यहाँ प्रस्तुत है उनकी दो छोटी कवितायेँ, जिसे बड़े यादवेन्द्र जी ने ख्वाब का दर के लिए फराहम कराया है. चयन और अनुवाद उन्हीं का है.फिलिस्तीन
इब्तिसाम बरकत
ऑफिस में सामान मुहय्या कराने वाले स्टोर का
पुराने सामान की सेल वाला बही खाता खंगालते हुए
मैं तय्यारी कर रही हूँ
कि खरीद लूँ दुनिया ---
एक अदद ग्लोब
बस पचास डॉलर का ही तो है
विक्रेता कहता है १९५ देश खरीद लीजिये
बस पचास डॉलर में..
मैं सोचती हूँ:
इसका मतलब तो ये हुआ
कि कुल जमा पचीस सेंट का पड़ा एक देश..
क्या मैं आपको दूँ एक डॉलर
तो आप इस ग्लोब में शामिल कर लोगे
फिलिस्तीन?
आप इसको किस जगह रखना चाहती हैं?
उसने पलट के पूछा...
जहाँ जहाँ भी रहते हैं
फिलिस्तीनी...
पेंसिल
पत्थर की मस्जिद
पेंसिल की मानिंद खड़ी है
हमारे गाँव के बीचो बीच
युक्लिप्टस के दरख्तों से भी
ऊँची...
इसकी मीनारें
गुनगुनाती रहती हैं
आसमान के कानों में
जब तक लोग देते नहीं जवाब...
यहाँ आते ही हम
जूते चप्पल खोल के
खड़े हो जाते हैं
इबादत करने को लाइन बना कर...
हम दुआ मांगते हैं
कि जहाँ से मिट जाएँ तमाम लड़ाईयां ...
मिटा दो...मिटा दो....
हम दुआ मांगते हैं
कि जहाँ से मिट जाएँ सभी तरह के डर...
मिटा दो...मिटा दो...
हर रोज की इबादत में
हम यही दुहराते रहते हैं
बार बार....
कि हर किसी को आशीष मिले
अमन चैन का....
मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010
गंगोत्री ग्लेशिअर प्रति वर्ष पीछे खिसक रहा है- यादवेंद्र
आज कल पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन की बात खूब जोर शोर से उठाई जा रही है...ये ऐसा विषय है जिस पर राजनीति तो सर चढ़ के बोल रही है,पर राजनीतिक लोग भी जिस आधार को ले कर शोर मचा रहे हैं वो है वैज्ञानिकों द्वारा दुनिया के अलग अलग हिस्सों में किये गए दीर्घ कालिक अध्ययन.भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में इसको सही ठहराने के लिए कई शोध परियोजनाएं चल रही हैं और अनेक विश्विद्यालय,संस्थान और गैर सरकारी संगठन इस दिशा में सक्रिय हैं.हिमालयी ग्लेशिअर --खास तौर पर गंगोत्री ग्लेशिअर -- के बहुत तेजी से पिघलने की बात कई अध्ययनों में सामने आयी है...हांलाकि जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए कोपेनहेगेन में आयोजित विश्व सम्मेलन से ठीक पहले भारत के पर्यावरण मंत्री ने ये कह के सबको हैरत में डाल दिया कि ग्लेशिअर के पिघलने कि बात सही है पर जलवायु परिवर्तन ही इनका कारण है ये साबित करना मुश्किल है.पिछले साल अगस्त में संसद में दिए बयान में इन्ही मंत्री महोदय ने कहा था कि पिछले तीन दशकों के आंकड़े देखें तो पाता चलता है कि गंगोत्री ग्लेशिअर १८-२५ मीटर प्रति वर्ष कि रफ़्तार से पीछे खिसक रहा है--ध्यान देने कि बात है कि इस से पहले के आंकड़े बताते हैं कि इसके पिघलने कि रफ़्तार काफी कम थी. भारतीय वैज्ञानिकों के एक शोध पत्र में दिया गया उपग्रह चित्र इसकी पुष्टि करता है.उत्तराखंड के एक गैर सरकारी संगठन ने नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क में बसे १६५ गांवों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि भागीरथी घाटी के सालों भर प्रवाहमान बने रहने वाले ४४% जलस्रोत या तो सूख गए या फिर इनमे जल प्रवाह बरसाती भर हो के रह गया.सर्दियों में इन इलाकों में बारिश और बर्फ काम पड़ने लगी,सर्दियों की अवधि कम से कम एक महीना सिमट गयी.बरसात की निरंतरता में कमी आयी है--अब ये कम समय में और कम क्षेत्र में सिकुड़ गयी है,पर साथ साथ इसकी तीव्रता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है.अल्मोड़ा के गोविन्द बल्लभ पन्त संस्थान के अध्ययन बताते हैं कि पिछले दो दशको में कम समय में तीव्र वारिश की घटनाएँ अलकनंदा घाटी में बढ़ी हैं.
ऊंचाई वाले इलाकों में बुरांश,फ्यूली और काफल परंपरागत समय से पहले देखे जाने लगे हैं---कई बार तो डेढ़ महीना पहले तक.ये बात किसी एक साल की नहीं है बल्कि सालों साल ऐसा देखा जा रहा है.एक अध्ययन तो यहाँ तक कहता है कि जलवायु परिवर्तन की यही गति बनी रही तो ब्रह्मकमल जैसा ईश्वरीय फूल पांच सालों में ही विलुप्त हो जायेगा.दर असल ब्रह्मकमल निरंतर बर्फ से ढके ३०००-४००० मीटर ऊँचे स्टालों पर उगता है.जलवायु परिवर्तन के कारण पहले बर्फ से ढके रहने वाले इलाके भी धीरे धीरे सिकुड़ रहे हैं--अब बर्फ की परतें ऊपर की ओर खिसकती जा रही हैं, इस लिए इनमे उगने वाले वनस्पति भी बर्फ की परतों के साथ ज्यादा ऊंचाई पर स्थानांतरित होते जा रहे हैं.ऊपर खिसकते जाने की भी एक संभव सीमा है और अपने चरम पर पहुँचने पर इन वनस्पतियों और जीवों को खुद को बचाए रखना बेहद मुश्किल होगा.
इन वैज्ञानिक अनुसंधानों की बाबत यहाँ रेखांकित की जाने वाली बात ये है कि जलवायु परिवर्तन के सूचक कारकों का जायजा आम आदमी के अनुभव जगत में दर्ज --बगैर वैज्ञानिक कारणों की समझ हुए भी---घटनाओं की पृष्ठभूमि में पहली बार लिया गया है. नंदा देवी पार्क में किये गए एक विज्ञानी अध्ययन में आम लोगों ने जो अ-साधारण मौसमी परिवर्तन महसूस किये वे हैं: तापमान का बढ़ना,बर्फबारी की अवधि कम हो जाना,सेब की फसल कम होना,ऊंचाई वाले इलाकों में गोभी मटर टमाटर ,सर्दी की फसलों का कम समय में पक जाना, कीड़े मकोड़ों का बढ़ता हुआ प्रकोप,मार्च-मई में बरसात की मात्रा का कम हो जाना, आम तौर पर जुलाई अगस्त ममे होने वाली बर्फ बारी का एक महीना बाद खिसक जाना,सर्दियों की बरसात का दिसम्बर जनवरी से खिसक के जनवरी फरवरी में चला जाना,सर्दियों की फसल की बुवाई में देरी,गेंहू और जौ की उपज में कमी इत्यादि.सर्वेक्षण बताता है की बरसात और बर्फ बारी में कमी की बात ९०% से ज्यादा लोग मानते हैं.
आशा की जानी चाहिए कि बड़े शहरों में बनायीं गयी ऊँची वातानुकूलित इमारतों में बैठ कर शोध करने वाले सरकारी वैज्ञानिक अपने शोध की दिशा निर्धारित करने में भविष्य में भी इसी तरह आम लोगों की बात को गौर से सुनते और दर्ज करते रहेंगे. इस सन्दर्भ में मुझे कुछ साल पहले विज्ञानं की दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर में पढ़ी एक रिपोर्ट याद आती है जिसमे बीती सदी की अंग्रेजी लेखिका जेन ऑस्टेन के उपन्यास एम्मा का जिक्र था कि जब ये प्रकाशित हुआ तो इसमें फूलों से भरे सेब के बाग़ को ले कर लेखिका पर बहुतेरे लांछन लगाये गए थे ---ये कहा गया था कि इस ऐशो आराम में रहने वाली लेखिका को इतना तक नहीं पाता कि सेब के वृक्ष फूलों से कब गदराते हैं,जिस मौसम का जिक्र करते हुए सेब के फूलों कि चर्चा कि गयी थी आम तौर पर ब्रिटेन में उन दिनों सेब के पेड़ पर फूल लगते नहीं. पर उपन्यास के प्रकाशन के कोई ९०-९५ साल बाद एक प्रसिद्द मौसम विज्ञानी ने उपलब्ध मौसमी आंकड़ों की छान बीन करके ये बताया कि जेन ऑस्टेन ने जिस साल का जिक्र किया है उस साल ब्रिटेन में रिकॉर्ड गर्मी पड़ी थी और सेब के बागों में समय से पहले फूल आ गए थे---इस बात की आधिकारिक पुष्टि की जा सकती है.
इस उदाहरण से ये सबक तो मिलता ही है कि आम जनता को अनपढ़ गंवार मान लेने की गलती वैज्ञानिकों को नहीं करनी चाहिए...और अनुसन्धान की दिशा क्या हो इसके निर्धारण में उनको गौरव पूर्ण और न्यायोचित हिस्सेदारी दी जानी चाहिए...