दफ्तरी कंप्यूटर पर अफसरी रौब में डिक्टेट करवाई अफसर-कवि ने
नाभिदर्शना सेक्रेटरी को पूरी गंभीरता से संचिका-हस्ताक्षरी-सत्र में कविता
जगण, मगण, तगण का रखा पूरा ख्याल रखते हुए
घोंट डाला था विद्यार्थी जीवन में ही अफसर-कवि ने पूरा भारतीय काव्यशास्त्र
और तभी से वे पूरे परिवार में माने गए अपनी कौशल्या की नजरों में भी
भये प्रगट कृपाला...
संपादकों के लिए खुली रहती है हमेशा उनके दफ्तर में विज्ञापन देनेवाली फाइल
और पधारित शाम को मद्याधारित पूरी खाली और खुली शाम
जो लघु-पत्रिकाओं के महत्वपूर्ण पृष्ठों पर काव्य-रूप में सार्थकता पाती है
ऐसी ही शामों में नफरतों, अफवाहों और गालियों से गर्म होती
राजधानी की ज्यादातर महफिलों में तय होते हैं पुरस्कार
तय होती हैं समीक्षा के लिए पृष्ठों की संख्या और आलोचना जगत में
मुनादियों की बारंबारता का प्रतिशत पूरे हिसाब-किताब के साथ
पुरस्कारोत्सुकी आत्माएं अक्सर चक्कर काटती दीखती हैं इन शामों में
दावतों और हें.हें..हें टाइप हँसी की पूरी अश्लीलता को सख्ती से दरकिनार करते हुए
इन्हें कोई जरूरत नहीं यह जानने की कि मुक्तिबोध के जीते जी
उनका एक भी कविता-संग्रह नहीं छप सका और पागल के आभूषण से नवाजे गए
दारागंज में भटकते हुए निराला साहित्य अकादमी के बेखबरी से बेपरवाह
फणीश्वरनाथ रेणु भी अपने नाम के अनुकूल महज एक धूल के कण समझे गए
आज तुक्कड़ों के वार्डरोब में शाल रखने की जगह नहीं बची
और अंटा पड़ा है उनका नफीस ड्राइंग रूम प्रशस्ति-पत्रों से
जहां किसी रियासत के महाराज की तरह उनकी छाती पर लटकते मोबाइल पर
अनवरत सूचना आती रहती है रसरंजक शामों को रंगीन करने
राजधानी के सबसे महंगे इलाके बेहद महंगे और नफासतपसंद क्लब में
इस दौर में निराला को याद मत करो
मत करो चर्चा उस मुंहफट नागार्जुन की जो पैदा ही बाबा बनकर हुआ था
और सब के रसोईघर तक सीधे घुसपैठ कर लेता था
इस प्रजाति के कवियों की कोई जगह नहीं दीखती सांझ-गोष्ठी के रसरंगी आकाओं के बीच
हम जो देखते हैं वह कभी नहीं लिखते
हम जो बोलते हैं वह कभी नहीं लिखते
हम जो करते हैं वह कभी नहीं लिखते
हम वही करते हैं जो हमारा समीकरण कहता है
संस्कृति पुरुष ने इन दिनों बहुतेरे अफसरों को रुपांतरित किया है काव्य-पुरुषों में
और जाहिर है आभार के भार से दबे काव्य-पुरुष जो कर सकते हैं एवज में
वह करते रहते हैं पूरी निष्ठा से संचिका-निबटाऊ-सत्र में
उनके लिए विदेशी दौरों, कमिटियों और रसरंजक शामों के लिए हलकान.....
कठिन है रहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो/बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो/तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है/मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो
शनिवार, मार्च 08, 2008
इरफान की क्या टूटी और क्या बिखरी है...दोस्तो?
वे जोड़ेते कितना हैं और तोड़ते कितना हैं यह कितने लोगों को पता है दोस्तो? क्या-क्या उनका टूटा है और कहां-कहां बिखरा है, आए दिन बिखरता रहता है यह पता है ब्लागिंग की दुनिया के बाश्शाओ? इसी दिल्ली में एक प्यारे इनसान हैं और मेरे दोस्त हैं, इत्तफाकन वे भी इरफान हैं और दोस्तो वे जनसत्ता में रोज कार्टून बनाकर वक्त की नब्ज पर उंगली रखते हैं....और दूसरे ये साहब हैं जो कुछ-न-कुछ तोड़कर वक्त के लूप होल्स में उंगली करते रहते हैं। इन दिनों ये साहब ब्लाग में कुछ-कुछ चीजें बिखेरते रहते हैं।
इरफान साब अच्छे इनसान हैं, मगर जबानदराज कुछ ज्यादा ही हैं। पिछले छह-सात महीनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई है, अलबत्ता फोन पर गुफ्तगू कभी-कभी हो जाती है। पिछली मुलाकात श्रीराम सेंटर में हुई थी जहां तंजो-मिजा की दुनिया के बेताज बादशाह और मेरे अजीज मुज्तबा हुसैन साहब की किताबों की निंदा करते हुए वे उसे कबाड़ी को बेचने की बात कह रहे थे। मगर उनके साथ एक साहब थे जिन्होंने उनको इस जबानदराजी पर लताड़ा भी। जम्हूरित में सबको हक है कि वह किसे पसंद करे और किसे नापसंद करे, सो जाहिर है यह हक उनको भी है। जम्हूरियत में सब चलता है जनाब इरफान साहब और आपकी बोलने की आजादी पर अगर कभी किसी तरह की आंच आये तो यह बंदा आपके साथ है। लेकिन बंदिशों की आड़ में टी.आर.पी. की राजनीति या गुटबंदी की राजनीति करना आपके प्रोफेशनल लाइफ के हिसाब से तो मुफीद हो सकता है मगर ब्लागिंग के व्यापक हित में नहीं है यह सब लंतरानियां।
इरफान साब अच्छे इनसान हैं, मगर जबानदराज कुछ ज्यादा ही हैं। पिछले छह-सात महीनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई है, अलबत्ता फोन पर गुफ्तगू कभी-कभी हो जाती है। पिछली मुलाकात श्रीराम सेंटर में हुई थी जहां तंजो-मिजा की दुनिया के बेताज बादशाह और मेरे अजीज मुज्तबा हुसैन साहब की किताबों की निंदा करते हुए वे उसे कबाड़ी को बेचने की बात कह रहे थे। मगर उनके साथ एक साहब थे जिन्होंने उनको इस जबानदराजी पर लताड़ा भी। जम्हूरित में सबको हक है कि वह किसे पसंद करे और किसे नापसंद करे, सो जाहिर है यह हक उनको भी है। जम्हूरियत में सब चलता है जनाब इरफान साहब और आपकी बोलने की आजादी पर अगर कभी किसी तरह की आंच आये तो यह बंदा आपके साथ है। लेकिन बंदिशों की आड़ में टी.आर.पी. की राजनीति या गुटबंदी की राजनीति करना आपके प्रोफेशनल लाइफ के हिसाब से तो मुफीद हो सकता है मगर ब्लागिंग के व्यापक हित में नहीं है यह सब लंतरानियां।
गुरुवार, मार्च 06, 2008
हम कहां पैदा हों क्या यह किसी के हाथ में है?
कौन कहां पैदा होगा, किस जाति, किस घर में पैदा होगा यह किसी के वश में है क्या? लगता है यह बाल ठाकरे के वश में था कि वह मराठा कुल में पैदा होंगे और हर हाल में महाराष्ट्र में ही पैदा होंगे। शायद इसीलिए अपने भतीजे को एक समय बर्ड लू से ग्रस्त चूजा बतानेवाले बाल ठाकरे ने भी अंतत: वही भाषा बोलने लगे जिस भाषा के दम पर उन्होंने महाराष्ट्र में अपनी राजनीति की शुरुआत की थी। भारत का संविधान अपने अनुच्छेद 14 में प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार देता है। देश के किसी भी भाग में रहने और जीने का अधिकार देता है। फिर भारत के संविधान को अपनी रखैल समझनेवाला ठाकरे क्या इस देश के कानून और संविधान से भी बड़ा है? कभी आमची मुंबई और कभी मी मुंबईकर का खटराग अलापने वाले बाला साहब ठाकरे के सुभाषितों पर एक नजर डालिये-
1. दरअसल बिहारियों का भेजा ही सड़ा हुआ है।
2. बिहारी तो जिस थाली में खाते हैं, उसी में थूकते हैं।
3.बिहारी गोबर खाते हैं। आखिर वह गोबर के कीड़े हैं और गोबर में ही खुश रहते हैं।
4. बिहार नरक पुरी है, वहां के नेता पशुओं का चारा खा जाते हैं।
5. पंजाब में भी बिहारियों को पसंद नहीं किया जाता है।
अपने को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पहरुआ बताने वाले बाल (अब ये मत पूछिये कि कहां के बाल?) ठाकरे कभी मुसलमानों को देशद्रोही कहते हैं, कभी बांग्लादेशियों को बाहर निकालने की बात करते हैं तो कभी हिंदूओं पर ही पिल पड़ते हैं। घृणा के ऐसे प्रचारकों से जिस तरह की राजनीति संभव हो सकती है वह देश के हाकिमों को शायद नहीं दीख रही है...और हम किसी राज्य विशेष में पैदा होने के अपराध में कभी असम में, कभी पंजाब में और अब महाराष्ट्र में मारे जा रहे हैं।
शनिवार, मार्च 01, 2008
कल खोई थी नींद जिससे मीर ने, इब्तिदा फिर वही कहानी की
इस्मत आपा की कहानी लिहाफ को लेकर उनको कोर्ट के कटघरे तक घसीटा गया। चचा मंटो तो अपनी भाषा और कहानी के डायलाग के लिए आज तक बदनाम हैं। नैतिकता के अलंबरदारों ने उन्हें भी अदालत में घसीटा और आज भी जब उर्दू के क्लासों में मंटो पढ़ाए जाते हैं तो रोजा-नमाज के पाबंद और शीन-क़ाफ के मुआमले में दुरुस्त आलिम नाक-भौं कुछ यों सिकोड़ते हैं गोया नौकरी की मजबूरी न होती तो वे मंटो साहब के अफसानों को भूलकर भी न छूते। पर किस्मत के मारे बेचारे छूते हैं और पढ़ाने को मजबूर भी हैं। तहमीना दुर्रानी, तसलीमा नसरीन जैसी खबातीनों की एक पूरी जमात अदब में मौजूद है जिन्होंने इस्लाम और श्लील-अश्लील के दायरे से बाहर जाकर अपनी बात कही।
कुछ सालों पहले जब समकालीन हिंदी की कथाकार लवलीन ने अपनी कहानी चक्रवात लिखी थी तो संपूर्ण लिंगाकार व्यक्तित्व के मालिक भी हंस में महीनों तक राजेन्द्र यादव और लवलीन को गरियाते रहे थे। भाषा और गाली को लेकर एक बार फिर हिंदी ब्लालिंग की दुनिया में हलचल मची हुई है। अफसोस यह कि यह हाय-तौबा वे लोग मचा रहे हैं जिनकी छवि बोलने की आजादी के बड़े पैरोकारों की रही है। वे हैं भी, मगर पता नहीं क्यों इतना ज्यादा उतावलापन और जल्दबाजी के शिकार हो रहे हैं। काशीनाथ सिंह के काशी का अस्सी किताब का क्या करोगे साहिबो? साहित्य अकादमी पुरस्कार के दौर में कई बार पहुंची यह कृति राजकमल प्रकाशन की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में से है। इसे हिंदी के आलोचकों ने भी श्रेष्ठ रचना का तमगा दिया हुआ है। मुझे लगता है अगर इस किताब को धारावाहिक रूप से ब्लाग पर शाया किया जाए तो नैतिकता के सिपाही शायद कराहने लगेंगे।
बार-बार फिर श्लील-अश्लील के बहस में उलझकर हिंदी ब्लागिंग वहीं पहुंचता हुआ दीख रहा है जहां से नारद एग्रीगेटर के खिलाफ कुछ लोगों ने मुहिम छेड़ी थी। प्रतिबंध और यह इस तरह की बहसें न केवल ब्लाग की अवधारणा के ही खिलाफ है बल्कि यह किसी भी लाइन से लोकतांत्रिक कदम नहीं है। अगर इसी तरह हम भी प्रतिबंधों, श्लीलता-अश्लीलता की राजनीति करना चाहते हैं तो फिर सांप्रदायिक ताकतों के लिए करने को क्या बचेगा दोस्तो? आमीन।
सोमवार, फ़रवरी 25, 2008
किसी भी देश में भूखे पेट सोना गैरकानूनी क्यों नहीं होता?
वे सस्ते में देश बेचते हैं, सस्ते में ईमान बेचते हैं और न जाने सस्ते में क्या-क्या नहीं बेच डालते हैं. मगर कोई गरीब अगर अपना अंग बेचता है तो सरकार हाय-तौबा मचाने लगती है। आत्महत्या करना जुर्म है लेकिन भूखे पेट सोना और तिल-तिल करके मरना जुर्म नहीं है। संविधान का अनुच्छेद २१-ए हमारे जीन के अधिकारों की हिफाजत करने का दावा करता है। मगर क्या वाकई? बनारस के गरीब बुनकरों की बड़ी फौज अपने बाल-बच्चों का पेट भरने के लिए खून बेच-बेचकर घर चलाया और जब खून भी न बचा तो मर गए। यहां खून बेचना वैध है, गुर्दा बेचना वैध है और अफसोस कि इस हालत तक पहुंचाने वाले लोगों के सभी कृत्य भी वैध हैं। कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि बांग्लादेश में ग़रीबी से बदहाल एक महिला ने रोज़ी-रोटी चलाने के लिए अपनी आँख बेचने के लिए विज्ञापन दिया है. बांगलादेश में किसी भी अंग को बेचना ग़ैरकानूनी है. लेकिन क्या कोई यह सोचता है कि किसी भी देश में भूखे पेट सोना गैरकानूनी क्यों नहीं होता? शनिवार, फ़रवरी 23, 2008
उमा खुराना के कपड़े फाड़े और इज्जत भी मगर चुप हैं सब
होली आ रही है। मगर दिल्ली के वे लोग, जो अपनी बच्चियों को कथित रूप से अनैतिक होने से बचाना चाहते थे-ने भीड़ में मौका पाकर उमा खुराना को पतित करने में जरा भी देर नहीं लगाई। घोर नैतिक लोग मौके ढूंढते रहते हैं कैसे रंग लगाने के बहाने किसी नाजुक अंग पर हाथ साफ करने और रंग जमाने का मौका मिल जाए। इस डर से कई बार भौजाइयां दरवाजा ही बंद कर लेती हैं। मगर बिचारी उमा खुराना किसी तरह भी अपने कोमल अंगों को दबा-दबाकर मजा लेनेवाले भीड़ रणबांकुरों से अपना बचाव नहीं कर पाई। मामला फर्जी है या असली है इसे जाने बगैर जनता ने अपना इनसाफ करना शुरू कर दिया। उमा खुराना भीड़ के हत्थे चढ़ गईं और भीड़ ने कपड़े फाड़कर किस तरह समाज को अनैतिक होने से बचाया इसको बार-बार टी.वी. के वीरों ने दिखाया।बाद में मामला सारा फर्जी साबित हुआ। उमा के मामले को लेकर जांच शुरू हुई और वह निर्दोष करार दी गई। मगर सरकार ने कहा कि हम बहाल नहीं करेंगे। क्यों भई। इस पर सब चुप। वक्त मगर बीतता रहा और इधर खबर आई है कि उमा की बहाली का आदेश निकल गया है। कई लोग समाज और मीडिया के नैतिक पुलिस द्वारा पहले ही दोषी करार दे दिये जाते हैं और जिंदगी भर के अपने मोहल्ले और अपने विभाग में मजाक का एक सामान भर बनकर रह जाते हैं।
भंवरी देवी का क्या हुआ? क्या हुआ दो-दो शौहर के पाट में पिसकर मर जानेवाली गुडि़या का? सरे बाजार इज्जत को नीलाम करने वाले नैतिकता के सारे सिपाही चुप हैं-समाज के, धर्म के और परम उत्साही मीडिया के लोग भी।
बुधवार, फ़रवरी 20, 2008
साला सब हंसकर निकल जाता है अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
ये कायकू कैता है मेरे कू बोलने का नइ
अपुन नइ बोलेंगा तो और कोन बोलगा मेरे वास्ते
तू इदरीच आके मेरे कू जास्ती बोलने से रोकता है भिडु
कि ये साला भाई लोग जरूर खल्लास करेगा मेरे को किसी दिन
ये साले भंडुवे ठुल्ले रोज आकर वसूलते हैं अपना हिस्सा
और फिर भी दांत दिखाके कैसा एहसान दिखाता है नेता के माफिक
भाई तो कभी भी आ जाता है हफ्ता वसूलने पूरे लश्कर के साथ
अपुन कैसा चूतिया के माफिक खाली देखता रह जाता है,
ये भड़ुंवागिरी तो भिडु मरवाने से भी बुरा है
मगर सेठ लोग जो साला मार-मार के लोगों को माल बनाता है
और कमाठीपुरा में अपुन लोगों पर धौंस दिखाता है
कभी पोलिस का तो कभी नोटों के बंडल का ताबड़तोड़
ये जो पेज थ्री पार्टियों में डीलिंग करते हैं बड़े-बड़े धंधों का
हार्लिक्सी नस्ल की लौंडियों को पेश करके रोशनी के भीतर के अंधरे में
सेठ लोग ये साला बड़ी-बड़ी फैक्ट्री चलाता, पैसा बनाता और इज्जतदार हो जाता है
भंडुवागिरी करके वह साला समाज और सरकार दोनों का बाप बन जाता है
अब तो हमारा यह सरकारी और सामाजिक बाप
कमाठीपुरा को उजाड़ने का ले आया है आर्डर
चलाएगा बुलडोजर और साफ करके खेत बना डालेगा हमारी खोली को
जहां बननेवाले बड़े-बड़े मॉल में आएंगी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में
बड़े-बड़े सेठों के घर में सप्लाई की जानेवाली हाई क्लास की सोशलाइटें
हमारा काम ताबड़तोड़ करेंगे सेठ लोग बिल्कुल पेशेवर की माफिक
दस पेटी, बीस पेटी माल इधर से उधर होगा मिनटों में
अपुन गटर के कीड़े की माफिक कुलबुलाते हुए जीने के लिए भी
गिड़गिड़ाता रह जाएगा और आक्खा मुंबई से बुहारकर फेंक दिया जाएगा
हमारा कौन-सा देश है भिडु
साला तुम भी नहीं बोलता कुछ
वह देश ढूंढकर ला दे मेरे कू सारे जहां से अच्छा गाता है
बच्चा लोग म्यूनिस्पेलिटी के स्कूल में
अपुन को न कोई जीते जी जीने देता न मरने पर श्मशान में जगह देता
जिंदगी भर साला हरामी, आवारा सुन-सुनकर लात खाते हुए जीना....
मैं पूछता हूं सेठों, भाई लोगों से और दांत निकाले नेता लोगों से
कहां है मेरा देश, कौन है मेरे जीने के अधिकारों का पहरूआ?
बोलता कोई नहीं, साला सब हंसकर निकल जाता है
अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
अपुन नइ बोलेंगा तो और कोन बोलगा मेरे वास्ते
तू इदरीच आके मेरे कू जास्ती बोलने से रोकता है भिडु
कि ये साला भाई लोग जरूर खल्लास करेगा मेरे को किसी दिन
ये साले भंडुवे ठुल्ले रोज आकर वसूलते हैं अपना हिस्सा
और फिर भी दांत दिखाके कैसा एहसान दिखाता है नेता के माफिक
भाई तो कभी भी आ जाता है हफ्ता वसूलने पूरे लश्कर के साथ
अपुन कैसा चूतिया के माफिक खाली देखता रह जाता है,
ये भड़ुंवागिरी तो भिडु मरवाने से भी बुरा है
मगर सेठ लोग जो साला मार-मार के लोगों को माल बनाता है
और कमाठीपुरा में अपुन लोगों पर धौंस दिखाता है
कभी पोलिस का तो कभी नोटों के बंडल का ताबड़तोड़
ये जो पेज थ्री पार्टियों में डीलिंग करते हैं बड़े-बड़े धंधों का
हार्लिक्सी नस्ल की लौंडियों को पेश करके रोशनी के भीतर के अंधरे में
सेठ लोग ये साला बड़ी-बड़ी फैक्ट्री चलाता, पैसा बनाता और इज्जतदार हो जाता है
भंडुवागिरी करके वह साला समाज और सरकार दोनों का बाप बन जाता है
अब तो हमारा यह सरकारी और सामाजिक बाप
कमाठीपुरा को उजाड़ने का ले आया है आर्डर
चलाएगा बुलडोजर और साफ करके खेत बना डालेगा हमारी खोली को
जहां बननेवाले बड़े-बड़े मॉल में आएंगी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में
बड़े-बड़े सेठों के घर में सप्लाई की जानेवाली हाई क्लास की सोशलाइटें
हमारा काम ताबड़तोड़ करेंगे सेठ लोग बिल्कुल पेशेवर की माफिक
दस पेटी, बीस पेटी माल इधर से उधर होगा मिनटों में
अपुन गटर के कीड़े की माफिक कुलबुलाते हुए जीने के लिए भी
गिड़गिड़ाता रह जाएगा और आक्खा मुंबई से बुहारकर फेंक दिया जाएगा
हमारा कौन-सा देश है भिडु
साला तुम भी नहीं बोलता कुछ
वह देश ढूंढकर ला दे मेरे कू सारे जहां से अच्छा गाता है
बच्चा लोग म्यूनिस्पेलिटी के स्कूल में
अपुन को न कोई जीते जी जीने देता न मरने पर श्मशान में जगह देता
जिंदगी भर साला हरामी, आवारा सुन-सुनकर लात खाते हुए जीना....
मैं पूछता हूं सेठों, भाई लोगों से और दांत निकाले नेता लोगों से
कहां है मेरा देश, कौन है मेरे जीने के अधिकारों का पहरूआ?
बोलता कोई नहीं, साला सब हंसकर निकल जाता है
अपुन को अकेला चीखता छोड़कर
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