शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

भक्तिकाल या अनंतकाल वाया उत्तरकाल


यह कोई लोकसभा नहीं है जहां प्रश्नकाल होता हो और प्रश्नकाल जब फलप्रद-काल न हो तो वह अनुपस्थित-काल में बदल जाए। अजीब बात है कि साहित्यिक इतिहासों में भक्तिकाल को इतिहास के मध्यकाल से जोड़कर देखा जाता है, जबकि यह ऐसा काल है जो आज पहले से कहीं अधिक प्रतिबद्धता और निष्ठा से जारी है। सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी की तरह यदि आप ऐसे ही गीत गाते रहे तो रियल लाइफ में जीना मुहाल हो जाएगा। क्योंकि जीने के लिए चाहिए होती है भक्ति-प्रदर्शन और इसी के प्रदर्शन से मिलती से जीवन में शुभ-लाभ। भक्ति से पत्नी से लेकर बॉस तक प्रसन्न रहते हैं और शुभ-लाभ, योग-क्षेम मिलती रहती है। भक्ति से ही शक्ति मिलती है और शक्ति के अनुपात से आदर मिलता है। सो, शक्ति कुछ लोग भक्ति से तो कुछ लोग छीनकर प्राप्त करते हैं।

न जाने क्यों मुझे जीवन के हर कदम पर, हर दिन बार-बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी याद आते हैं। उनकी लिखी पंक्तियां याद आती हैं और याद आता है कुटज जो सिर उठाकर जीता है...पर भगवान को उठा हुआ सिर पसंद है? भक्तिकाल के आराधकों को शायद पता हो।

बुधवार, दिसंबर 09, 2009

कभी इस नज़र से देखिये पाकिस्तान को

पाकिस्तान के बारे में हमारे यहां कई तरह की छवि गढ़ी गई है। कई छवियां पाकिस्तान के आतंकियों ने और राजनीतिक आकाओं ने बनाने में मदद की है। अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान इस नाचीज़ ने कुछ तस्वीरें ली थीं, ज़रा नज़र-ए-इनायत करें और देखें कि कुदरत ने पाकिस्तान को कैसा बनाया है...





जीता भी जा चुका इसे हारा भी जा चुका


वसुधा के ताज़ा अंक में उर्दू के मशहूर शायर शहरयार द्वारा चुनी गईं कुछ पाकिस्‍तानी कविताएं प्रकाशित हुई हैं। यहां पेश है मेरे मित्र काशिफ़ हुसैन ग़ायर की दो ग़ज़लें। वे पाकिस्तान के जाने-माने शायर हैं और भारत के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान है।

एक

वो रात जा चुकी वो सितारा भी जा चुका
आया नहीं जो दिन वो गुज़ारा भी जा चुका

इस पार हम खड़े हैं अभी तक और उस तरफ़
लहरों के साथ-साथ किनारा भी जा चुका

दुख है मलाल है वही पहला सा हाल है
जाने को उस गली में दुबारा भी जा चुका

क्या जाते किस ख्याल में उम्रे खाँ गई
हाथों से जिंदगी का खि़सारा भी जा चुका

काशिफ हुसैन छोडिय़े अब जिन्दगी का खेल
जीता भी जा चुका इसे हारा भी जा चुका

दो

हाल पूछा न करे हाथ मिलाया न करे
मैं इसी धूप में खुश हूँ कोई साया न करे

मैं भी आखिर हूँ इसी दश्त का रहने वाला
कैसे मजनूं से कहूं खाक उड़ाया न करे

आईना मेरे शबो रोज़ से वाकिफ़ ही नहीं
कौन हूँ, क्या हूँ? मुझे याद दिलाया न करे

ऐन मुमकिन है चली जाय समाअत मेरी
दिल से कहिये कि बहुत शोर मचाया न करे

मुझ से रस्तों का बिछडऩा नहीं देखा जाता
मुझसे मिलने वो किसी मोड़ पे आया न करे

शुक्रवार, दिसंबर 04, 2009

कुछ पता चला बापजी और भैनजी का?


कल मेरे दफ्तर की एक सुंदर-सी कन्या संवाददाता को इस बात से बड़ी कोफ्त हुई कि कुछ मनचले लड़के, जो रास्ते चलती लड़कियों को छेड़ रहे थे, उन पर फब्तियां कस रहे थे, वे मनचले लड़के उन्हें देखते ही बोले, “यार ये तो आंटी हैं।“ ... और ये कहकर ल़ड़के आगे बढ़ गए। यह बात उस कन्या संवाददाता को बेहद नागवार गुजरी। उन्हें लगा कि क्या वे आंटी दिखती हैं? अरे वे तो अभी महज उन्नीस की हैं (आप जानते हैं शरीफ लोग लड़कियों से उम्र नहीं पूछते)। अरे, अब वे छेड़नीय भी नहीं रहीं? वे तो बाकायदा प्रियदर्शनी हैं, सो दर्शनीय तो हैं ही (उन्हें लगता है)। वे ऐसी अछेड़नीय तो खैर नहीं ही हैं। वे इसी बात से दुखी हो गईं कि लड़कों ने उन्हें छेड़ने के लायक भी नहीं समझा। अजीब है भई, लड़की को कोई छेड़ दे तो पुलिस और अभिभावक दुखी हो जाते हैं और न छेड़े तो लड़की दुखी हो जाती हैं।

कभी-कभी मुझे लगता है कि हरिशंकर परसाई को अभी कुछ दिनों तक जीना चाहिए था और वह भी अंतकाल दिल्ली में जरूर गुजारना चाहिए था. क्या पता कोई छेड़ेच्छुक युवती उन्हें पसंद कर लेतीं। सबसे बड़ी बात यह कि यहां की उर्वरा भूमि में उनकी व्यंग्य-फसल ज्यादा लहलहातीं और वे लहक-लहक कर हिंदी साहित्य को नए-नए मुद्दों पर लहकाने का कमाल दिखाते। ऐसा कमाल कि श्रीराम सेना, बजरंग दल वगैरह को कभी खाली नहीं बैठना पड़ता। तख्ती वालों की कितनी तख्तियां बिकतीं, कितना शाकाहारी विरोध प्रदर्शन होता और दिल्ली की जनता को एक लेखक की रचना के प्रताप से इस जाड़े में बहुत ताप मिलता। पर हाय अकेला छोड़ गए, बिल्कुल अकेले-अकेले।

एक बात आपके कान में मैं धीरे से कहता हूं, किसी से कहिएगा नहीं। पिछले दिनों मुझे पता चला है कि मैं वयोवृद्ध हूं। मैंने अपने कुंवारे दोस्तो को कहा, हठधर्मियों रहो कुंवारे। तुम अभी तक कुंवारे के कुंवारे ही रहे और इधर मैं वयोवृद्ध तक बन बैठा। अब ये मत कहिए कि आपकी उम्र तो अभी बत्तीस साल है। आप कैसे वयोवृद्ध हो गए? तो जनाब, बात यह है कि मुझसे दस-बारह साल उम्र में बड़े कंडक्टर और आटोरिक्शा वाले क्वीन विक्टोरिया की तरह नाइटहुट देने के अंदाज में मुझे अंकल का खिताब देते हैं। मैं इसे बखुशी ग्रहण करता हूं। पता नहीं वे अंकल शब्द का मतलब कितना जानते हैं, पर वे चतुर-सुजान इतना तो जरूर जानते हैं कि अंकल कहो तो साहब लोगों की बांछें खिल जाती हैं। हालांकि ये और बात है कि मुझे आज तक नहीं पता चला कि बांछें होती कहां हैं औऱ कैसे खिलती हैं या खिलखिलाती हैं। तो साहब, आटोवाले बड़े प्यार से मेरा अंकलीकरण संस्कार कर चुके हैं-कुछ-कुछ नामकरण संस्कार की तरह। यकीन मानिए, मुझे बड़ा मजा आता है अंकल सुन-सुनकर। भोपाल में तो तमाम लोग मुझे कुछ इस तरह अंकल कहते थे जैसे मैं पैदाइशी अंकल हूं। जब अंकली सूरत ही हो तो कोई क्या करे-यह कहकर इस नश्वर शरीर में वास कर रहे हृदय को मैं विदारक स्थिति में जाने से बचा लेता हूं। इस भतीजामय में संसार में यदि केशवदास रहते तो शायद वे भी चंद्रवदनियों के बाबा कहि-कहि जाने पर नाराज न होते। क्योंकि नहीं छेड़े जाने की वजह से मृगलोचनियां तो पहले से परेशान चल रही हैं।

पहले-पहल जब मैं दिल्ली आया था, तो अक्सर कानों में भैणजी की कर्णप्रिय आवाज जाती थी। एक मित्र ने बताया कि ये कहना तो चाहते हैं बहन जी, पर मातृभाषिक चाशनी में पगी जीभ से बहन जी, भैणजी बनकर स्वर-ग्रंथि से बाहर आती हैं। पर अब उदारीकरण के बाद से तो भैया जब भैणजी को भैणजी कहो तो वे एकदम से गुस्सा हो जाती हैं। उन्हें अब भैणजी नहीं, भाभी जी कहलाने में गर्वानुभूति होती है। दिल्ली के इस विकास-काल में भैणजी को भाभी जी बनते देखना कितना सुखद है। यकीन न हो तो आप नए उम्र के किसी सब्जी वाले, आटो वाले से पूछकर देख लें। ज्यादा टैम न हो तो गली के नुक्कड़ वाले परचूनिए से ही पूछ लें।

इस सर्व-भाभी युग में बेटों से मुझे ग्यारह हजार वोल्ट का झटका लगा। सरोजिनी नगर मार्केट गया था, स्वेटर खरीदने। बीस-बाइस साल का लड़का मालिक की गद्दी पर बैठा था। मैंने जब स्वेटर मांगा तो उसने पचास साल के सेल्समैन से कहा, बेटे सर को फटाफट स्वेटर दिखा। अरे बेटे, ये वाली नहीं, वो जो कल माल आया है उसमें से दिखा। मैं स्वेटर देखने की जगह उजबक की तरह एक बार काउंटर पर बैठे लड़के को देखूं, तो दूसरी बार उस पचास साला सेल्समैन को। अजीब झटका लगा मुझे। यह लड़का कितने सहज भाव से बाप की उम्र के आदमी को बेटा कह रहा है और वह आदमी भी कितनी सहजता से उसको बाप की उम्र का मान रहा है। मैंने सैल्समैन की ओर इशारा करके उस बाप जी से कहा, भाई साहब, क्या आपके बच्चे इन्हीं के उम्र के हैं? अरे वाह, आपकी तो उम्र का पता ही नहीं चलता है? बहुत करीने से आपने अपनी उम्र छिपाया है। लड़का मुझे उजबक की तरह देखने लगा। उसे लगा कि मैं शायद अभी-अभी चिड़ियाघर से सीधे सरोजिनी नगर में गिरा हूं। उसका बेटा, स्वेटरों की पहाड़ निकाल कर रख चुका था। मैंने खोदकर एक चुहिया जैसा स्वेटर निकाला और जल्दी-जल्दी पैसे चुकाकर भागा।

बुधवार, दिसंबर 02, 2009

जोश साहिब अपनी बीवी से बहुत डरते थे

जनाब जोश मलीहाबादी जितने बड़े शायर थे, जितने बेबाक और भावुक इंसान थे, जितने ख़ुशमिजाज़ थे, इस सबसे कहीं अधिक इश्क़ मिजाज़ भी थे। अपनी प्रसिद्ध किताब यादों की बारात में उन्होंने अठारह ऐसी हसीनाओं का उल्लेख किया है, जिनसे उन्होंने बक़ायदा इश्क़ किया। एक जगह वह लिखते हैं- ‘माहरूख़ों की नाशुकी होगी। अगर मैं इस बात का एतराफ़ न करूं कि इनके इश्क़ के बग़ैर मैं आदमी बन ही नहीं सकता था।’ लेकिन जोश साहिब अपनी बीवी से बहुत डरते थे। उनके इश्क़ की एक कहानी की दिलचस्प वारदात से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

एक बार जोश साहिब की वह महबूबा, जिसे समंदर में डूबने से बचाने के लिए तैरना नहीं जानते हुए भी मुंबई में जोश साहिब पानी में कूद पड़े थे, दिल्ली आई। जोश साहिब ने चार-पांच दिन उसके साथ गुज़ारने का प्रोग्राम बना लिया। दोस्तों ने उनके लिए शाहदरा में रहने की व्यवस्था कर दी तथा घूमने के लिए एक मोटरकार की भी। जोश साहिब ने अपनी बीवी से दो-एक मुशायरों में जाने का बहाना किया और घर से शाहदरा अपनी महबूबा के पास आ गए। एक शाम वह अपनी महबूबा को लेकर नई दिल्ली में घूम रहे थे कि उनकी बेग़म ने उन्हें देख लिया।


वह रुके नहीं, गाड़ी भगाकर ले गए। कुछ देर बाद वह अपने दोस्त कुंवर महिन्दर सिंह बेदी के पास पहुंचे, उन्हें सारी बात बताई और कहा, ‘जैसे भी हो, मुझे बचाओ वरना बेग़म मुझे ज़िंदा ही दीवार में चिनवा देगी।’ बेदी साहिब अगली सुबह ही जोश साहिब के घर गए, तो बेगम जोश ने कहा, ‘वह मरदूर मुझसे मुशायरे का बहाना करके गया है, लेकिन उस मुंबई वाली चुड़ेल को लेकर यहीं दिल्ली में घूम रहा है। कल कनाट प्लेस में अपनी आंखों से मैंने उन्हें देखा है।’ बेदी साहिब ने कहा, ‘भाभी मेरी तरह आप को भी धोखा हुआ है।


कल मैंने भी उन्हें कनाट प्लेस में देखा था, लेकिन क़रीब जाने पर पता चला कि वह जोश साहिब की शक्ल से मिलता-जुलता कोई दूसरा व्यक्ति है।’ बेगम जोश को कई तरह की बातों से बेदी साहिब ने विश्वास दिलाने की कोशिश की। वह शांत तो हो गईं, लेकिन उनका शक़ दूर नहीं हुआ। लौटकर बेदी साहिब ने जोश साहिब को सारी कहानी सुनाई तथा कहा कि बेगम साहिबा की पूरी तस्सली के लिए कोई और ड्रामा भी खेलना पड़ेगा। एक यह कि जिन दो मुशायरों में जोश साहिब ने जाना था, उनमें से एक कैंसिल हो गया है तथा वह कल दिल्ली लौट रहे हैं।


ऐसी झूठी तार बेगम जोश को भिजवा दी गई। दूसरे दीवान सिंह म़फ्तून साहिब अपने अख़बार रियासत की साठ-सत्तर प्रतियां एक बड़े रेशमी रूमाल में लपेटकर बेगम जोश से मिलेंगे और कहेंगे कि मैं आपका शक़ दूर करने के लिए धार्मिक पुस्तक साथ लाया हूं। मैं इस पवित्र पुस्तक की क़सम खाकर कहता हूं कि जोश साहिब अपनी किसी महबूबा के साथ दिल्ली में नहीं हैं, बल्कि मुशायरें में गए हैं। इस स्कीम के तहत म़फ्तून ने बेगम जोश के सामने ठीक ऐसा ही किया। झूठी क़सम खाई और अपने दोस्त को उसकी बेगम के कहर से बचाया।

सौजन्यः डॉ.केवल धीर

किससे डरते हैं पाकिस्तानी फौजी शासक?


क्या पाकिस्तानी फौजी तानाशाह अमेरिका से डरते हैं? नहीं। भारत से डरते हैं? नहीं। तब वे किससे डरते हैं? आपको जानकर हैरत होगी वे कद्दावर और जनप्रिय शायर से डरते हैं। मुझे भी पाकिस्तान में यह देखकर हैरत हुई कि जो परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान में किसी को कुछ नहीं समझते थे, वे मरहूम अहमद फराज साहिब का न केवल एहतराम करते थे, बल्कि उनसे डरते भी थे। इसी तरह फै़ज अहमद फै़ज से वहां के फौजी तानाशाह डरते थे। शायरी की ताकत से डरते थे।

पिछले साल मैं पाकिस्तान गया था। जियो टीवी के पत्रकार मेरे दोस्त जनाब अब्दुर रऊफ साहिब ने इस्लामाबाद में मेरे ठहरने का इंतिजाम कर दिया था। जहां मैं ठहरा था वहां से डेनमार्क दूतावास बिल्कुल पास था, मात्र सौ मीटर की दूरी पर। वहां से मैंने इंतिजार हुसैन (उर्दू के मशहर कथाकार) साहिब को लाहौर फोन मिलाया और औपचारिक दुआ-सलाम के बाद इस्लामाबाद में रह रहे मशहूर इन्कलाबी शायर अहमद फराज साहिब का फोन नंबर मांगा। जो उन्होंने तत्काल दे दिया। फराज साहिब ने कहा कि पनकज साहिब (ठेठ उर्दू वाले पंकज का इसी तरह उच्चारण करते हैं), आप पांच बजे शाम को हमारे गरीबख़ाने पर तशरीफ लाएं। कुछ और दोस्त भी आ जाएंगे। तो मैंने उन्हें कहा कि ठीक है फराज साहिब, पर रात डिनर के लिए हमें आठ बजे तक एवान-ए-सदर पहुंचना है। तो उन्होंने कहा बिल्कुल जनाब आपको सही वक्त पर हम वहां पहुंचा देंगे। सदर साहिब ने इस खाकसार को भी दावत दी है सो हम लोग साथ चले चलेंगे। मुझे लगा ये तो बहुत अच्छा हो गया। फराज साहिब से भेंट भी हो जाएगी और वहीं से उनके साथ डिनर में चले जाएंगे। यहां यह बताते चलें कि पाकिस्तान में भारत के मुकाबले महंगाई इतनी अधिक है मेरे तो पसीने छूट गए। दो किलोमीटर भी जाएंगे तो वहां आटो का किराया दो सौ से कम नहीं मांगते हैं।

फराज साहिब के यहां पहुंचे। तीन-चार और लोग आ गए। बातचीत होने लगी। शराब का दौर शुरू हो गया। फराज साहिब रोज पीने वालों में से थे और यह बात सबको मालूम थी। हँसी-कहकहों में कब आठ बज गए पता ही नहीं चला। मैंने धीरे से कहा, फराज साहिब, जरा जल्दी करें। आठ तो यहीं बज गए। इस पर फराज साहिब ने बहुत बेफिक्री से कहा कि बजने दो यार, जब हम पहुंचेंगे तभी आठ बजेगा एवान-ए-सदर में।

...और सवा नौ बजे हम तत्कालीन फौजी तानाशाह परवेज मुशर्रफ के एवान-ए-सदर में पहुंचे और मुझे बहुत हैरत हुई कि वाकई जब तक अहमद फराज साहिब नहीं पहुंचे, तब तक परवेज मुशर्रफ ने खाना शुरू नहीं होने दिया था। फराज साहिब से दुआ-सलाम के बाद मुशर्रफ ने जरा तंज़ करते हुए कहा अरे फराज साहिब आप बिल्कुल सही वक्त पर तशरीफ लाए। इस पर फराज साहिब ने नहले पर दहला मारा, हां, सदर साहिब, ये इंडिया से हमारे दोस्त आए हैं और इनको आपके यहां डिनर में आने की जल्दी थी, सो जरा पहले ही आ गए। मेरी हालत ये थी कि मैं एक बार परवेज मुशर्रफ की ओर देखूं तो दूसरी ओर फराज साहिब की ओर। मुशर्ऱफ झेंप गए थे।