मंगलवार, फ़रवरी 19, 2008

संवेदनशीलों को कैसे पागल करती है मुंबई?

बोधिसत्व को यह वहमी दुख है कि वे अकेले पड़ते जा रहे हैं और उन्हें चाहनेवालों की संख्या तेजी से घटती जा रही है। मैं सोचता हूं मुंबई की उस सांप्रदायिक प्रवृत्ति के बारे में जो कैसे दोस्तों को दोस्तों से अलगाकर पागल बनाती है और सागर की पछाड़ खाती लहरों की तरह हंस-हंसकर दुहरी होती है यह नगरी।अभी मराठी और गैर मराठीवाद के स्वयंभू नेता बनने की अश्लील कोशिश में मुब्तिला राज ठाकरे के अभियान राम प्रसाद और भीखू पाटिल नामक दो जिगड़ी दोस्त को अचानक मराठावादी राजनीति के लपेटे में ले लिया और यकबयक दोनों एक-दूसरे की संस्कृतियों की मां-बहन पर पिल पड़े. इस तरह के संग और मिलन का क्या करेंगे भाईजान?


याद करिये मरहूम मंटो साहिब की किताब मीनाबाजार में अभिनेता श्याम के बहाने मुंबई के दंगों का मंजर और विभाजन के बाद के हालात का बयान। श्याम ने पाकिस्तान से लुट-पिटकर मुंबई पहुंचे एक सरदार से वहां की घटना के बारे में सुनने के बाद मंटो से कहा कि वह एक हिंदू होने के कारण तैश में आकर उस वक्त मंटो का कत्ल भी कर सकते थे। मंटो इससे हतप्रभ रह गये यह मजहब और हालात का दोस्ती पर कब्जा। वे टूट गए। एक फिल्म में एक पागल सैनिक अफसर की भूमिका निभानेवाले मंटो खुद अपने जीवन में दो बार पागल हुए।
तो भैया यह है हालात का दखल लोगों के जीवन में। सब लोग अपनी-अपनी ही गाने-बजाने में लगे हैं और शायद इसी का परिणाम है तेजी से अकेलेपन की बीमारी।

1 टिप्पणी:

आशीष ने कहा…

बोधिसत्‍व ने दिल की बात सामने रख दी है, हम सब अकेले हैं

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