शनिवार, 10 मई, 2008

पाकिस्तान में वाकई एक जिला है 'टोबा टेक सिंह'

उर्दू के मुमताज अफसानानिगार सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह बहुत लोगों ने पढ़ी होगी और शायद हममें से कुछ लोगों को वह मार्मिक प्रसंग याद भी हो जब टोबा टेक सिंह के बारे में एक पागल कैदी संतोषजनक जबाव न पाकर एक पेड़ पर चढ़ जाता है और वहीं से कहता है-मैं न भारत में रहूंगा, न पाकिस्तान में रहूंगा, मैं इसी पेड़ पर रहूंगा। वह पेड़ पर नहीं तो रह पाता, वहां से पुलिस के जवान उसे उतार लेते हैं और भारत भेज देते हैं। मुझे पता चला कि पाकिस्तान के सूबा पंजाब में टोबा टेक सिंह वाकई एक जगह है और वह एक जिला मुख्यालय है। मुझे इस प्रसंग ने मुझे इतना उत्तेजित किया कि मैंने तय किया है कि मैं टोबा टेक सिंह मैं दो दिन रुकूंगा और आवारगी करूंगा। यहां पेश है मंटो साहब की वह यादगार कहानी....


टोबा टेक सिंह
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सआदत हसन मंटो
मोटे मुसलमान ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में 15-16 मर्तबा नहाया करता था, यकलख़्त यह आदत तर्क कर दी उसका नाम मुहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगल में एलान कर दिया कि वह क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह है; उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार देकर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया.
लाहौर का एक नौजवान हिंदू वकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया; जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो बहुत दुखी हुआ. अमृतसर की एक हिंदू लड़की से उसे मुहब्बत थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था-वह उन तमाम हिंदू और मुसलमान लीडरों को गालियाँ देने लगा जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए हैं, और उनकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी…जब तबादले की बात शुरू हुई तो उस वकील को कई पागलों ने समझया कि दिल बुरा न करे… उसे हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिंदुस्तान में जहाँ उसकी महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था; उसका ख़याल था कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी.
योरोपियन वार्ड मं दो एंग्लो इंडियन पागल थे. उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज़ चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ; वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में अब उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी; योरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा; ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं; क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाटी तो ज़हर मार नहीं करनी पड़ेगी?
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एक सिख था, जिसे पागलख़ाने में दाख़िल हुए 15 बरस हो चुके थे. हर वक़्त उसकी ज़ुबान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…” वह दिन को सोता था न रात को.
पहरेदारों का यह कहना था कि 15 बरस के तलीव अर्से में वह लहज़े के लिए भी नहीं सोया था; वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक़्त खड़ा रहने से उसके पाँव सूज गए थे और पिंडलियाँ भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था.
हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ाने में गुफ़्तुगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था; कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल़ है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट…! ” लेकिन बाद में “आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट ” की जगह “आफ़ दि टोबा सिंह गवर्नमेंट!” ने ले ली

हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ाने में गुफ़्तुगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था; कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल़ है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट…! ” लेकिन बाद में “आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट ” की जगह “आफ़ दि टोबा सिंह गवर्नमेंट!” ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर दिया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है, जहाँ का वह रहने वाला है. किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा सिंह पाकिस्तान में है... या हिंदुस्तान में; जो बताने की कोशिश करते थे वह ख़ुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है. क्या पता है कि लाहौर जो आज पाकिस्तान में है... कल हिंदुस्तान में चला जाए... या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए... और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से ग़ायब ही हो जाएँ...!
इस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे; चूंकि बहुत कम नहाता था, इसलिए दाढ़ी और सिर के बाल आपस में जम गए थे. जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी; मगर आदमी बे-ज़रर था. 15 बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था. पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक़ इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उसकी कई ज़मीनें थीं; अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया, उसके रिश्तेदार उसे लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरों में बाँधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए.
महीने में एक मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ़्त करके चले जाते थे; एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उसका आना-जाना बंद हो गया.
उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे. उसको यह क़त्अन मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है, महीना कौन सा है या कितने साल बीत चुके हैं; लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अकारिब उससे मिलने के लिए आने के क़रीब होते तो उसे अपने आप पता चल जाता; उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता; अपने वह कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूँ सज-बनकर मिलने वालों के पास जाता. वह उससे कुछ पूछते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार “औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन...” कह देता.
उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक ऊँगली बढ़ती-बढ़ती 15 बरसों में जवान हो गई थी. बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था-वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आँखों से आँसू बहते थे.
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है; जब उसे इत्मीनानबख़्श जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई. अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी; पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बंद हो गई थी जो उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी-उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे. वह आएँ तो वह उनके पूछे कि टोबा टेक सिंह कहाँ है... वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि टोबा टेक सिंह वहीं से आते हैं जहाँ उसकी ज़मीनें हैं.
पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था. उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे-आदत क़हक़हा लगाया और कहा : “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया...!”
बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्कम दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे.
एक दिन तंग आकर बिशन सिंह ख़ुदा पर बरस पड़ा: “ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह...!” इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो, सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते.
तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया; मुसलमान दोस्त पहले कभी नहीं आया था. जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापिस जाने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका: “यह तुमसे मिलने आया है...तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है...!”
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा.
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा : “मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूँ लेकिन फ़ुरसत ही न मिली... तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे... मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की... तुम्हारी बेटी रूपकौर...” वह कहते-कहते रुक गया.
बिशन सिंह कुछ याद करने लगा : “बेटी रूपकौर...”
फ़ज़लदीन ने फिर कहना शुरू किया : उन्होंने मुझे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछता रहूँ... अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो... भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी... भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन राज़ीख़ुशी है...दो भूरी भैसें जो वह छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है... दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वह 6 दिन की होके मर गई...और... मेरे लायक़ जो ख़िदमत हो, कहना, मैं वक़्त तैयार हूँ... और यह तुम्हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूँ...!”
बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है...”
फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा : “कहाँ है... वहीं है, जहाँ था!”
बिशन सिंह ने फिर पूछा : “पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में...”
“हिंदुस्तान में... नहीं, नहीं पाकिस्तान में...! ” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया. बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ़ दी दुर फ़िटे मुँह...! ”
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तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था.
सख़्त सर्दियाँ थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई, मुताल्लिक़ा अफ़सर भी हमराह थे. वागह के बौर्डर पर तरफ़ैन के सुपरिटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”

पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था; बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने पर रज़ामंद होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि उन्हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते-कोई गालियाँ बक रहा है... कोई गा रहा है... कुछ आपस में झगड़ रहे हैं... कुछ रो रहे हैं, बिलख रहे हैं-कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-ग़ोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे.
पागलों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उख़ाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है; वह चंद जो कुछ सोच-समझ सकते थे, “पाकिस्तान : ज़िंदाबाद” और “पाकिस्तान : मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे ; दो-तीन मर्तबा फ़साद होते-होते बचा, क्योंकि बाज़ मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था.
जब बिशन सिंह की बारी आई और वागन के उस पार का मुताल्लिक़ अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है... पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में.... ?”
मुताल्लिक़ा अफ़सर हँसा : “पाकिस्तान में...! ”
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमादा साथियों के पास पहुंच गया.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में चला गया... अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहाँ भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना! जब उसको जबर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह इस अंदाज़ में अपनी सूजी हुई टाँगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त नहीं हिला सकेगी... आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई ; उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा.
सूरज निकलने से पहले साकितो-सामित (बिना हिलेडुले खड़े) बिशन सिंह के हलक़ के एक फ़लक शिगाफ़(गगनभेदी) चीख़ निकली.
इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और उन्होंने देखा कि वह आदमी जो 15 बरस तक दिन-रात अपनी दाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है-उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था.
(राजकमल प्रकाशन के संग्रह 'दस्तावेज़' से साभार)

शुक्रवार, 9 मई, 2008

पाकिस्तानी रेंजरों की बंदूकें मेरी तरफ़ तनी हुई थीं.


उन्होंने बहुत प्यार से बिठाया, चाय पिलाई और कहा कि इंशाअल्लाह...हम आपको वीज़ा दे देंगे। इत्मीनान रखिये। यह कहकर उन्होंने वीज़ा के लिए एक फार्म भरवाया और मेरा पासपोर्ट रख लिया है-क्लीयरेंस और मुहर लगाने के लिए। इमकान है कि पीर यानी सोमवार तक वीज़ा मिल जाना चाहिये। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे रेखांकित करने लायक था उनका दोस्तान रवैया और मेरी बात पर पूरी तरह विश्वास करना। मैंने सच-सच बताया कि यह मेरा बिल्कुल निजी दौरा है और इससे मेरे अखबार समूह या भारत सरकार का कोई सरोकार नहीं है। मैं बस घूमने के लिए जाना चाहता हूं...मेरे बॉस ने भी यही लिखा था कि इनके इस दौरे से हमारे आफिस का कोई लेना-देना नहीं है...और जनाब यह सचाई उन्हें छू गई। इसके बरक्स अपने देश भारत का आइ.ए.एस. अफसर सिर्फ सरकारी जुमलों में सरकारी सेवक होता है, मगर वह समझता है अपने आपको जनता का माई-बाप। जब धन मिले तो अबू सलेम तक के कई-कई पासपोर्ट बन जाते हैं और जब ईमानदार आदमी का कोई काम हो तो महीनों तक दौड़ने के बावजूद नहीं होते। नियम एक आम नागरिक और एक पत्रकार के नाते कई बार अपने देश के अफसरों से काम पड़ा है, जिसमें ज्यादातर बुरे और कभी-कभी ही अच्छे अनुभव हुए हैं। यहां साभार पेश कर रहा हूं बी.बी.सी. से संबद्ध पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी का अनुभव...हमारे कथित 'दुश्मन' की 'दुश्मनी' आप यहां देख सकेंगे।


मेरे पैरों के नीचे ज़मीन अपनी राष्ट्रीयता तेज़ी से बदल रही थी. पीठ पर अपना बैग लादे मैं पाकिस्तान की तरफ़ भाग रहा था. मैं देख रहा था पाकिस्तानी रेंजरों की बंदूकें मेरी तरफ़ तनी हुई थीं. मैं चिल्ला रहा था, “मैं एक भारतीय हूँ, मुझे अंदर आने दो. मैं बाकी बातें अंदर आकर समझाता हूँ, मुझे मत मारो.” यह बात 1997 की है.अब तो भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की हवा बह रही है और वाघा सीमा के आरपार दूसरी बस की सहमति बन गई है लेकिन वह दूसरा ज़माना था.
भारत और पाकिस्तान, दोनों ही अपनी आज़ादी की पचासवीं सालगिरह मना रहे थे. जुलाई के महीने में इसी पर एक ख़ास कार्यक्रम तैयार करने के लिए बीबीसी टीवी टीम के साथ मैं पाकिस्तान गया हुआ था. मेरे साथ दो अंग्रेज़ थे, एक प्रोड्यूसर और एक कैमरामैन.

इस घटना के एक दिन पहले हमने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के आलीशान सरकारी निवास में उनका साक्षात्कार किया था. उसके बाद ही हमें पता चला कि अगले दिन शाम हमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से भी साक्षात्कार का समय मिल गया है. हमें तत्काल दिल्ली पहुँचना था पर उस समय लाहौर से दिल्ली के लिए हवाई सेवा हर दिन नहीं थी. हमें पता था कि भारतीयों और पाकिस्तानियों को वाघा से सीमा पार करने की अनुमति नहीं है लेकिन दिल्ली समय से पहुँचने के लिए कोई और चारा नहीं था. इसलिए मैने पैदल ही वाघा पर अपनी क़िस्मत आजमाने का फ़ैसला किया. वाघा लाहौर से थोड़ी ही दूरी पर है और सुबह-सुबह हम वहाँ पहुँच गए. दिल्ली- लौहौर के बाद अब वाघा के रास्ते अमृतसर-लाहौर बस की सहमति हो गई है

वहाँ अधिकारी को मैंने बताया, “कल शाम हमने आपके प्रधानमंत्री का साक्षात्कार किया था और आज शाम हमें भारतीय प्रधानमंत्री से मिलना है. हमें पता है कि हम आपसे जो अनुरोध कर रहे हैं, वो ग़ैरकानूनी है, पर देखिए, यह मौका दोनों ही देशों की सालगिरह का है”
और फिर आश्चर्यजनक रूप से उस अधिकारी ने हमारी बात मान ली और हमें वाघा की सीमा पार करने की अनुमति दे दी. वैसे भी मेरे दोनों साथियों के लिए वैसे भी कोई दिक़्क़त नहीं थी क्योंकि ब्रितानी नागरिक होने के नाते वाघा से सीमा पार करने में उनके लिए कोई रोक नहीं थी. उस अधिकारी ने मुझसे कहा, "हम तो आपको जाने दे रहे हैं पर देखिए, आपके लोग आपको अंदर लेते हैं या नहीं." मैं बिल्कुल निश्चिंत था. मुझे लगा कि अपने वतन पहुँच गए तो वहाँ के लोग मेरी बात समझेंगे ही. भारत की तरफ़ आते ही मैंने बीएसएफ़ के अधिकारी से बात करनी चाही. मैंने उस अधिकारी को अटलबिहारी वाजपेयी से साक्षात्कार की बात भी बताई.

मैंने कहा, “देखिए पाकिस्तानियों ने मुझे इजाज़त दे दी है और अब तो ये अपने ही घर का मामला है.” लेकिन उन पर इसका कोई असर पड़ता नज़र नहीं आया. मैं आसमान से गिरा जब एक बीएसएफ़ के जवान ने मुझसे कहा कि चार बजने को पाँच मिनट रह गए हैं और पाँच मिनट में पाकिस्तानी अपनी गेट बंद कर देंगे. तब मैं न इधर का रहूँगा और न उधर का. उनका फ़ोन ख़राब था और बार्डर पर मोबाइल फ़ोन भी नहीं चलते. तब मैंने उस अधिकारी से यह बताने की कोशिश की कि बीएसएफ़ के महानिदेशक मेरे अच्छे मित्र हैं और मैं उनके वरिष्ठ अधिकारियों से कश्मीर में मिल चुका हूँ. कश्मीर में भारतीय जवानों के साथ काम करने का अनुभव मुझे बता रहा था कि आशा मत छोड़ो और धैर्य से डटे रहो. न जाने चाय की कितनी ही प्यालियाँ खाली हो चुकी थीं. मुझे समय का अंदाज़ा ही नहीं रहा और अफ़सर अपने काम में व्यस्त हो गए.

उस समय तो जैसे मैं आसमान से गिरा जब एक बीएसएफ़ के जवान ने मुझसे कहा कि चार बजने को पाँच मिनट रह गए हैं और पाँच मिनट में पाकिस्तानी अपनी गेट बंद कर देंगे. तब मैं न इधर का रहूँगा और न उधर का. मैं बौखलाया, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ. मैं "शत्रु" देश में वापस पहुँच चुका था पर पहली बार, न जाने क्यों डर सा नहीं लगा. मैंने उस अफ़सर को आख़िरी बार टटोलना चाहा जिनसे मैंने सुबह बात की थी पर वो आसपास नज़र नहीं आए. जैसे ही मैंने देखा कि पाकिस्तानी रेंजर अपना गेट बंद कर रहे हैं, मैं उनकी तरफ़ भागने लगा. मैं देख रहा था कि पाकिस्तानी रेंजरों की बंदूकें एक-एक कर मेरी तरफ़ तनती जा रही थीं. पर किसी ने मुझपर गोली नहीं चलाई. वो अधिकारी, जिन्होंने सुबह मुझे इजाज़त दी थी, अब भी मौजूद थे.

उन्होंने मेरे पासपोर्ट पर सुबह की गई एँट्री को निरस्त किया और कहा, “मैंने कहा था न, अब सोचिए अगर ये आपके साथ ऐसा सलूक करते हैं तो हमारे साथ इनका सलूक कैसा होगा.” लाहौर जाने वाली आख़िरी बस तब तक जा चुकी थी. उसी अधिकारी ने मुझे एक गाड़ी मुहैया कराई. मैं "शत्रु" देश में वापस पहुँच चुका था पर पहली बार, न जाने क्यों डर सा नहीं लगा.

मंगलवार, 6 मई, 2008

घूमने के लिए आप पाकिस्तान नहीं जा सकते


दिल्ली की गर्मी से परेशान लोग घूमने की योजना बनाने लगे हैं। अखबार ट्रैवल एजेंटों के इश्तहारों से भरे पड़े हैं और रोज नई-नई लोक-लुभावन इश्तहारों से प्रभावित होकर लोग घूमने का कार्यक्रम बना रहे हैं। मैंने असगर वजाहत के नाटक जिस लाहौर नइ वेख्या ओ जम्या ही नइ से प्रभावित होकर सोचा कि दिल्ली से लाहौर नजदीक है, क्यों न इस बार लाहौर घूमा जाए? इसके लिए मैंने जब पाकिस्तानी दूतावास में संपर्क किया तो पाकिस्तानी हाई कमिश्नर से जान-पहचान के बावजूद वीज़ा अधिकारी को यह यकीन ही नहीं हो रहा है कि मैं सिर्फ घूमने के उद्देश्य से पाकिस्तान जाना चाहता हूं। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा कि कोई हिंदुस्तानी यूरोप, अमेरिका के बजाय पाकिस्तान घूमने का ख्वाहिशमंद भी हो सकता है। वे असमंजस में हैं और मेरे घूमने की वजह से मुतमइन नहीं हो पा रहे हैं। दो-तीन बार झुंझलाकर वे कह भी चुके हैं कि हम टूरिस्ट वीजा किसी हिंदुस्तानी को नहीं दे सकते। आमीन।

मंगलवार, 29 अप्रैल, 2008

काशी में शवों का हिसाब हो रहा है

हिंदी के बेहद संवेदनशील (यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि उनकी मौत ब्रेन हैमरेज से हुई थी।) और चर्चित कवि श्रीकांत वर्मा ने दार्शनिक अंदाज में अपने बेहद लोकप्रिय कविता-संग्रह मगध में लिखा था-

काशी में शवों का हिसाब हो रहा है
किसी को जीवितों के लिए फुर्सत नहीं
जिन्हें है,
उन्हें जीवित और मृत की पहचान नहीं।


मगर इन दिनों वहां जो स्थति है वह बेहद भयावह है। जिंदगी लील रही गर्मी के चलते मणिकर्णिका घाट व हरिश्चंद्र घाट पर दाह संस्कार के लिए आने वाले शवों की तादाद में बढ़ोतरी हो गई है। मणिकर्णिका घाट पर पिछले कुछ दिनों से औसत से 15-20 फीसदी अधिक शवदाह संस्कार के लिए लाए जा रहे हैं। इसमें से कई लोगों की मौत की वजह गर्मी व लू ही बताई जा रही है। लू किन्हें लगती है, उन्हें जो ए.सी. कमरों में बैठकर देश को चलाने का महत्वपूर्ण दायित्व निभाते हैं? या उन्हें जो दो जून की रोटी के लिए सड़क रिक्शा खींचते हैं, ईंट ढोते हैं?


फिलवक्त मुद्दा वहां मौत क्यों हो रही है से छिटककर इस पर केंद्रित हो रहा है कि इन घाटों पर बिकनेवाली कच्ची लकड़ी के दाम में 30 रुपये प्रति मन और पक्की लकड़ी के दाम में 80 रुपये प्रति मन की बढ़ोतरी हो चुकी है। हरिश्चंद्रघाट पर भी रोजाना पांच से दस शव अधिक लाए जा रहे हैं। संख्या में बढ़ोतरी की वजह गर्मी ही बताई जा रही है। हरिश्चंद्र घाट पर सप्ताहभर पहले 170 रुपये मन बिकने वाली लकड़ी का भाव 205-210 पहुंच चुका है। इन मुद्दों के बीच असली सवाल दबाये जा रहे हैं और अवांतर प्रसंगों के सहारे अखबार निकाले जा रहे हैं, राजनीति की जा रही है। दुख यही है कि शवों का हिसाब रखनेवाले लोगों के पास जीवितों के लिए बिल्कुल फुर्सत नहीं। जीवित जब कुछ नहीं बोलते तब-

जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुज़रता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्‍न कर हस्‍तक्षेप करता है-
मनुष्‍य क्‍यों मरता है?

गुरुवार, 24 अप्रैल, 2008

अशोक जी दे गए जीवन भर का शोक!

अशोक शास्त्री नहीं रहे। आज सुबह (24.04.2008 को) दिल का दौरा पड़ने की वजह से उनका देहांत हो गया।

जनसत्ता से लंबे समय तक जुड़े रहे अशोक जी इन दिनों जयपुर में रह रहे थे और घर पर रहकर स्वाध्याय कर रहे थे, बरसों से लंबित काम निबटा रहे थे। रांगेय राघव की एकमात्र पुत्री से उनका ब्याह हुआ था, पर इसका कभी जिक्र तक वे नहीं करते थे। इसको लेकर के शायद उनके मन में कहीं-न-कहीं यह संकोच भी रहा हो कि लोग कहीं यह आरोप उनके ऊपर चस्पां न कर दें कि वे इस संबंध का कोई लाभ लेना चाहते हैं।


इस टेलीफोनिक युग में भी वे पत्र लिखा करते थे। चार दिन पहले उनका कोरियर से पत्र मिला था, साथ में उन्होंने दो स्केच भी बनाकर भेजा था। अशोक जी इतनी जल्दी और इस तरह चुपचाप दुनिया से रुख्सत हो जाएंगे, शायद उनके किसी शुभेच्छु को दूर-दूर तक भी आशंका न थी। आह, अशोक जी...2003 के बाद फिर मिलना भी न हो सका।

सोमवार, 21 अप्रैल, 2008

क्या आप जानते हैं लतिका रेणु को?


कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु को सब जानते हैं। मैला-आंचल को बहुतों ने पढ़ा है। तीसरी कसम फिल्म बहुत सारे सिने प्रेमियों ने देखी हैं...मगर हिरामन जैसे पात्र के रचयिता रेणु जी की महुवा घटवारिन लतिका रेणु को शायद कम लोग जानते हैं। हालांकि रेणु जी के लिए जिन्होंने तन-मन-धन और पूरा जीवन उत्सर्ग कर दिया उन्हें शायद ज्यादा जानना चाहिए था, मगर हम कुछ कारणों से उन्हें नहीं जानते।



रेणु जी जब पटना मेडिकल कालेज अस्पताल में लंबी बीमारी से जूझ रहे थे, तब वहां तत्कालीन नर्स लतिका जी ने उनकी बड़ी सेवा की थी। लतिका जी बंगाली हैं और रेणु जी का बांग्ला भाषा पर भी उतना ही अधिकार था जितना कि हिंदी पर। वे लतिका जी से बांग्ला में ही बात करते थे। भाषा की निकटता ने मरीज और नर्स को वास्तविक रुप से भी एक-दूसरे के नजदीक ला दिया। रेणु जी शादीशुदा थे, पहले से ही उनके कई बच्चे थे, बावजूद इसके उन्होंने लतिका जी से दूसरी शादी की। लतिका जी ने रेणु जी के लिए सब कुछ उत्सर्ग कर दिया। यहां तक जिस मातृत्व को औरत की पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है, लतिका जी ने उसकी भी तिलांजलि दे दी, क्योंकि वे जानती थीं कि रेणु जी के पहली पत्नी से कई बच्चे हैं। वही बच्चे इनके भी बच्चे होंगे। दुर्योग से वे इनके बच्चे तो साबित नहीं ही हो पाए, अलबत्ता दुश्मन जरूर हो गए।



अपनी किताबों का कॉपीराइट भी रेणु जी ने अपने बड़े बेटे पद्मपराग राय वेणु को दे दिया। आज लतिका जी के पास मामूली पेंशन है, एक छोटा-सा मकान है-जिसे हथियाने की पूरी कोशिश कर चुके हैं पद्मपराग राय वेणु और अपना बच्चा तो खैर कोई है ही नहीं। पटना के राजेन्द्र नगर मोहल्ले के एक छोटे से फ्लैट में आज नितांत एकाक जीवन जी रही लतिका जी बेहद भुखमरी के दौर से गुजर रही हैं। कोई उन्हें देखनेवाला नहीं है, न समाज, न सरकार और न रेणु जी के प्रशंसक।

गुरुवार, 10 अप्रैल, 2008

क्या लामा हमारी तरह ही रोते हैं पापा ?

तिब्बत को लेकर इन दिनों दुनिया भर में जिस तरह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वह तिब्बतियों के भीतर सुलग रहे ज्वालामुखी का फट पड़ने की तरह है। मगर जो चीन आज भी भारत की हजारों वर्गमील जमीन पर अवैध रूप से कब्जा किये बैठा है, जो हमारे देश के अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अरुणाचल प्रदेश का दौरा करने के लिए विरोध जताता है, जो चीन सिक्किम को भी अपना ही एक अंग मानता है और रात के दो बजे भारत के राजदूत को अपने विदेश मंत्रालय में तलब कर लेता है और हमारे आका की तरह हमें ही हमारे देश के पंद्रह शहरों की सूची सौंपता है कि यहां तिब्बती लोग विरोध कर सकते हैं, वह चीन महत्व की दृष्टि से हमें क्या समझता है, यह आसानी से समझा सकता है। इधर केन्द्र की सत्ता में बैठे शिखंडियों और वृहन्नलाओं ने यह घोषणा की है कि ओलंपिक मशाल मार्च के दौरान दिल्ली में उसी तरह की चाक-चौबंद व्यवस्था होगी, जैसी गणतंत्र दिवस के दरम्यान दिल्ली में होती है।



यहां पेश हिंदी के लोकप्रिय कथाकार और कवि उदय प्रकाश की कविता `तिब्बत´ । इस कविता को आज से 28 वर्ष पहले, 1980 में `भारत भूषण अग्रवाल´ पुरस्कार दिया गया था।



तिब्बत


तिब्बत से आये हुए

लामा घूमते रहते हैं

आजकल मंत्र बुदबुदाते



उनके खच्चरों के झुंड

बगीचों में उतरते हैं

गेंदे के पौधों को नहीं चरते



गेंदे के एक फूल में

कितने फूल होते हैं

पापा ?



तिब्बत में बरसात

जब होती है

तब हम किस मौसम में

होते हैं ?



तिब्बत में जब तीन बजते हैं

तब हम किस समय में

होते हैं ?



तिब्बत में

गेंदे के फूल होते हैं

क्या पापा ?



लामा शंख बजाते है पापा?

पापा लामाओं को

कंबल ओढ़ कर

अंधेरे में

तेज़-तेज़ चलते हुए देखा हैकभी ?



जब लोग मर जाते हैं

तब उनकी कब्रों के चारों ओर

सिर झुका कर

खड़े हो जाते हैं लामा



वे मंत्र नहीं पढ़ते।


वे फुसफुसाते हैं ....तिब्बत..तिब्बत ...

तिब्बत - तिब्बत....तिब्बत -

तिब्बत - तिब्बत

तिब्बत-तिब्बत ....तिब्बत ..........



तिब्बत -तिब्बत

तिब्बत .......और रोते रहते हैं

रात-रात भर।


क्या लामा

हमारी तरह ही

रोते हैं

पापा ?