बुधवार, मार्च 10, 2010

ये साथ निभाता रहे मरते दम तक....

एरमा बोमबेक्क (१९२७-१९९६) अमेरिका की बेहद लोकप्रिय हास्य लेखिका मानी जाती हैं. गरीब परिवार में जनमी एरमा को घरेलू स्थितियों को केंद्र में रख कर हास्य रचनाएँ लिखने का शौक बचपन से ही था, जो बाद में इतना लोकप्रिय हुआ कि वे दुनिया में सबसे ज्यादा छपने वाली स्तंभकार बन गयीं. ..अपनी लोकप्रियता के शिखर पर उनके कॉलम अकेले अमेरिका और कनाडा के नौ सौ अख़बारों में हफ्ते में दो बार छपा करते थे और उनके पाठकों की संख्या कोई तीन करोड़ आंकी गयी थी. इसके अलावा उन्होंने टीवी के लिए खूब कम किया और १५ किताबें भी छपीं जो सभी बेस्टसेलर्स रहीं. शादी के बाद डॉक्टरों ने उन्हें बच्चा जनने में अक्षम घोषित कर दिया, इसीलिए उन्होंने एक बेटी गोद ली..पर आसानी से किसी बात से हार न मानने वाली एरमा बाद में दो बेटों की वास्तविक माँ भी बनीं.अमेरिका में स्त्रियों को बराबरी का हक़ दिलाने की लड़ाई में वे अग्रणी भूमिका में रहीं,इसी कारण उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति की परामर्श दात्री समिति का सदस्य भी बनाया गया.

एरमा ने ज्यादा कवितायेँ तो नहीं लिखी हैं पर उनकी कुछ प्रेरणात्मक कवितायेँ बहुत लोकप्रिय हैं.बहुतेरे कविता संकलनों में शामिल उनकी प्रस्तुत कविता उस समय लिखी गयी जब गुर्दे की असाध्य बीमारी से जूझती हुई वे आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही थीं.

अगर एक बार फिर से जीने को मिलता

अगर एक बार फिर से जीने को मिलता
तो बीमार होने पर मैं बिस्तर पर दुबक के आराम करती..
और इस गफलत में तो कतई न रहती
कि एक दिन मेरे काम न करने से
ये पृथ्वी छोड़ देगी
अपनी धुरी पर गोल गोल घूमना..


मैं गुलाब जैसी दिखने वाली मोमबत्ती जलाती जरुर
जो पड़े पड़े गर्मी से पिघल के
होने लगी थी बदशकल..

मैं खुद बतियाती काम
और सुनती दूसरों कि ज्यादा से ज्यादा
आए दिन दोस्तों को डिनर पर जरूर बुलाया करती
चाहे कालीन दागो दाग
और सोफा बदरंग ही क्यों न दिखता रहता...

करीने से सजी धजी बैठक में
पालथी मार के बैठी बैठी खाती पॉप कोर्न..
इसकी ज्यादा परवाह नहीं करती
कि फायेर प्लेस में आग जलाने से
इधर उधर उड़ने बिखरने लगती है राख...

दादा जी के जवानी के बेसिर-पैर के
धाराप्रवाह बतंगड़ को सुनने को
बगैर कोताही बरते देती ढेर सारा समय...

चाहे झुलसाने वाली गर्मी हो
तब भी चढाने को न कहती कार का शीशा
और अच्छी तरह सजे संवारे बालों को
उड़ उड़ कर बिखरने देती बे तरतीब...

घास से लग जाने वाले धब्बों की चिंता किये बगैर
बच्चों के साथ लान में पसर कर बैठती
और खूब बैठा करती...

टीवी देखते हुए कम और जीवन को निहारते हुए ज्यादा
रोया करती जार जार
फिर अचानक हंस पड़ती
बे साख्ता...

कुछ खरीदने को जाती
तो यह विचार मन में बिलकुल न लाती
कि इस पर मैल न जमे कभी
या कि ये साथ निभाता रहे मरते दम तक ही...

मैं कभी नहीं करती कामना
अपने गर्भ के आनन् फानन में निबट जाने की
और एकएक पल का आनंद
इस एहसास के साथ लेती
कि मेरी कोख में पल रहा यह अद्भुत प्राणी
ईश्वर के चमत्कार में हाथ बंटाने का
मेरे सामने इकलौता और आखिरी मौका है..

बच्चे जब अचानक पीछे से आते
और चूम लेते मेरे गाल
तो ये भूल के भी न कहती:
अभी नहीं...बाद में..

अभी हटो यहाँ से..
और हाथ धो कर आ जाओ खाना खाने की मेज पर...
मेरे जीवन में खूब सघन होकर तैरते होते
आई लव यू और आई एम सॉरी जैसे तमाम जुमले..
अगर एक बार फिर से जीवन
जीने को मिल जाता तो...

मैं पकड़ लूंगी एक एक पल को
देखूंगी..निहारूंगी..जियूंगी..
और बिसारुंगी तो कभी नहीं..

छोटी छोटी बातों पर छोडो पसीना बहाना
इसकी भी ज्यादा फ़िक्र मत करो
कि तुम्हे कौन करता है पसंद कौन ना पसंद
किसके पास क्या है...कितना है..
या कौन कौन कर रहा है क्या क्या..

प्यार करने वाले सभी लोगों के साथ के
साझेपन का आनंद चखो...
उन तमाम चीजों के बारे में ठहर कर सोचो
जिनसे ईश्वर ने हमें समृद्ध किया है..

ये भी जानने की कोशिश करो
कि क्या कर रहे हो
अपनी मानसिक,शारीरिक
भावनात्मक और आध्यात्मिक बेहतरी के लिए..

जीवन इतना खुला और अ-सीमित भी नहीं
कि इसको यूँ ही फिसलता हुआ गुजर जाने देते रहें..
बस ये तो एक आखिरी मौका है
इकलौता मौका
एक बार जब ये बीत गया
तो समझो बचेगा नहीं कुछ शेष...

मेरी दुआ है
आप सबके आज पर
हुमक कर बरसे ईश्वर की कृपा...


-चयन और अनुवाद- यादवेन्द्र

1 टिप्पणी:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

एक अच्छी लेखिका और उनकी रचना से परिचय कराने के लिए शुक्रिया जी।
मैं पकड़ लूंगी एक एक पल को
देखूंगी..निहारूंगी..जियूंगी..
और बिसारुंगी तो कभी नहीं..

छोटी छोटी बातों पर छोडो पसीना बहाना
इसकी भी ज्यादा फ़िक्र मत करो
कि तुम्हे कौन करता है पसंद कौन ना पसंद
किसके पास क्या है...कितना है..
या कौन कौन कर रहा है क्या क्या..

बहुत बेहतरीन।