शुक्रवार, मार्च 05, 2010

जहाँ से मिट जाएँ सभी तरह के डर...

इब्तिसाम बरकत फिलिस्तीन मूल के उन सक्रिय मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और रचनाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपने जन्म स्थान से बल पूर्वक विस्थापन का दंश बचपन में झेला है..जेरुसलम के पास के एक गाँव में जनमी बरकत को तीन साल की उम्र में ही १९६७ का अरब-इस्राएल युद्ध देखना पड़ा और अपना जन्मस्थान छोड़ने को मजबूर होना पड़ा. अपने इस अनुभव को उन्होंने अपने बहुचर्चित संस्मरण में प्रस्तुत किया है-उनका कहना है कि सिर्फ छह दिन तक चले इस युद्ध में दो लाख से ज्यादा फिलिस्तीनी लोगों को अपना जन्म स्थान छोड़ने को मजबूर होना पड़ा.फिलिस्तीन देश के नक़्शे से मिटा दिए जाने के बाद उनको इस्राएल का नागरिक बन के स्नातक तक कि पढाई वेस्ट बैंक में करनी पड़ी,पर आगे की पढाई के लिए वे अमेरिका आ गयीं .वहां रहते हुए उन्होंने कई तरह के कम किये--अध्यापन से लेकर पत्रकारिता और लेखन तक. वे दुनिया भर में होने वाले मानव अधिकार हनन का विरोध करने के साथ साथ युद्धों का भी मुखर विरोध करती हैं.उन्होंने भाषाओँ की नैतिकता और वंचित लोगो की आपबीती रिकॉर्ड करने के नए नए प्रयोग किये हैं.अरब देशों और इस्राएल की जनता के बीच साझा रचनात्मक सेतु बनाने की उनकी कोशिशों को भरपूर सराहना मिली है. यहाँ प्रस्तुत है उनकी दो छोटी कवितायेँ, जिसे बड़े यादवेन्द्र जी ने ख्वाब का दर के लिए फराहम कराया है. चयन और अनुवाद उन्हीं का है.

फिलिस्तीन

इब्तिसाम बरकत

ऑफिस में सामान मुहय्या कराने वाले स्टोर का
पुराने सामान की सेल वाला बही खाता खंगालते हुए
मैं तय्यारी कर रही हूँ
कि खरीद लूँ दुनिया ---
एक अदद ग्लोब
बस पचास डॉलर का ही तो है
विक्रेता कहता है १९५ देश खरीद लीजिये
बस पचास डॉलर में..

मैं सोचती हूँ:
इसका मतलब तो ये हुआ
कि कुल जमा पचीस सेंट का पड़ा एक देश..
क्या मैं आपको दूँ एक डॉलर
तो आप इस ग्लोब में शामिल कर लोगे
फिलिस्तीन?

आप इसको किस जगह रखना चाहती हैं?
उसने पलट के पूछा...
जहाँ जहाँ भी रहते हैं
फिलिस्तीनी...

पेंसिल

पत्थर की मस्जिद
पेंसिल की मानिंद खड़ी है
हमारे गाँव के बीचो बीच
युक्लिप्टस के दरख्तों से भी
ऊँची...
इसकी मीनारें
गुनगुनाती रहती हैं
आसमान के कानों में
जब तक लोग देते नहीं जवाब...
यहाँ आते ही हम
जूते चप्पल खोल के
खड़े हो जाते हैं
इबादत करने को लाइन बना कर...

हम दुआ मांगते हैं
कि जहाँ से मिट जाएँ तमाम लड़ाईयां ...
मिटा दो...मिटा दो....
हम दुआ मांगते हैं
कि जहाँ से मिट जाएँ सभी तरह के डर...
मिटा दो...मिटा दो...

हर रोज की इबादत में
हम यही दुहराते रहते हैं
बार बार....
कि हर किसी को आशीष मिले
अमन चैन का....

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

आप इसको किस जगह रखना चाहती हैं?
उसने पलट के पूछा...
जहाँ जहाँ भी रहते हैं
फिलिस्तीनी...

ओह!! बहुत शानदार कविताएँ और उनका अनुवाद!

Amitraghat ने कहा…

"बेहतरीन कविताएँ...."
amitraghat.blogspot.com

pratibha ने कहा…

bahut sundar!

pragya pandey ने कहा…

dono kavitayen meethe man ki karvaton see sunder hain . anuwad bahut sunder . kavita tak le jaane men samarth !!