शनिवार, दिसंबर 10, 2011


48 वर्षीय नसरीन सतूदेह इरान की बेहद लोकप्रिय मानव अधिकार वकील और कार्यकर्ता हैं जो अपने कट्टर पंथी शासन विरोधी विचारों के लिए सरकार की आंख की किरकिरी बनी हुई हैं.अपने छात्र जीवन में खूब अच्छे नंबरों से पास होने के बाद उन्होंने कानून की पढाई की पर वकालत करने के लाइसेंस के लिए उन्हें आठ साल का लम्बा इंतजार करना पड़ा.उन्होंने सरकारी महकमों और बैंक में भी नौकरी की पर इरान के पुरुष वर्चस्व वाले समाज में आततायी पिताओं के सताए हुए बच्चों और शासन के बर्बर कोप का भाजन बने राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए क़ानूनी सहायता प्रदान करने के कारण उन्हें दुनिया भर में खूब सम्मान मिला.पिछले राष्ट्रपति चुनाव की कथित धांधलियों में उन्होंने खुल कर विरोधी पक्ष का साथ दिया...नतीजा सितम्बर 2010 में उनकी गिरफ़्तारी और अंततः जनवरी 2011 में ग्यारह साल की एकाकी जेल की सजा...जेल में रहते हुए उन्हें अपने परिवार से भी नहीं मिलने दिया जाता था इसलिए कई बार उन्होंने विरोध स्वरुप अन्न जल ग्रहण करने से इंकार कर दिया...उनकी सेहत निरंतर बिगडती जा रही है.दुनिया में मानव अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले अनेक लोगों और संगठनों ने उनकी रिहाई की माँग की है.जेल की अपनी एकाकी कोठरी से उन्होंने अपनी बेटी के लिए जो चिट्ठी लिखी,उसका अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है:

मेरी सबसे दुलारी मेहरावे...मेरी बेटी..मेरी शान...मेरी ख़ुशी,

एविन जेल के वार्ड न.209 से में तुम्हें सलाम भेजती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि तुम्हारा समय ठीक से बीत रहा होगा.मैं तुमसे बगैर किसी चिंता,उदासी और आँसू के मुखातिब होना चाहती हूँ..बल्कि तुम्हारे लिए और तुम्हारे छोटे भाई के लिए प्यार और दुआओं से भरे दिल के साथ तुमलोगों को सलाम करती हूँ.

मुझे अपने प्यारे बच्चों से दूर हुए छह महीने हो गए.इन छह महीनों में ले दे के ऐसे मौके बिरले ही आए हैं जब हम एक दूसरे को आमने सामने देख पाए हैं...वो भी सिक्योरिटी गार्ड की मौजूदगी में ही.मुझे इस बीच में तुम्हें ख़त लिखने की इजाज़त कभी नहीं दी गयी...ना ही तुम्हारी कोई फोटो मुझतक पहुँचने दी गयी...न हमें बगैर किसी की मौजूदगी के मिलने ही दिया गया. मेरी प्यारी मेहरावे,कोई और क्या समझेगा मेरे दिल का दर्द जितना तुम समझ सकती हो..जिन हालातों में हम एक दूसरे के साथ मिल पाए,इसका भी तुम्हें पता है.हर बार...तुमलोगों से मिलने के बाद हर बार और यहाँ तक कि यहाँ रहते हुए हर रोज मैं अपने आपसे ये सवाल पूछती हूँ कि दुनिया जहान के काम करते हुए मैंने कहीं अपने बच्चों के हक़ को इज्जत और अहमियत देनी बंद तो नहीं कर दी.मेरी बच्ची,तुम्हारी समझदारी का खूब भरोसा करते हुए भी किसी और बात से ज्यादा मुझे इस बात की फ़िक्र रहती है कि तुम्हारे मन में यह कभी नहीं आना चाहिए कि मैंने अपने ही बच्चों के हक़ न्योछावर कर दिए.

मेरी सबसे प्यारी मेहरावे, अपनी गिरफ़्तारी के बाद पहले दिन से ही मैं तुम्हारे और तुम्हारे भाई के अधिकारों के ऊपर गौर करती रही हूँ..तुम्हारी उम्र का ध्यान करते हुए मुझे तुम्हारी चिंता ज्यादा रहती है...कि तुम मुश्किल हालातों में कितना खुद को ढाल पाओगी...कि कितनी गहराई से उनको समझ पाओगी...तुम्हारी हिम्मत और सहनशक्ति...सबसे ज्यादा इस बात से परेशान रहती हूँ कि मेरी गिरफ़्तारी और सजा को लेकर स्कूल में तुम्हारे दोस्त कहीं तुमसे मिलने जुलने और बोलने से तो परहेज नहीं करने लगेंगे. हाँलाकि मेरे मन के अंदेशों को धराशायी होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा...अब मैं...या ये कहना बेहतर होगा कि हम...अपनी मान्यताओं और विश्वासों के प्रति ज्यादा मजबूती के साथ खड़े हुए हैं.

तुम्हारी ताकत और सहनशक्ति मुझसे कमतर कतई नहीं है मेरी बेटी.एक बार मैंने तुमसे कहा था: ऐसा कभी मत सोचना मेरे बच्चे कि मुझे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है...या कि मैंने कोई ऐसा गलत काम किया जिस से मुझे ऐसी सजा दी जाये... मैंने जो कुछ भी किया देश के कानून के अंदर किया...गैर क़ानूनी कुछ भी नहीं किया...मुझे खूब अच्छी तरह याद है कि इस पर तुमने अपनी नन्हीं हथेलियों से मेरा चेहरा सहलाते हुए जवाब दिया था: ममी,मुझे सब मालूम है...जानती हूँ मैं...उस दिन जिस भरोसे से तुमने ये शब्द बोले थे उससे मैं अपनी बच्ची की गुनहगार बनाने की आशंकाओं से सदा के लिए उबर गयी थी.

मेरी बच्ची,स्कूल में साथ पढने वाले बच्चों के बर्ताव के बारे में भी मेरी तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं...जाहिर है,इस पीढ़ी के बच्चे पिछली पीढ़ी से ज्यादा समझदार और सयाने हैं. यही कारण है कि यहाँ मैं किसी चिंता के बोझ से मुक्त हूँ, अपनी विश्वासों पर पक्की खड़ी हूँ...दर असल मुझमें यह शक्ति तुम्हारी और तुम्हारे पिता की वजह से आई.

प्यारी प्यारी मेहरावे, मुझे हमारी साथ साथ बितायी हुई खुशनुमा यादें बार बार जेहन में आ रही हैं.यहाँ जेल में रात में जब मैं सोने जाती हूँ तो याद आते हैं वो पल जब मैं घर रहते हुए तुम्हें सुलाया करती थी.मैं तुम्हें तरह तरह की लोरियां और गीत सुनाया करती थी,पर तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद थी वो परियों वाली लोरी.कोई रात ऐसी नहीं बिताती थी जब तुम उसको सुनने की जिद न करो...और मैं शुरू हो जाती थी:

मेरी प्यारी बच्ची,बच्चों के हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए मेरा सबसे बड़ा संबल और प्रेरणा तुम ही थीं.उस समय भी मैं सोचती थी..और अब भी भरोसा है कि बच्चों के हक़ कि लड़ाई में मिली कामयाबी का सबसे बड़ा फायदा मेरे अपने बच्चों को मिलेगा.जब भी मैं बर्बरता से जूझते किसी मासूम का केस लड़ कर कोर्ट से घर लौटती तो सबसे पहले तुम दोनों को बांहों में भींच लेती और देर तक इस आत्मीय गिरफ्त से छूटने से बचती रहती.अब आज यहाँ रहते हुए मैं इस बर्ताव के बारे में बार बार सोचती हूँ...शायद देर तक तुम दोनों के साथ ऐसे लिपटने से मैं जुल्मों के सताए बच्चों को कुछ दिलासा दे पाती होऊं.

मुझे याद है एक बार तुमने बड़ी संजीदगी से कहा था कि तुम नहीं चाहती कि कभी भी 18 साल की हो जाओ.मेरे पूछने पर तुमने टपक से जवाब दिया था कि इस उम्र में पहुँचते ही तुम्हें बचपने को अलविदा कहना पड़ेगा...तुम बचपने को मिलती ख़ास तवज्जो से कभी महरूम नहीं होना चाहती.मैं इस जवाब से मिली ख़ुशी को कभी शब्दों में बयान नहीं कर सकी मेरी बेटी...मुझे खूब याद है कि तुम कोई ऐसा मौका नहीं छोड़तीं जब मेरे या तुम्हारे पिता के सामने ये साबित करना हो कि तुम अब भी बच्ची ही हो,18 साल की सयानी नहीं हुई...और हमारे लिए तुम्हारे बचपने की हिफाजत करना..और उसको सम्मान देना कितना जरुरी था.

मेरी प्यारी बच्ची, जैसे मैंने तुम्हारे बाल अधिकारों को भरपूर सुरक्षा और सम्मान देने की पूरी कोशिश की वैसे ही अपने तमाम मुवक्किलों के साथ भी बर्ताव किया...उनके हकों की अनदेखी मैंने कभी नहीं की. जब जब मेरे मुवक्किल मुश्किल में पड़े या उनको सलाखों के पीछे धकेला गया,मैंने अपना दिन रात नहीं देखा और उनकी हिफाजत के लिए मौके पर डटी रही.जिन्होंने मुझे अपनी मदद के लिए बुलाया है उनको बीच मंज्धार में छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूँ? कभी नहीं..मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती.

अब ख़त को पूरा करने से पहले एक बार मैं तुमसे कहना चाहती हूँ कि तुमलोगों के और तुम्हारी तरह के दूसरे बच्चों के बाल अधिकारों की हिफाजत को ध्यान में रख कर और तुमलोगों के बेहतर भविष्य की सोच कर ही मैंने यह पेशा अपनाया था.और मुझे पूरा पूरा भरोसा है कि मेरे और मेरी तरह के हालातों में रह रहे बहुतेरे परिवारों की तकलीफ व्यर्थ नहीं जाएगी...दर असल इन्साफ तभी प्रकट होता है जब चारों ओर घनघोर निराशा छाने लगती है...हम इन्साफ की उम्मीद करना भी छोड़ देते हैं.मुझे अपने कहे पर पूरा भरोसा है.तुम्हारे लिए मेरी दुआ सिर्फ भरपूर ख़ुशी और सुख भरे बचपने की है.

प्यारी प्यारी मेहरावे,मुझसे जिरह करने वालों और जजों के लिए इस वजह से गुस्सा नहीं पालना की वे मेरे साथ ऐसा सुलूक कर रहे हैं...बल्कि अपनी बाल सुलभ मुलायमियत और खूबसूरती के साथ उनसे पेश आन...उनके लिए अमन और चैन की दुआएं माँगना...ऐसा करोगी तो उनके साथ साथ हमें भी खुदा ऐसे ही अमन और चैन के आशीर्वाद देगा.

यहाँ रहते हुए कोई ऐसा पल नहीं आता की तुम्हें याद न करती होऊं...तुम्हारे लिए सैकड़ों चुम्बन...

-तुम्हारी माँ नसरीन

-चयन एवं अनुवाद- यादवेन्द्र