शनिवार, मार्च 08, 2008

इरफान की क्या टूटी और क्या बिखरी है...दोस्तो?

वे जोड़ेते कितना हैं और तोड़ते कितना हैं यह कितने लोगों को पता है दोस्तो? क्या-क्या उनका टूटा है और कहां-कहां बिखरा है, आए दिन बिखरता रहता है यह पता है ब्लागिंग की दुनिया के बाश्शाओ? इसी दिल्ली में एक प्यारे इनसान हैं और मेरे दोस्त हैं, इत्तफाकन वे भी इरफान हैं और दोस्तो वे जनसत्ता में रोज कार्टून बनाकर वक्त की नब्ज पर उंगली रखते हैं....और दूसरे ये साहब हैं जो कुछ-न-कुछ तोड़कर वक्त के लूप होल्स में उंगली करते रहते हैं। इन दिनों ये साहब ब्लाग में कुछ-कुछ चीजें बिखेरते रहते हैं।


इरफान साब अच्छे इनसान हैं, मगर जबानदराज कुछ ज्यादा ही हैं। पिछले छह-सात महीनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई है, अलबत्ता फोन पर गुफ्तगू कभी-कभी हो जाती है। पिछली मुलाकात श्रीराम सेंटर में हुई थी जहां तंजो-मिजा की दुनिया के बेताज बादशाह और मेरे अजीज मुज्तबा हुसैन साहब की किताबों की निंदा करते हुए वे उसे कबाड़ी को बेचने की बात कह रहे थे। मगर उनके साथ एक साहब थे जिन्होंने उनको इस जबानदराजी पर लताड़ा भी। जम्हूरित में सबको हक है कि वह किसे पसंद करे और किसे नापसंद करे, सो जाहिर है यह हक उनको भी है। जम्हूरियत में सब चलता है जनाब इरफान साहब और आपकी बोलने की आजादी पर अगर कभी किसी तरह की आंच आये तो यह बंदा आपके साथ है। लेकिन बंदिशों की आड़ में टी.आर.पी. की राजनीति या गुटबंदी की राजनीति करना आपके प्रोफेशनल लाइफ के हिसाब से तो मुफीद हो सकता है मगर ब्लागिंग के व्यापक हित में नहीं है यह सब लंतरानियां।

4 टिप्‍पणियां:

चंद्रभूषण ने कहा…

बात कुछ साफ नहीं हुई जनाब। अगर किसी किताब की आलोचना करने के लिए आप इरफान से नाराज हैं तो इस तरह की हरकतें- एहतियात के बावजूद- किसी न किसी रचना के बारे में हममें से ज्यादातर लोग दिन में दो-चार बार करते ही रहते हैं। मामला अगर कुछ और हो तो वह आपकी इस पोस्ट में जरा पोशीदा ही रह गया।

munish ने कहा…

inspite of chanrabhooshan's leftist leanings i support his views. apne khul kar nahi kaha saab.

अजित वडनेरकर ने कहा…

कहीं मियादी बुख़ार तो नहीं ?

Pankaj Parashar ने कहा…

अरे किसको साहब?