गुरुवार, अप्रैल 10, 2008

क्या लामा हमारी तरह ही रोते हैं पापा ?

तिब्बत को लेकर इन दिनों दुनिया भर में जिस तरह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वह तिब्बतियों के भीतर सुलग रहे ज्वालामुखी का फट पड़ने की तरह है। मगर जो चीन आज भी भारत की हजारों वर्गमील जमीन पर अवैध रूप से कब्जा किये बैठा है, जो हमारे देश के अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अरुणाचल प्रदेश का दौरा करने के लिए विरोध जताता है, जो चीन सिक्किम को भी अपना ही एक अंग मानता है और रात के दो बजे भारत के राजदूत को अपने विदेश मंत्रालय में तलब कर लेता है और हमारे आका की तरह हमें ही हमारे देश के पंद्रह शहरों की सूची सौंपता है कि यहां तिब्बती लोग विरोध कर सकते हैं, वह चीन महत्व की दृष्टि से हमें क्या समझता है, यह आसानी से समझा सकता है। इधर केन्द्र की सत्ता में बैठे शिखंडियों और वृहन्नलाओं ने यह घोषणा की है कि ओलंपिक मशाल मार्च के दौरान दिल्ली में उसी तरह की चाक-चौबंद व्यवस्था होगी, जैसी गणतंत्र दिवस के दरम्यान दिल्ली में होती है।


यहां पेश हिंदी के लोकप्रिय कथाकार और कवि उदय प्रकाश की कविता `तिब्बत´ । इस कविता को आज से 28 वर्ष पहले, 1980 में `भारत भूषण अग्रवाल´ पुरस्कार दिया गया था।



तिब्बत


तिब्बत से आये हुए

लामा घूमते रहते हैं

आजकल मंत्र बुदबुदाते



उनके खच्चरों के झुंड

बगीचों में उतरते हैं

गेंदे के पौधों को नहीं चरते



गेंदे के एक फूल में

कितने फूल होते हैं

पापा ?



तिब्बत में बरसात

जब होती है

तब हम किस मौसम में

होते हैं ?



तिब्बत में जब तीन बजते हैं

तब हम किस समय में

होते हैं ?



तिब्बत में

गेंदे के फूल होते हैं

क्या पापा ?



लामा शंख बजाते है पापा?

पापा लामाओं को

कंबल ओढ़ कर

अंधेरे में

तेज़-तेज़ चलते हुए देखा हैकभी ?



जब लोग मर जाते हैं

तब उनकी कब्रों के चारों ओर

सिर झुका कर

खड़े हो जाते हैं लामा



वे मंत्र नहीं पढ़ते।


वे फुसफुसाते हैं ....तिब्बत..तिब्बत ...

तिब्बत - तिब्बत....तिब्बत -

तिब्बत - तिब्बत

तिब्बत-तिब्बत ....तिब्बत ..........



तिब्बत -तिब्बत

तिब्बत .......और रोते रहते हैं

रात-रात भर।


क्या लामा

हमारी तरह ही

रोते हैं

पापा ?

1 टिप्पणी:

हर्षवर्धन ने कहा…

शिखंडी-वृहन्नलाओं के देश में .. थोड़ा सा सुधार सत्ता में बैठे शिखंडी-वृहन्नलाओं के देश में