सोमवार, अगस्त 18, 2008

मृत्यु से दस मिनट पहले मैंने डाक्टर को बुलाया-महमूद दरवेश


"जीवन से मैंने कहा-

धीरे चलो, मुझे साथ आने दो

और मेरे ग्लास की प्यास बुझने दो"
9 अगस्त, 2008 को दिल के आपरेशन के दो दिन बाद विश्व प्रसिद्ध फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश चल बसे। उपर्युक्त पंक्तियां कुछ ही दिनों पहले लिखी उनकी कविता से उद्धृत की गई हैं। पहले भी कई बार मृत्यु के करीब पहुंचकर लौट आनेवाले इस विश्व कवि को उम्मीद और जिजीविषा का कवि माना जाता है।

इसी कविता में आगे लिखते हैं -


"मृत्यु से दस मिनट पहले मैंने डाक्टर को बुलाया

इत्तफाक से मिल जाए तो जीने के लिए

दस मिनट से ज्यादा क्या चाहिए?"
13 मार्च, 1942 को तत्कालीन फिलिस्तीन के एक किसान परिवार में पैदा हुए जीवनभर विस्थापन और युद्ध का दंश झेलते रहे। 1948 में इजरायल के गठन के बाद उनका पहला कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ। विद्यार्थी जीवन से ही वे वामपंथी राजनीति से जुड़े रहे और 1970 में मास्को चले गए। इजरायल द्वारा फिलिस्तीन के हिस्से पर कब्जा कर लेने के बाद वे इसका निरंतर विरोध करते रहे, इसलिए इजरायल ने उनकी घर वापसी पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद वे यासिर यराफात के फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के प्रमुख सिद्धांतकार बनकर उभरे, पर 1993 के ओस्लो समझौते का विरोध करते हुए उससे अलग हो गए। 1995 में वे अपने इलाके में लौट आए और रामल्ला में रहने लगे। कहने को उन्होंने दो-दो शादियां कीं, पर जीवन का अधिकांश हिस्सा अकेलेपन में ही गुजारा। उन्हें दुनियाभर साहित्यिक पुरस्कार मिले और बीस से ज्यादा भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद हुए। यहां प्रस्तुत है यादवेंद्र जी द्वारा किये हुए महमूद दरवेश की दो कविताओं का अनुवाद-
वे मेरी मौत से खुश होंगे
वे मेरी मौत से खुश होंगे जिससे सबको बता सकें
यह हममें से एक था, हमारा अपना था
बीस सालों से रात की दीवारों पर सुनता रहा हूं यही पदचाप-
दरवाजा खुलता नहीं
पर वे अंदर जाते हैं-तीनों एक साथ
एक कवि, एक हत्यारे और किताबों से घिरा रहनेवाला एक पाठक।


आप थोड़ी-सी शराब पियेंगे, मैं पूछता हूं
हां-उनका जवाब
आप मुझे गोली कब मारनेवाले हैं?
तुम इत्मीनान से अपना काम करते रहो
एक पंक्ति से वे अपने ग्लास रखकर गाने लगते हैं
जनता के लिए एक गीत

मैं फिर पूछता हूं-कब शुरू करेंगे मेरी हत्या?
बस अभी शुरू करते हैं-पर अपनी आत्मा से पहले
तुमने अपने जूते क्यों उतार रख दिए?
मैंने जवाब दिया- जिससे वे घूम लें सारी धरती पर
पर धरती तो इतनी अंधकारमय है
फिर तुम्हारी कविता प्रकाशमान क्यों रहती हैं?
क्योंकि मेरे हृदय में तीस समंदरों का पानी समाया हुआ है
अब भला तुम्हें फ्रेंच शराब इतनी क्यों भाती है?
क्योंकि मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत स्त्रियों से प्रेम करना था
अच्छा, तुम कैसी मौत चाहते हो?
नीली-जैसे खिड़की से झर रहे हों तारे-

आप और शराब लेंगे क्या?हां, हम और पियेंगे।
आप इत्मीनान से अपना काम करें-
मैं चाहूंगा कि आप हौले-हौले करें मेरा कत्ल
जिससे मैं रच सकूं अपनी आखिरी कविता
अपने दिल की पत्नी के नाम

अट्टहास करते हुए उन्होंने छीन लिया
खास तौर पर लिखे हुए कुछ शब्द!

पहचान-पत्र

दर्ज करें!
मैं एक अरब हूं
और मेरे पहचान-पत्र का नंबर है पचास हजार
आठ बच्चों का बाप हूं और नौवां गर्मियों के बाद आनेवाला है
आपको यह जानकर गुस्सा आया?

दर्ज करें!
मैं एक अरब हूं
एक खदान पर अन्य मजदूरों के साथ मजदूरी करता हूं
आठ बच्चों का बाप हूं
इन्हीं पत्थरों से मैं उनके लिए रोटी कपड़े और किताबें कमाता हूं....
आपके दरवाजे पर दान की याचना नहीं करता
न ही अपने आपको
आपकी सीढ़ियों पर धूल चाटने तक गिराता हूं
अब आप बताइये आपको गुस्सा आया?

दर्ज करें!
मैं एक अरब हूं
मेरा नाम तो है पर इसके साथ उपनाम नहीं
ऐसे देश में बीमार की तरह पड़ा हूं
जहां लोग-बाग उजाड़े जा रहे हैं
और मेरी जड़ें तो खोद डाली गई थीं
समय की उत्पत्ति से और युगों के प्रारंभ से भी पहले
चीड़ व जैतून के पेड़ों
और घास के उगने से भी पहले
मेरे पिता किसी मशहूर ऊंचे खानदान से नहीं
बल्कि हलवाहों के खानदान के थे
और मेरे दादा...थे एक किसान
न ही उनका खानदान ऊंचा था, न ही परवरिश...
उन्होंने मुझे सिखाया सूरज का स्वाभिमान
पढ़ाने-लिखाने से भी पहले
मेरा घरकिसी चौकीदार की मचान जैसा है
घास-फूस और डंठल से बना हुआ-
आप मेरे रहन-सहन से संतुष्ट हैं क्या?

मेरा नाम तो है इसके साथ पर उपनाम नहीं है
दर्ज करें!
मैं एक अरब हूं
आपने मेरे पुरखों के बाग-बगीचे पर कब्जा कर लिया है
और वह जमीन भी जिसे मैं जोतता था
बच्चों के साथ मिलकर
हमारे लिए तो कुछ छोड़ा ही नहीं
सिवा इन चट्टानों के....
तो क्या सरकार उनको भी अपने कब्जे में ले लेगी?
बार-बार जैसी कि घोषणा की जाती रही है?

इसलिए इसे पहले पन्ने पर ही दर्ज करें
मैं किसी से घृणा नहीं करता
न ही किसी का कुछ हथियाता हूं
पर जब भूख लगेगी मुझे
कब्जा करनेवालों का मांस ही होगा मेरा आहार
सावधान हो जाएं....
सावधान....
मेरी भूख से
और मेरे क्रोध से भी!

(अनुवाद- यादवेंद्र)

5 टिप्‍पणियां:

महामंत्री-तस्लीम ने कहा…

महमूद दरवेश के रूप में किसी अरबी रचनाकार की कोई कविता पहली बार पढने को मिली। ये रचनाएं जीवन को जीने का एक नया एवं सार्थक नजरिया उपलब्ध कराती हैं।

शायदा ने कहा…

महमूद दरवेश पर पिछले दिनों में कई पोस्‍ट पढ़ीं। सब की सब बार-बार पढ़ने लायक। धन्‍यवाद पढ़वाने का।

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा लगा पढ़ना..आभार इस प्रस्तुति के लिए!

Manvinder ने कहा…

mahmood darvesh ko padana achcha laga....
ess andaaj ke liye aabhaar

aloknath ने कहा…

Bahut hi imandar kavita, jindagi ka karava sacha is kavita mai parane ko mmila.Koi aparadhi ya atankavadi kyo aur kaise na bane?Ek sher yad ata hai .
Har dabi sas jo sahati hai ghutan muddat tak
Kal sare aam bagavat par machal sakati hai
Alok Nath Tripathi