शुक्रवार, अगस्त 29, 2008

क्या यही तो नहीं वह घड़ी?


बिहार में आई भीषण बाढ़ में बहुत कुछ बह गया...गरीबों का घर-द्वार, अन्न-धन सब कोसी की भेंट चढ़ गया और अमीरों का दीन-ओ-ईमान पूरी तरह बह गया है. मल्लाह सूखे और महफूज जगह तक पहुंचाने की फीस छह हजार रुपये मांग रहे हैं...दूध वाले एक लीटर दूध की कीमत डेढ़ सौ रूपये मांगते हैं...तीन रूपये के बिस्कुट की कीमत पच्चीस से तीस रूपये मांगी जा रही है...गुड़ सौ रूपये किलो में भी नदारद है...भूख से बिलबिलाते बच्चे भूख मिटाने के लिए बाढ़ का पानी पीकर गुजारा कर रहे हैं...कुछ मर गए, बहुत मरणासन्न हैं...ऊपर के लोग ऊपर से आए और बाढ़-दर्शन करके चले गए...हेलीकॉप्टर आकर न जाने किस ब्लैक होल में पैकेट गिरा जाते हैं कि वह किसी को नहीं मिल पा रहा है...सुना है गिद्ध धीरे-धीरे खतम हो रहे हैं...पर अब कुछ बिहार के इन इलाकों में अचानक उतर आए हैं...अफसर और बाहरी लोग पीड़ित महिलाओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं, रोटी के बदले देह मांग रहे हैं और जो देह बचा हुआ है उस देह को पिछले एक सप्ताह से भोजन और पानी नहीं मिला है...नींद तो खैर बहुत बड़ी नेमत है....लोगों ने कथावाचकों से महाप्रलय की कहानी सुनी है और उन्हें इस वक्त पता चल रहा है कि क्या यही तो नहीं वह घड़ी?


लोग तुलसीदास की काव्य-पंक्ति की तरह लोगों से पूछते हैं-कहे लोग एक-एकन सौं कहां जाई का करी- सवाल सबके पास है, पर इस बाढ़ में जवाब भी किसके पास है? सब कुछ बह गया...गया सभी कुछ गया...!

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

भीषण त्रासदी-दुखद.

Lovely kumari ने कहा…

un logon ke dad ki kalpana hi ki ja sakti hai ,jo yah sab bardast kar rahen hain.hamari sarkar is pralay me barabar ki hissedar hai.

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

Pankajji, bahut hi marmik aur sahi chitran kiya hai aapne. aise samay par hi insaan ki asaliyat samne aati hai. mouke ka anuchit laabh utha rahe hain unse nikrisht log aur kaun ho sakte hain?

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

Pankajji,aapne sthiti ka sahi aur marmik chitran kiya hai. Jo log majboori ka fayada utha rahe hain unse jyada gire hue insaan aur koi nahi ho sakte.