शनिवार, फ़रवरी 17, 2007

मरण जल
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पंकज पराशर

रात एक नदी की तरह बहती जा रही है

अंधेरों की बाढ बढती ही चली जा रही है
लगता है गांव में झींगुरों के अलावा और कोई नहीं,

उससे पूछो कि वह कौन है जो मेरे घर पर बुलडोजर चलवाता है
और अपने महल के हम्माम में पानी भरने के लिये वहां बांध बनवाता है?

रात की इस नदी में बार-बार गूंज उठती है
उस आदेवासी औरत की आवाज
जिसके मुंह में जब आवाज आई तो कहने के लिए
और कुछ भी न बचा उसके पास जो कुछ भी था वह
देश की जम्हूरियत की नजर हो गया था

जिसका देश शहर नहीं जंगल है और सरकार कुदरत है

तुमने नगर में उसे जगह नहीं दी और जंगल भी उससे छीन ली
और बन बैठे उसके माई-बाप,
उसकी सरकार जिसकी उसे इत्तला तक नहीं दी कभी

-फिर किसने तुम्हें ये हक दिया कि तुम मुझे सभ्य बनाओ
मुझे जीना सिखाओ जैसे कि तुम हो सभ्यता की साबुन
और तहज़ीब के अलंबरदार मेरे वजीर-ए-आजम
सियार से भी गये बीते

तुम जो मेरे रहनुमा हो मेरे आका हो
और आज भी हो मेरे माई-बाप मुझे बताओ
कि वह कौन है जिसका नाम तक बताने में तुम्हारी ज़बान
इस कदर लडखडाती है? और तुम्हारी त्यौरियां चढ जाती है
हमलोगों के ऊपर ही?

मेरा बेटा जब मरा तो उसके हाथ में तुम्हारा ही झंडा था
मेरे बाप को जो फांसी हुई वह जुर्म तुमने किया था
और मैं विधवा आज इसलिए हूं कि मेरे पति ने
तुम्हारा ज़रखरीद गुलाम बनने से साफ इनकार कर दिया था

तुम्हीं बताओ तुम्हारे लोकतन्त्र को और क्या-क्या चाहिए मेरा?

मेरी आंखें, मेरा गुरदा, मेरे स्तन, मेरी जांघें बताओ?
एक जंगल की औरत पूछ रही है तुमसे
तुम्हारे नगर के नागरिकों और जम्हूरियत के नये काजियों से
मेरे पूरे वजूद में सिवाए मरण जल के अब कुछ भी नहीं
१७.०२.२००७

3 टिप्‍पणियां:

Abhishek Srivastava ने कहा…

बहुत अच्‍छी कविता है...आप अनुमति दें तो मैं इसे जनप्रतिरोध के लिए ले लूं...

जवाब के इंतज़ार में...

आपका
अभिषेक श्रीवास्‍तव

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

कविता के मर्म को समझा जा सकता है, बेहद सपाट शब्दों में आपने बातों को रखा है.
खासकर ये लाईन्-" जिसका देश शहर नहीं जंगल है और सरकार कुदरत है".................

पंकज पराशर ने कहा…
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