मंगलवार, फ़रवरी 27, 2007

साइकिल संस्कृति का शहर


पांडिचेरी के लोग अपनी साइकिलों पर शान से सवारी करते हैं
बेशक आपकी कार आपके लिए शान और आराम की सवारी हो पर पांडिचेरी के आलोक घोष अपनी साइकिल को किसी महंगी कार से कम नहीं समझते और शहर में जहाँ भी उन्हें जाना होता है, वो अपनी साइकिल पर ही चलते हैं.
ऐसा नहीं है कि वो कार ख़रीदने की हैसियत नहीं रखते. साइकिल उनकी मजबूरी नहीं, शौक है और पांडिचेरी ऐसे ही साइकिल शौकीनों का शहर है.
यह पांडिचेरी की ख़ास साइकिल संस्कृति है जो लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से लेकर पर्यटन तक अपनी ख़ास जगह रखती है.
यूँ तो पांडिचेरी का जिक्र करते ही अरविंदो आश्रम या बोट-क्लब ध्यान आते हैं पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर पांडिचेरी शहर की रौनक और ख़ूबसूरती का लुफ़्त उठाना है तो कार के शीशों के अंदर से नहीं, एकबार साइकिल पर बैठकर देखिए.
अब साइकिल कहाँ से लाएँगे, ये सोचकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है.
लगभग सभी मुख्य सड़कों पर और ख़ासकर अरविंदो आश्रम के पास कई ऐसी दुकानें हैं जो किराए पर साइकिल देती हैं, वो भी महज तीन रूपए प्रति घंटा के हिसाब से.
पर्यटकों की पसंद
किराए पर साइकिल देने वाले विनायकम ने बताया, "यहाँ के लोग साइकिल ख़ूब चलाते हैं, साथ ही पर्यटक भी यहाँ बड़ी तादाद में साइकिल किराए पर लेते हैं."

साइकिल चलाने में महिलाओं को भी कोई परेशानी नहीं होती
इससे उन्हें रोज़ करीब दो सौ रूपये तक की आमदनी हो जाती है
विनायकम 1990 से इस काम में हैं. उन्होंने तब तीन साइकिलों से यह काम शुरू किया था और आज उनके पास 35 साइकिलें और छह मोटर साइकिलें हैं.
कोलकाता से पांडिचेरी घूमने आए सुबोध सेन कहते हैं, "अगर दिनभर ऑटो या रिक्शे पर घूमना हो तो 150-200 रूपए तक खर्च हो जाते हैं, वहीं कुल 15-20 रूपए में साइकिल पर शहर देखने का मज़ा लिया जा सकता है और फिर यह शहर ही ऐसा है, जिसे साइकिल पर ज़्यादा मज़े लेकर देख सकते हैं."
इतना ही नहीं, जहाँ बड़े महानगरों में अब साइकिल ठीक करने वाले ढूँढने पर भी नहीं मिलते, वहीं यहाँ के साइकिल मरम्मत करनेवाले भी खुश हैं. जोसफ कहते हैं, "दिन में 90-100 तक की आमदनी हो जाती है और बच्चों का पेट पल जाता है."
फ़ायदेमंद सवारी
पांडिचेरी की निवासी माही पाटिल कहती हैं, "पांडिचेरी शहर इतना बड़ा नहीं है कि तमाम प्रमुख जगहों पर साइकिल से न जाया जा सके. यही वजह है कि शहर के 20 प्रतिशत लोग साइकिल पर ही चलते हैं. इसे चलाना आसान है. न तेल का झंझट, न बेमतलब का धुँआ और प्रदूषण."
इस शहर को फ़्राँसीसियों ने बसाया है. इसकी सुंदरता में उनकी वास्तुकला और नगर संरचना का बड़ा योगदान है जो आने वाले समय में बदलते माहौल से प्रभावित हो सकता है

जी दुरई, स्थानीय व्यक्ति
पर क्या महिलाओं के लिए साइकिल पर चलना भी आसान है, यह पूछने पर वो बताती हैं, "यह दिल्ली नहीं है और न ही यहाँ का माहौल इतना ख़राब है. लोगों के लिए यह कोई नई चीज़ नहीं है, सो साइकिल छेड़छाड़ की वजह नहीं बनती."
अब पर्यटक हों या स्कूलों के बच्चे, पुस्तकालय जाने वाले बुजुर्ग हों या ख़रीददारी करने निकली महिलाएँ और या फिर कामकाजी पुरुष, साइकिल सबके लिए शान की सवारी है.
हालांकि अब लोग शहर की बढ़ती आबादी से भी चिंतित हैं और मानते हैं कि आबादी के साथ-साथ शहर की सीमाएँ ही बढ़ेंगी जिससे लोग बड़े वाहन खरीदेंगे और इस तरह शहर में प्रदूषण बढ़ेगा.
शहर के पुराने वासी जी दुरई कहते हैं, "इस शहर को फ़्राँसीसियों ने बसाया है. इसकी सुंदरता में उनकी वास्तुकला और नगर संरचना का बड़ा योगदान है जो आने वाले समय में बदलते माहौल से प्रभावित हो सकता है."
कुछ भी हो, साइकिल इस शहर की सड़कों की रानी है. जब भी "भारत के पेरिस" माने जाने वाले इस शहर में आपका जाना हो, यहाँ की शान की सवारी, साइकिल का मज़ा ज़रूर लें.


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पांडिचेरी

2 टिप्‍पणियां:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

पंकज जी आपके ब्लाग का चक्कर लगाय तो एक साथ कई बातें नेपथ्य में दौड्ते नजर आयी. शायद सप्ताह भर में नेपथ्य में कई महत्वपूर्ण चीजें देखने को मिलेगी.

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…
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