शनिवार, सितंबर 01, 2007

एक रिश्ता जिसके आगे रिश्तेदारी भी फीके हैं

मित्र बनाने की परम्परा को छत्तीसगढ़ में मितान या मितानिन 'बदना' कहते हैं. इस 'बदना' का मतलब है एक तरह से अनुबंध की औपचारिकता.
दो पुरुष या दो महिलाएँ आपस में एक दूसरे को मितान बनाने के लिए एक दिन नियत करते हैं और मितान बद लेते हैं.कहीं फूलों का आदान-प्रदान किया और मित्र बन गए, तो कहीं गंगा जल या तुलसी के पत्तों का आदान-प्रदान हुआ. एक छोटे-से आयोजन में गौरी-गणेश और कलश की पूजा के बाद एक दूसरे को कोई पवित्र चीज़ देकर मितान 'बदा' जाता है.
कहीं-कहीं एक दूसरे का नाम अपने हाथों पर गुदवा कर (यानी उसका नाम अपने हाथ में स्थाई टैटू की तरह लिखवाकर) मितान बनने की भी परम्परा है. हालांकि स्वाभाविक सामाजिक परिवेश की वजह से इस परंपरा का विस्तार दो विपरीत लिंग वाले लोगों के बीच नहीं हो सका. यानी कोई पुरुष किसी महिला के साथ मितान नहीं बद सकता.
पीढ़ियों का साथ
इस मित्रता के कई नाम हैं, हालांकि व्यावहारिक रुप से सब एक से ही हैं.
मितान बनाने के लिए आदान प्रदान की जाने वाली चीज़ के आधार पर इनके नाम भी हैं- भोजली मितान, दौनापान, गंगाजल, सखी, महाप्रसाद, गोदना, गजामूंग.
दो पुरुष आपस मे मितान होते हैं और दो महिलाएँ मितानिन.
अब तो उम्र के आख़री पड़ाव में आ गए हैं लेकिन मुझको याद नहीं कि कभी हम दोनों के बीच किसी बात को लेकर, किसी भी तरह का कोई मनमुटाव हुआ हो. हर सुख-दुख में बिना आवाज़ दिए ही मैंने मितान को अपने साथ खड़ा पाया है

रामझूल
श्रावण मास की सप्तमी को धान के बीज बो कर उसे पूजने की परम्परा यहां रही है, जिसे भोजली कहा जाता है.
रक्षाबंधन के दूसरे दिन इस भोजली को विसर्जित किया जाता है. छत्तीसगढ़ में एक दूसरे को इसी भोजली को कानों में लगा कर भोजली मितान बनाने की प्रथा चलन में ज़्यादा है.
एक बार आपस में मित्र बन गए तो यह मित्रता आजीवन बरक़रार रहती है और आने वाली पीढ़ियों में भी उस मित्रता का निर्वाह किया जाता है.
मितान यानी हर सुख-दुख का साथी. किसी के यहां ब्याह हो या मृत्युपरांत मुंडन, मितान हर क़दम पर एक दूसरे के साथ होंगे.

1 टिप्पणी:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत जानकारी से भरपूर लेख है।बधाई।