शनिवार, सितंबर 22, 2007

क्या यही है हमारी मानवीयता का सच?

हिंदी के बेहद संवेदनशील कवि आलोकधन्वा ने अपनी मशहूर कविता सफेद रात में एक स्थान पर लिखा है-
बहस चल नहीं पाती
हत्याएं होती हैं
फिर जो बहसें चलती हैं
उसका भी अंत हत्याओं में होता है.

कुछ हिंदी चिट्ठाकारों की प्राथमिकताओं और लेखन के लिए चुने गए विषयों को देखकर बहुत दुःख होता है. क्योंकि जिन चिट्ठों पर राजनीतिक चर्चाओं को जगह मिलती है वहां भी नेपाल की ताजा स्थिति पर कोई बहस नहीं है. यह सच है कि आपको जो अच्छा लगे, जो विषय जंचे उस पर आप लिखें और अपने ब्लाग में छापें, मगर हम अपने समय की क्रूरताओं और हिंसा से आखिर कब तक तटस्थ रह सकते हैं? हमारे आसपास की घटनाएं ही नहीं, हमसे दूर घट रही घटनाएं भी हमें आज किसी न किसी रूप में प्रभावित करती हैं. आलोक के ही शब्दों में-क्या लाहौर फिर बस पाया? क्या वे बग़दाद को फिर से बना सकते हैं? वे तो रेत पर उतना भी पैदल नहीं चल सकते, जितना एक ऊंट का बच्चा चलता है, ढूह और गुबार से अंतरिक्ष की तरह खेलता हुआ.तो जो लाहौर को, काबुल को, बगदाद को बना नहीं सकता, बसा नहीं सकता, उसको मिटा देने का अधिकार दुनिया के दारोगा को आखिर किसने दिया है?
पीढ़ियों से नेपाल में रह रहे पहाड़ी मूल से अलग दिखने वाले लोगों को मधेशी कहकर अपमानित किया जाता रहा है. उन्हें कोई मूल अधिकार देने के बदले राजशाही दशकों से बहलाती रही.नेपाल जब लोकतांत्रिक देश बना तो भारतीय मूल के लोगों यानी मधेशियों की उम्मीदें जवां हुई. माओवादियों के ताकतवर होने के बाद प्रगतिशील लोगों की उनसे और अधिक उम्मीदें बढ़ गईं, लेकिन पिछले तीन-चार दिनों से माओवादियों के हथियारबंद दस्ते उन्हें पकड़-पकड़कर गोलियों से भून रहे हैं.पुलिस अभिरक्षा से मधेशी नेताओं को जबरन बुलाकर कत्ल किया जा रहा है. नेपाल के तराई में कर्फ्यू जैसा माहौल है. गांव-के-गांव खाली हो चुके हैं. लोग भारत पलायन कर रहे हैं और भारी अफरा-तफरी का माहौल है. दुखद यह है यह भी लोकतंत्र के वास्तविक बहाली अर्थात राजशाही की पूरी तरह समाप्ति के नाम पर हो रहा है.


लोकतंत्र का सबसे बड़ा दारोगा अमेरिका लोकतंत्र के नाम पर आज दुनिया के १३६ देशों में अपने सैनिकों की मौजूदगी को सुनिश्चित कर चुका है. इराक, अफगानिस्तान, सूडान, सीरिया, फिलिस्तीन,निकारागुआ, वियतनाम सब को रौंद चुका है. मोसोपोटामिया की उन्नत सभ्यता के देश इराक को आज एक विशाल कब्रिस्तान में बदलने की कवायद जारी है. फ्रांस के विदेश मंत्री के कल के खुलासे के अनुसार अमेरिका ईरान पर हमले की तैयारी को तकरीबन अंतिम रुप दे चुका है. यह सब लोकतंत्र के लिए हो रहा है और लोकतंत्र के नाम पर,लोकतंत्र की मजबूती के लिए हो रहा है. हैरतअंगेज यह है कि अमेरिका के कट्टर विरोधी नेपाल के माओवादी भी नेपाल निर्दोष मधेशियों की हत्या उसी कथित लोकतंत्र के नाम पर कर रहे हैं, जिस लोकतंत्र के नाम पर अमेरिका यह सब कुछ कर रहा है.


हिंदी चिट्ठाकारिता में इस त्रासद स्थिति की आहट नहीं सुनाई दे रही है. यह मानवीयता नहीं है शायद कि एक खास आइडेंटिटी के लिए हिंदी भाषियों की हत्या हो और हम किसी न किसी कारण या आग्रहवश इस हिंसा की अनदेखी करें. असम में, मुंबई में मात्र हिंदी भाषी होने के अपराध में लोगों की हत्या हो रही है. क्या किसी खास भाषा को बोलना अपराध है? सोचें हम कि यह चुनी हुई चुप्पी बौद्धिकता है, मौनम स्वीकृति लक्षणम् है, हिंसा का समर्थन है या क्या है यह?

1 टिप्पणी:

अविनाश ने कहा…

तुमने सही कहा। लेकिन ब्‍लॉगिंग एक व्‍यक्तिगत आग्रह की ही ज़मीन है। तुम इतना ही आकलन कर सकते हो कि ब्‍लॉगिंग का यह वक्‍त कितना वक्‍त और समाज से कटा हुआ है। दरअसल नेपाल में जो हो रहा है, उसकी सही-सही सूचना भी नहीं मिल पा रही। कोई अख़बार (जनसत्ता को छोड़ कर), टीवी इस सूचना को सार्वजनिक कर रहा। वैसे भी नेपाल में मधेशियों का जो आंदोलन है, वह बिचौलियों का आंदोलन है- लेकिन इस आंदोलन को कुचलने का माओवादियों का तरीक़ा ग़ैर राजनीतिक है और इसका समर्थन नहीं किया जा सकता।