शुक्रवार, सितंबर 21, 2007

काफ़िर, तनखैया और माओवाद


यह तकरीबन हर धर्म के मनमाने व्याख्याकारों के साथ दिक्कत है कि कोई रैशनल आदमी अगर जरा भी उनके तर्कों से असहमति व्यक्त करता है या वह अगर अत्यंत आपत्तिजनक तर्कों को काटने का प्रयत्न करता है, पंडितों, मुल्लाओं,ज्ञानियों या किसी खलीफा की सुनने से इनकार करने की जुर्रत करता है, तो वह फौरन क़ाफिर, तनखैया या देशद्रोही करार दे दिया जाता है.


बेहद हैरतअंगेज और चिंताजनक बात यह है कि प्रगतिशील और मार्क्सवाद का बाना धारण किये हुए, कुछ तो सिर्फ तन के स्तर पर- कोई जरा भी उनके तर्कों को अगर काटने की कोशिश करे, या उनके एकांगी और पूर्वाग्रही तर्कों को मानने से इनकार करे तो वे भी धार्मिकर अलंबरदारों की तरह ही ऐसे लोगों को फौरन फासिस्ट, और संघी-प्रतिक्रियावादी आदि-आदि कहकर कट लेते हैं. जो कि एक लोकतांत्रिक देश और व्यवहार के धरातल पर कतई उचित नहीं है.नेपाल में हथियारबंद माओवादियों ने एक दर्जन के करीब निर्दोष मधेशी नेताओं की गोली मारकर हत्या कर दी. माओवादियों की इस कार्रवाई के भी समर्थन में मेरे कुछ कथित प्रतिबद्ध माओवादी मित्रों ने समर्थन किया है-सिर्फ विचारधारा एक होने के कारण. सोचने की बात है कि क्या यही है सर्वहारा के कल्याण और जनता के लिए लड़ने का नारों का यथार्थ? क्या यही है जनाब प्रचंड की घोषणाओं की हकीकत? आखिर उनके उतावलेपन और बौखलाहट का कारण क्या है? जहां तक मैं जानता हूं मार्क्सवाद की किसी भी व्याख्या में निर्दोषों की हत्या करने का कोई प्रमाण कहीं नहीं मिलता. अगर यह सांच कहिये तो माओवाद समर्थक मित्र मारने दौड़ते हैं. क्या ऐसे ही मौकों को ध्यान में रखकर कबीर ने कहा था-

सांच कहै तो मारन धावै

झूठे जग पतियाना...साधो सब जग बौरान....

6 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

पराशर साहब आपके चिट्ठे पर टिप्पणी नहीं हो रही है. एक बार जांच लीजिए.
वामपंथियों पर एक लेख यह भी है
वाम वाम कत्लेआम

अविनाश ने कहा…

मैं तुमसे सहमत हूं।

ramesh shukla ने कहा…

बेनामी साहब
ये पाराशर साहब तो सिर्फ अपने मन के मुताबिक टिप्पणिया अप्रूव करते हैं. जो टिप्पणियां इनकी सोच के मुताबिक नहीं होती या जिनसे ये गलत साबित होते है उन्हें ये अप्रूव नहीं करते

ये तो मैगज़ीन के कापी राईटर है, कोई ब्लागर थोड़े हीं है, जाने दीजिये इन्हें

Pankaj Parashar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Pankaj Parashar ने कहा…

भाईजान,
व्यंग्य की इतनी तेज धार से हमला करने से पहले आपने एक बार भी न सोचा कि आप जो कहने जा रहे हैं वह वाकई सत्य है, या इसकी वजह कोई तकनीकी गड़बड़ी भी हो सकती है, या साफ कहें तो तकनीकी अक्षमता भी. ख्वाब का दर पर कटु से कटु आलोचना का भी स्वागत है, टिप्पणी छापने के मामले में हम किसी भी तरह के आग्रह से दूर रहते हैं, यकीन करिये.

Pankaj Parashar ने कहा…

वेबदुनिया में कार्यरत मेरी एक मित्र ने एक टिप्पणी भेजी लेकिन किसी कारणवश वह दिखी नहीं. पेश है निहारिका झा, इंदौर की एक टिप्पणी-पंकज जी,
आपके काफिर, तनखैया... पर कमेंट किया है, शायद फिर से वह ऑनलाइन नहीं दिखा।
मैंने अपने gmail account से कमेंट किया था। शायद उसमें कुछ दिक्‍कत आ रही। खैर
मैं लिखना चाह रही थी कि सत्‍य बोलें प्रिय बोलें लेकिन अप्रिय सत्‍य न बोलें
क्‍योंकि हमारे देश के लोगों को सबकुछ अच्‍छा-अच्‍छा देखना और सुनना पसंद है,
जहाँ अन्‍याय या अनीति दिखती है उधर से नजरें फेर लेते हैं, क्‍योंकि यह तो
लोकतांत्रिक देश है ना।