मंगलवार, जुलाई 15, 2008

11 सितंबर, 2001 के बाद गेब्रियल गार्सिया मार्केज का पत्र जार्ज बुश के नाम

सुप्रसिद्ध लेखक गेब्रियल गार्सिया मार्केज ने अमेरिका राष्ट्रपति जार्ज बुश के नाम पत्र लिखा, जिसका स्पेनिश से अंगरेजी में अनुवाद मेरियन मार्शरोन्स ने किया और हिंदी में इसे हम लोगों के लिए ढूंढ़ा और अनूदित किया है जनाब यादवेंद्र जी ने। मार्केज की कुछ रचनाओं का मैं अपनी मातृभाषा मैथिली में अंगरेजी से सीधे अनुवाद कर रहा हूं। जल्दी ही मैथिली के एक नये ब्लाग पर वह तमाम चीजें उपलब्ध होंगी। यहां पेश है मार्केज के उस पत्र का यादवेन्द्र जी द्वारा किये गए अनुवाद का अविकल रूप-



अब आपको कैसा लग रहा है? कैसा लगता है जब विभीषिका पड़ोसी के घर के अंदर नहीं बल्कि आपके आहाते में तांडव नृत्य कर रही है? भय जब आपके सीने पर दबाव बढ़ाने लगे, बहरा कर देनेवाले शोर और अनियंत्रित लपटों के बीच एक-एक करके ऊंची इमारतें धराशायी होने लगें, उठती हुई दुर्गंध आपके फेफड़ों को चीरती हुई अंदर तक धंसने लगे और तमाम निर्दोष लोगों की खून और गर्द से सनी आंखें आपको चारों ओर से सीधे-सादे लगें तो आपको कैसा लगेगा? दिन घर के अंदर बिताते हुए जब आपको यह पता न हो कि अगले पल क्या हादसा पेश आनेवाला है तो आपको कैसा लगेगा? क्या इस सदमे से उबर पाना मुमकिन होगा? 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा पर पर आक्रमण में मरने से बच गए लोग बदहवासी में इधर-उधर भाग रहे थे-शहर का कोई हिस्सा अमेरिकी अणु बम गिरने के बाद सुरक्षित कुछ नहीं बचा था। कुछ सेकेंड बीतते-बीतते अस्सी हजार पुरुष-स्त्री और बच्चे काल के गाल में समा गए थे। इनके अलावा बाद के वर्षों में ढाई लाख अन्य लोग को विकिरण के प्रभाव से मरना था। पर यह दूर घट रहा युद्ध था और तब तक टेलीविजन का हमारे जीवन में प्रादुर्भाव नहीं हुआ था।
अब जब टेलीविजन पर ११ सितंबर की घटनाएं खतरनाक ढंग से आपको एहसास करा रही हैं कि यह सब किसी दूर देश में नहीं, बल्कि आपके अपने देश में घट रहा है, तब आपको कैसा लग रहा है? २८ साल पहले इसी तरह ११ सितंबर को आपके देश के नेताओं द्वारा प्रायोजित सैनिक तख्तापलट में सल्वाडोर एलेंडे नाम का राष्ट्रपति मारा गया था। यह भी विभीषिका की घड़ी थी पर यह सब अमेरिका की सीमा से मीलों दूर एक छोटे दक्षिण अमेरिकी देश में घट रहा था। हालांकि था यह आपके पिछवाड़े का ही एक देश और आपके देश के युद्धपोत अपनी जिद मनवाने के लिए गोली-बारूद लेकर उधर बढ़ रहे थे-पर आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
क्या आपको यह जानकारी है कि १८२४ से लेकर १९९४ के बीच आपके देश ने लैटिन अमेरिकी देशों पर ७३ आक्रमण किए? इनके शिकार हुए पुएर्टो रिको, मैक्सिको, निकारागुआ, पनामा, हाइती, कोलंबिया, क्यूबा, होंडुरास, डोमिनिकन रिपब्लिक, वर्जिन आइसलैंड्स, अल सल्वाडोर, ग्वांटेमाला तथा आपके देश के नेता कोई एक शताब्दी से युद्ध में लिप्त रहे हैं। २० शताब्दी के शुरू होने के बाद ऐसा कोई भी युद्ध नहीं हुआ है जिसमें आपके पेंटागन की संलिप्तता न रही हो। यह अलग बात है कि बम हर बार आपकी भूमि से बाहर ही फूटते रहे हैं-पर्ल हार्बर इसका इकलौता अपवाद है जब १९४१ में जापानियों ने सातवें बेड़े पर बम गिराए थे। पर इसमें भी विभीषिका निकट नहीं, दूर थी।
जब ट्विन टावर जमींदोज हुए, जब आपने इसके चित्र टी.वी. पर देखे या लोगों की चीख-पुकार सुनी- उस सुबह आप मैनहट्टन में ही थे। क्या एक पल के लिए भी आपको यह एहसास हुआ कि बरसों-बरस वियतनामी किसानों ने ऐसी ही विभीषिका को झेली होगी। मैनहट्टन में लोग गगनचुंबी इमारतों से कठपुतलियों की तरह टपकते रहे, वियतनाम में लोग पीड़ा से चीखते रहे। उनकी मौत भी उतनी ही दर्दनाक थी जैसी बदहवासी में ऊंचाई से छलांग लगाने वाले अमेरिकी लोगों की थी।
आपकी वायु सेना ने युगोस्लाविया में कोई भी ऐसा कारखाना या पुल नहीं छोड़ा जिसे क्षति न पहुंची हो। इराक में पांच लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। आपरेशन डेजर्ट स्टार्म के नाम पर पांच लाख लोगों की जान ले ली गई। सुदूर वियतनाम, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, लीबिया, अंगोला, सोमालिया, कांगो, निकारागुआ, ड्रोमिनिकन रिपब्लिक, कंबोडिया, युगोस्लोविया और सूडान में कितने लोगों की जान ले ली गई? यह सूची बढ़ती ही जाती है-उन सभी देशों में जो बुलेट इस्तेमाल की गई वे सभी आपके देश में बनी हुई थी और इन्हें आपके ही आदमी चला भी रहे थे। चाहे आपकी सरकार उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा देती रही है और यह सिलसिला इतने लंबे समय से इसलिए चलता आ रहा है जिससे आप अमेरिकी शैली का जीवन जीते रहें।
पिछले करीब सौ सालों से आपका देश पूरी दुनिया से युद्ध लड़ता आ रहा है आपके पास देश के नेतागण स्वतंत्रता व गणतंत्र के ध्वजवाहक बने फिरते हैं। पर आपको यह जानना चाहिए कि दुनिया में ऐसे बहुत सारे लोग हैं, इस धरती पर कोई चौबीस हजार लोग भूख या उपचार योग्य बीमारियों से ग्रसित होकर दम तोड़ देते हैं। जिनके लिए अमेरिकी स्वतंत्रता का कोई प्रतीक नहीं, बल्कि दूर खड़ा खतरनाक शत्रु है जिसके पास देने के लिए मात्र युद्ध, भूख, डर तथा विनाश है। आपके लिए उपर्युक्त सभी सैनिक संघर्ष सुदूर भूमियों की समस्याएं हैं पर वहां के बाशिंदों के लिए तो युद्ध में जब बमबारी से इमारतें ध्वस्त होती हैं और लोग दर्दनाक मौत मरते हैं तो यह पीड़ादायी वास्तविकता उनके बिल्कुल सामने खड़ी होती है और इनके नब्बे प्रतिशत शिकार नागरिक, स्त्रियां, वृद्ध और बच्चे होते हैं-आनुषंगिक क्षति।
कैसा लगता है जब दहशत बिल्कुल आपके दरवाजे पर दस्तक देने लगा है-चाहे यह एक दिन के लिए ही हो? आपको कैसा लग रहा है जब न्यूयार्क में सेक्रेटरी, स्टाक मार्केट व्यापारी, क्लीनर इसके हादसे के शिकार होते हैं जो हमेशा वक्त पर टैक्स अदा करते आए हैं और जिन्होंने जीवन में कभी एक मक्खी भी न मारी हो? डर लगने पर कैसा महसूस होता है? कैसा लगता है जब ११ सितंबर को एकबारगी यह पता चलता है कि युद्ध अब अंततः आपके घर तक आ पहुंचा है?
(इस महत्त्वपूर्ण अनुवाद के लिए पाठक सीधे यादवेन्द्र जी को 0-9997642661 पर बधाई दे सकते हैं।)

5 टिप्‍पणियां:

विभाव ने कहा…

बहुत ही महत्वपूर्ण लेख आपने प्रस्तुत किया है.
मैं अंग्रेजी में पढ चुका हूं, हिन्दी में अनुवाद बहुत अच्छा किया गया है. मुझे तो अंग्रेजी से ज्यादा स्पष्ट लगा.
धन्यवाद
शब्द पुष्टिकरण हटा दें तो बेहतर है.

बेनामी ने कहा…

well weitten

Udan Tashtari ने कहा…

Aabhar is patra ka anuvaad yahan pesh karne ke liye.

Vibha Rani ने कहा…

bahut badhiya. fir bhi duniya chet nahi rahi, varana saddam maare n jaate, aur unake marane par duniyaa khush naa hotii. aaj america apane maqasad mein kamiyab ho gaya hai, ho raha hai, hota ja raha hai. Kolambus ki aatma kahaan hai? vah bhi jahan kahin hogi, chiikh rahi hogi.

Alok Nath Tripathi ने कहा…

Aise sahaspurn aur marmik patra ke liye lekhak ko bahut bahut dhanyavad. Aj ke samay mai jab sabhi shisha nava kar amerika ki sabhi tarah ki gundagardi bardast kar rahe hai, kisi ne to sahas karake antaratma ki awaj ko shabd diya. Utana hi dhanyavad anuvadak Yadavendra ji ko bhi, jinake dwara itana sajiv, marmik aur saral anuvad kiya gaya.Alok Nath Tripathi