शनिवार, जुलाई 19, 2008

अमेरिकी अवाम कितना दुखी और आक्रांत है?

लॉरा बुश के नाम एक मां का पत्र बेहद मार्मिक और हिला देनेवाली कविता है। इस महत्वपूर्ण कविता को पोयट अगेंस्ट वार की वेबसाइट से लेकर हिंदी में अनूदित किया है श्री यादवेन्द्र जी ने, जो इन दिनों रुड़की में अध्यापन करते हैं।


कैसा दुख

रॉबिन टर्नर (टेक्सास)

क्या आपको एहसास है कि अमेरिकी अवाम
कितना दुखी और आक्रांत है?

लॉरा बुश- हां, मुझे बखूबी एहसास है...
और आप यकीन मानिये
प्रेसीडेंट से और साथ में मुझसे ज्यादा दुखी और कोई
कैसे हो सकता है भला...ये सब देखकर?


डियर मिसेज बुश...डियर लॉरा...
आप नाराज तो नहीं हो जाएंगी यदि मैं आपको बस
लॉरा कहकर बुलाऊं?

हम दोनों स्त्रियां हैं तो हैं-मां भी हैं
और दोनों टेक्सास की ही रहनेवाली है...
हम दोनों एक ही बोली तो बोलती हैं
और हमारी मातृभाषा भी एक ही है


क्या आपको एहसास है कि अमेरिकी अवाम
कितना दुखी और आक्रांत है?

सुबह-सुबह
मैं कपड़े पर इस्तरी कर रही थी
तभी आपका इंटरव्यू देखा
अपने छोटे बेटे की उस कमीज पर इस्तरी...
जो उसके भैया की की तरह होने के कारण
उसको ज्यादा अजीज है...


उसका भैया अब कभी लौटकर नहीं आएगा घर...
वह मारा गया इराक में


प्रेसीडेंट से और साथ में मुझसे ज्यादा दुखी
और कोई कैसे हो सकता है भला?


मन में आया आपको अंदर बंद रखनेवाले बाक्स को तोड़ डालूं
और आप यूं ही मेरी किचन में बैठी रहें
जब तक मेरे कपड़ों की इस्तरी पूरी न हो जाए...
बस केवल आप और मैं
और बतियातें रहे औरतोंवाली तमाम बातें
मैं अपने दिल की बातें कहूं आपसे...
की अब ये किस कदर टूट चुका है-बातें कुछ भी करें
और बातें सब कुछ की...छोटी से छोटी बात भी
जैसे महज एक शब्द
या मेरे बांके पति के सजीले चेहरे पर
बेटे की मौत की घुटी हुई पीड़ा की...


मैं आपको बताऊं कि...
कैसे आंसू बन गये हैं हमारी जुबान अनजाने ही
और दिन भर की बातचीत से इस भारी नदी को अलहदा करना
हमारे लिए मुमकिन नहीं हो रहा अब...


वहां गुमसुम पड़ी किचन में बस हम दो ही तो रहेंगे
आप और मैं...
ऐसा हो सकता है कि बतकही में मुझे ये सुध न रहे
कि दरअसल मैं तो इस्तरी कर रही थी
और बस नाक की सीध में ही अपलक देखती रह जाऊं
आज सुबह की तरह....


संभव है शर्ट को जलाती हुई प्रेस पर
मेरी छोड़ आपकी निगाह पड़ जाए...


आपको छेद दिख जाए जो शर्ट में बना है नया
बिल्कुल अभी-अभी...या आपका ध्यान खींच ले
अनायास उठता हुआ धुंआ
इससे ज्यादा दुख भला किसके कंधे टिका होगा?
लॉरा, आप मेरा यकीन करें....

5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

जबरदस्त!!

बेनामी ने कहा…

Aise sahaspurn aur marmik patra ke liye lekhak ko bahut bahut dhanyavad. Aj ke samay mai jab sabhi shisha nava kar amerika ki sabhi tarah ki gundagardi bardast kar rahe hai, kisi ne to sahas karake antaratma ki awaj ko shabd diya. Utana hi dhanyavad anuvadak Yadavendra ji ko bhi, jinake dwara itana sajiv, marmik aur saral anuvad kiya gaya.
Alok Nath Tripathi

शहरोज़ ने कहा…

भाई, बहुत बढया लगा इधर आना.अच्छा कम कर रहे हो.
कभी समय मिले तो इस लिंक की तरफ भी रुख कीजिये हुजुर.
www.hamzabaan.blogspot.com
www.shahroz-ka-rachna-sansaa.blogspot.com

yadvendra ने कहा…

pichhle kuchh mahino me maine iraq yudh ki prishthabhumi me gair rajnaitik ameriki logo(sainik,unke parijan,school ke chhatra aur adhyapak,rachnakar aur kalakar,vaigyanik)ke yudh virodh me kiye gaye sahasik aur mahatvapurn kam ke bare dher sari samagri ikatha ki hai...jisme kai patr bhi hai.akhbar inke bare me koi dilchaspi nahi dikhate.blog par kuchh chuninda chije dalne par behad utsahit karnewali pratikriya mili.aur samagri dalne ki koshish karunga.
bhartiya sandarbh me aisa sahasik pratiridhi sahitya yadi mile to unka swagat hai....khas taur par 50-60 salo se chal rahe north east aur kashmir me chal rahe aghoshit yudh ke sandarbh me.
in sabko sankalit karke main ek kitab ki yojana par kam kar raha hu...mitro ka rachnatmak sahyog mil jaye to utsah badhega mera

yadvendra

बेनामी ने कहा…

itne saral shabdon main likhi ye kavita bahut andar tak mann ko choo gayi.america ne jo yudh shuru kiya hai uska khamiyaza bhugat rahe hain uske apne log bhi.anuvadak ne un yudh ke anchuye pakshon ko samne lane ki achi koshish ki hai.