शुक्रवार, जुलाई 18, 2008

मैं इस अघोषित तथा विनाशकारी युद्ध का विरोध करती हूं।

सितंबर २००५ में प्रसिद्ध अमेरिकी कवि शेरोन ओल्ड्स ने वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति की पत्नी लोरा बुश के नाम एक पत्र लिखा। शेरोन की तारीफ में अगर कहने लगूं तो एक पोस्ट नाकाफी होगा, फिलहाल इतना जान लें कि बेहद प्रखर और प्रख्यात अमेरिकी कवि, न्यूयार्क में क्रिएटिव राइटिंग की प्रोफेसर, नेशनल क्रिटिक्स अवार्ड समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। न्यूयार्क राज्य की सम्मानित पोयट लारिएट। जिसका अनुवाद जनाब यादवेंद्र जी ने किया है। यादवेंद्र जी निरंतर इस तरह की सामग्री की खोज करके उसे हिंदी के पाठकों तक लाने का श्रमसाध्य कार्य करते रहते हैं। यहां प्रस्तुत है उनका किया उस महत्वपूर्ण पत्र के अनुवाद का संपादित अंशः
प्रिय मिसेज बुश,
यह पत्र मैं आपको यह बतलाने के लिए लिख रही हूं कि २४ सितंबर को राष्ट्रीय पुस्तक मेले में एक भाषण देने के आपके निमंत्रण को क्यों नहीं स्वीकार कर सकती, या कांग्रेस लाइब्रेरी में आपके साथ डिनर पर नहीं आ सकती या कि आपके बुलावे पर व्हाइट हाउस में नाश्ते में शामिल नहीं हो सकती।
एक तरह से देखें तो यह बहुत लुभावना निमंत्रण है, 85,000 लोगों के सामने बोलने का मौका बहुत उत्साहित करनेवाला है। व्यक्तिगत स्तर पर किसी भी कवि के लिए नए पाठकों तक पहुंचने का अवसर बेहद प्रेरणादायक होगा और कविता को अपने लक्षित समुदाय तक पहुंचाने की आकांक्षा को साकार रूप में पूरा होते देखने का आनंद बिरले मौकों पर ही मिल पाता है।
फेस्टिवल आफ बुक्स का विचार मुझे अदभुत लगा। मैंने सोचा इस अवसर पर मैं आउटरीच प्रोग्राम के बारे में बात करूंगी-अपनी कुछ किताबें बेचूंगी, कुछ किताबों पर हस्ताक्षर करूंगी और वाशिंगटन डी.सी. के अनेक नागरिकों से मिलने का मौका भी मिलेगा। मुझे लगा कि चाहे आपका अतिथि बनकर ही हो सम्मानपूर्वक अपनी दृढ़ गहराई तक जड़ जमा चुकी भावनाओं से आपको अवगत कराऊंगी कि हमें इराक पर चढ़ाई नहीं करनी चाहिए थी। मैं अपना यह विश्वास भी घोषित तौर पर प्रकट करना चाहती थी कि किसी अन्य देश व संस्कृति पर आक्रमण करना-नतीजे के रूप में हमें अपने बहादुर सैनिकों को और अपने ही घरों में निहत्थे नागरिकों को मौत के मुंह में झोंकना पड़ा-हमारे लोकतंत्र की परंपरा से नहीं बल्कि शीर्ष पर बैठे लोगों के निर्णय से निकल कर आया है और तोड़ी-मरोड़ी भाषा और झूठ का सहारा लेकर इसे जबरन जनता पर थोप दिया गया है। मैं अपना यह डर आपके साथ साझा करना चाहती थी कि हम निरंकुशता और धार्मिक अतिवादिता की ओर कदम बढ़ाने लगे हैं-जबकि एक राष्ट्र के तौर पर हम निरंतर स्वतंत्रता, उदारता तथा विविधता का उदघोष करते हैं।
फेस्टिवल में शिरकत करके मैं अपने विचार तथा पक्ष सार्वजनिक करना चाहती थी कि अपने देश, उसके सिद्धांतों और साहित्य को प्यार करनेवाले अमेरिकी नागरिक के तौर पर मैं इस अघोषित तथा विनाशकारी युद्ध का विरोध करती हूं।
पर इन सारे आकर्षणों के बावजूद मुझे यह गवारा नहीं हुआ कि आपके साथ भोजन करूं। मुझे यह एहसास था कि आपके साथ भोजन करने के लिए बैठने का मतलब होता कि मैं बुश प्रशासन के जंगली और निरंकुश क्रियाकलापों के प्रति मुंह फेर रही हूं, उनको अनदेखा कर रही हूं।
मेरे मन में प्रमुख तौर पर यह विचार आया कि मैं ऐसी प्रथम महिला के हाथों भोजन ग्रहण करने को राजी हो रही हूं जो ऐसे शासन का प्रतिनिधित्व कर रही है जिसने यह युद्ध छेड़ा है और आगे जारी रखना चाहता है, चाहे अदभुत शौर्य प्रदर्शन के तौर पर ही सही।
अनेक ऐसे अमेरिकी हैं जो अपने देश पर गर्व पर करते थे, पर अब वे रक्त, जख्म और दहन प्रेमी मौजूदा शासन को लेकर बेचैन पर शर्मसार हो रहे हैं। आपकी मेज पर साफ-सुथरी मेजपोश तथा इस पर सजाकर रखी गई चमचमाती छुरी-कांटे और मोमबत्ती की लौ की कल्पना करना चाहती थी, पर मेरे लिए ऐसा करना बिल्कुल संभव नहीं हो पा रहा है।
आपकी,
शेरोन ओल्डस

3 टिप्‍पणियां:

हिन्दी साहित्य सभा ने कहा…

बहुत अच्छा

Udan Tashtari ने कहा…

इसे यहाँ प्रस्तुत करने का आभार.

vijay gaur ने कहा…

यादवेन्द्र जी निश्चित ही बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं. आपने ब्लोग पर इसे मुहय्या कराया, आभार. पहली बार आपके ब्लाग पर आना हुआ. अच्छा लगा. और भी पोस्टों के आधार पर कह रहा हूं.