शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

मुंबई की नृशंस घटना पर कराची, पाकिस्तान से हफ़ीज़ चाचड़

पाकिस्तान के कराची शहर में बीबीसी हिंदी सेवा के रिपोर्टर हैं जनाब हफ़ीज़ चाचड़. उन्होंने आज दोपहर हमारे लिए यह लेख लिखकर भेजा है.
इटली से मेरे दोस्त अहमद रज़ा ने फोन कर कहा कि मुंबई में होने वाली अप्रिय घटना नहीं होनी चाहिए थी और जो कुछ हो रहा है, काफ़ी बुरा हो रहा है. उन्होंने मुझे बताया कि पूरी दुनिया के लोग यह सोच रहे हैं कि इसमें पाकिस्तान का हाथ है और इटली सहेत पूरे योरोप में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के या पाकिस्तानी नागरिक अपने आप को दोषी महसूस कर रहे हैं. वे अपना परिचय देते समय पाकिस्तानी कहते हुए डर रहे हैं. उन्होंने यह कह कर फोन बंद कर दिया कि पाकिस्तान और भारत के बीच संबंधों पर मुंबई घटनाक्रम का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.
अहमद रज़ा-जैसे बहुत से पाक-भारत दोस्ती की भावना से प्रेरित पाकिस्तानी मुंबई में होनेवाली गोलीबारी और धमाकों से दुखी हैं और सब का यही विचार है कि आतंकवादी और अतिवादी ताक़तें दोनों देशों की दोस्ती पर आघात है. भारतीय समाचार पत्रों को पढ़ते समय लग रहा है कि मुंबई में हुए हमलों के बाद भारत में गुस्सा, दुख और हताशा दिख रही है और साथ ही झलक रही है सभी भारतीयों की आंखों से बेबसी कि कब तक वो ऐसे हमलों का सामना करते रहेंगे? जब वो 90 के दशक में हुए विस्फोटों को बुरी याद की तरह भुला चुके थे तो 2006 में रेल में हुए विस्फोटों ने मुंबई को एक बार फिर घायल कर दिया. वो ज़ख्म अभी भरे नहीं थे कि मुंबई में सबसे बड़ा 'सुनियोजित आतंकी हमला' हो गया.
इस हमले से व्यापक जन-धन के नुक़सान के साथ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में भारत की प्रतिष्ठा पर इतनी तगड़ी चोट हुई है कि भारतीयों का आक्रोश में हो जाना स्वाभाविक है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मुझे आज एक निर्बल और शक्तिहीन लग रहा है. कुछ मुठ्ठी भर आतंकियों ने भारत के ख़ुफिया तंत्र को चकमा देकर मुंबई में डर और भ्य का माहौल पैदा कर दिया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा खौफनाक हमला तो आजादी के तुरंत बाद कश्मीर में कबायली आक्रमण के रूप में हुआ था. मुंबई में घंटों तक जिस तरह दहशत तारी रही उसकी तुलना बगदाद, काबुल या बेरूत आदि से की जाए तो ग़लत नहीं होगा.
दक्षिण एशिया में पाकिस्तानी जनता आतंकवाद और चरमपंथ से सब से अधिक प्रभावित हुई है और पाकिस्तानियों को आतंक की ओर धकेलने में उन की सरकार का ही हाथ रहा है. पाकिस्तान के अधिकतर बड़े शहर आत्मघाती हमलों, बम धमाकों और आतंकवादी गत्तिविधियों के साक्षी रहे हैं. सरकार ने अमेरिका की ओर से शुरु की गई आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अच्छी भूमिका तो निभाई है लेकिन देश के भीतर अपनी छवि को और ख़राब कर दिया है. मुंबई हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादी लिप्त हैं यह केवल भारतीय नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोग कह रहे हैं.
कुछ महीने पहले जब सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ ने सत्ता को त्याग किया तो उस के तुंरत बाद पाकिस्तान प्रशासित कशमीर में जिहादी गुट फिर से सक्रीय हो गए जिन पर परवेज़ मुशर्रफ ने पांच साल पहले प्रतिबंध लगाया था. सरकार की ओर से इन जेहादी गुटों पर अभी भी प्रतिबंध है लेकिन पाकिस्तान प्रशसित कशमीर सहेत पूरे देश में सक्रीय हो रहे हैं. यही गुट राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की इसेलिए तीखी आलोचना कर रहे हैं क्योंकि उन्हों ने भारत के साथ बहतर संबंध स्थापित करने की कोशिश की है.
पाकिस्तान में जब भी अवामी सरकार का गठन होता है तो भारत एक दम से दुशमन के रुप में सामने आता है और कशमीर मुद्दा गर्माता है. आप को याद हो गा कि 2006 में जब जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार थी तो विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ती जारी कर कहा था कि पाकिस्तान ने कभी भी नहीं कहा कि कशमीर उस का अटूट अंग है. लेकिन अब जबकि यहाँ पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार है तो कुछ तत्व यह कह रहे हैं कि कशमीर तो पाकिस्तान का ही अटूट अंग है. आसिफ़ ज़रदारी के नेतृत्व वाली सरकार ने कई बार कहा है कि वह भारत के साथ अपने संबंधों को और मज़बूत करने के हर संभव प्रयास कर रही है.
पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार और ख़ुफिया एजेंसी ईएसई के बीच घमासान युद्ध चल रहा है. ईएसई पीपुल्स पार्टी की सरकार से इसलिए भी नराज़ है कि उस ने भारत के साथ बहतर संबंध स्थापित करने की बात कही है. कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने जब ईएसई को गृह मंत्रालय के मातहत करने केलिए एक अधिसूचना जारी की थी तो उस ने सरकार को गिराने की धमकी दी थी. प्रधानमंत्री ने 24 घंटों के भीतर अधिसूचना वापस ले ली थी.
कुछ दिन पहले विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने ख़ुफिया एजेंसी ईएसई के राजनीतिक पाथ (Political Wing) को ख़त्म करने की घोषणा की थी जो चुनाव में धांधली और राजनेताओँ को ब्लैकमेल करने में लिप्त रहा है. विदेश मंत्री की घोषणा के थोड़े समय बाद एक वरिष्ट सैन्य अधिकारी ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है.
राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी देश के ख़ुफिया तंत्र पर अपना नियंत्रण चाहते हैं जो कि अभी सेना के पास है, इसलिए ईएसई और सरकार के बीच तनाव है. आसिफ ज़रदारी ने हिंदुस्तान टाईम्ज़ की शिखर सम्मेलन में सेना को उस समय करारा झटका दिया जब उन्हों ने कहा कि पाकिस्तान अपने प्रमाणु हथ्यारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा. कुछ वरिष्ट सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति के इस ब्यान की कड़ी शब्दों में भर्त्सना की और एक ने यह भी कह दिया कि राष्ट्रपति ज़रदारी को इस विषय पर कोई जानकारी नहीं है. सेना को दूसरा झटका तब लग जब उन्हों अपनी पत्नी बेनज़ीर भुट्टो के शब्द दोहराए “There is a little bit of India in every Pakistani and a little bit of Pakistan in every Indian.” और फिर कहा था कि “I do not know whether it is the Indian or the Pakistani in me that is talking to you today.” अहमद रज़ा सहेत बहुत से पाकिस्तानियों ने भारत पाकिस्तान के संबंधों के इस नए युग का स्वागत किया और यदि कोई नराज़ हुए तो वह हैं जेहादी गुट.
मुंबई में आतंकियों ने भारत और पाकिस्तान की दोस्ती पर हमला किया है और राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी को संदेश दिया है कि वह भारत और पाकिस्तान की दोस्ती को किर्चुं में भिखेरने की शक्ति रखते हैं. मुंबई में आतंक का कब्जा हो जाने के बाद भले ही दोनों देशों के नेतृत्व आतंकवाद के खिलाफ कुछ कड़े शब्द कहे हों, लेकिन यथार्थ यह है कि पिछले साढ़े चार साल में दोनों देशों के मान-सम्मान से खिलवाड़ करने वाले आतंकी संगठनों का दमन करने से जानबूझकर बचा गया. एक सच्चाई यह भी है कि दोनों देशों ने कभी भी मन, वचन और कर्म से आतंकवाद से मिलजुलकर लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं प्रदर्शित की.
जब तक आतंकवाद का एक जुट हो कर मुक़ाबला न किया गया तो मुंबई जैसी घटनाएँ फिर होनी के संभावना है. आतंकवाद और चरमपंथ का एक जुट हो कर मुक़ाबला करने में ही दोनों देशों केलिए भलाई है. यही वह उपाय है जिससे दोनों जनताओँ के स्वाभिमान की रक्षा हो सकती है.

1 टिप्पणी:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

शुक्रिया पंकज जी, ऐसे मातम के समय पड़ोस मुल्क की आवाज को सुनाने के लिए और जनाब हफीज साब को।

हफीज की कई बातों से सहमत हूं। जिस पर सहमत हूं, उस ही उठाना चहात हूं। यह समय विवादों को तूल देना का नहीं है, ऐसा मेरा मानना है।

हफीज ने कहा है कि दोनों मुल्क आतंकवाद के खिलाफ जंग के लिए मुस्तैद नहीं है. उनहोंने कहा- भले ही दोनों देशों के नेतृत्व आतंकवाद के खिलाफ कुछ कड़े शब्द कहे हों, लेकिन यथार्थ यह है कि पिछले साढ़े चार साल में दोनों देशों के मान-सम्मान से खिलवाड़ करने वाले आतंकी संगठनों का दमन करने से जानबूझकर बचा गया. एक सच्चाई यह भी है कि दोनों देशों ने कभी भी मन, वचन और कर्म से आतंकवाद से मिलजुलकर लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं प्रदर्शित की.

सहमत हूं।