शनिवार, मार्च 17, 2007

सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं

फ़िराक़ की ग़ज़ल में वह भारत जागता हुआ महसूस होता है, जो उनसे पहले, कबीर की शब्दावली में जगमगाता था, गुरू ग्रंथ साहब में मुस्कुराता था, अकबर के दीन-ए-इलाही में झिलमिलाता था या नजीर अकबराबादी के काव्य में. फ़िराक़ ने तहज़ीब की जिस आत्मा से अपनी ग़ज़ल को सजाया था उसके संबंध में खुद उनका शेर है,

सरज़मीने हिंद पर अक़बामे आलम के फ़िराक़
क़ाफिले बसते गए, हिंदोस्ताँ बनता गया
फ़िराक़ साहब सिर्फ शायर नहीं थे. अपने समय के बड़े आलोचक भी थे. शास्त्रीय शायरों पर उनके लेख, साहित्य को नए सिरे से पढ़ने और समझने की कामयाब कोशिशें मानी जाती है.

फ़िराक़ के ज़हन को कई भाषाओं की रौशनियों ने रौशन किया था. इनमें हिंदी, उर्दू, फ़ारसी और संस्कृत के साथ अंग्रेज़ी का भी नाम है. वह महात्मा गाँधी, पंडित नेहरू, अबुल कलाम आजाद, मौलाना हसरत मोहानी, महाकवि निराला, डॉ राधाकृष्ण आदि के युग की एक बड़ी शख़्सियत थे. क़ुदरत की इस मेहरबानी का उन्हें एहसास भी था.
आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों

जब ये ख्याल आयेगा उनको,तुमने फ़िराक़ को देखा था
शायरी और आलोचना के अलावा उनकी बातचीत करने का तरीक़ा हर बार नया तजुर्बा होता था. वह गुफ़्तगू को हास्य की ज़हानत और व्यंग्य की हसरत से ऐसे मिलाते थे कि सुनने वाले लोट-पोट हो जाते थे.
मैं जब उनसे मिला था तब वह उम्र की उस मंज़िल में दाख़िल हो चुके थे, जब वह कहीं खुद नहीं आते थे लाए जाते थे, जहाँ वह बैठते थे वहाँ बिठाए जाते थे, जहाँ से वह उठना चाहते थे वहाँ से उठाए जाते थे.
लेकिन इस बुज़ुर्गियत के बावजूद, उनके हाथ से सिगरेट, बदन से शेरवानी, गोल गोल घूमती हुई आखों से हैरत, बातचीत से ज़हानत कभी रुख़सत नहीं हुई.

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो
तुम को देखें कि तुम से बात करें

और
कहाँ का वस्ल तनहाई ने शायद भेस बदला है

तेरे दम भर के आ जाने को हम भी क्या समझते हैं



फिराक गोरखपुरी की ग़ज़लें
पहली ग़ज़ल
सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क-ए-मुहब्बत का भरोसा भी नहीं
यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवान-ए-इश्क
मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं
मुद्दतें गुजरी तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
ये भी सच है कि मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर
ये भी सच है कि तेरा हुश्न कुछ ऐसा भी नहीं
दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में
लेकिन इस जल्वागाह-ए-नाज से उठता भी नहीं
बदगुमां होके न मिल ऐ दोस्त जो मिलना है तुझे
ये झिझकते हुए मिलना कोई मिलना भी नहीं
मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह मुझसे तो मेरी रंजिश-ऐ-बेजा भी नहीं
बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मकाम
कुंज-ए-जिन्दा भी नहीं बौशाते सेहरा भी नहीं
मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि फिराक
है तेरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं
दूसरी ग़ज़ल
ये तो नहीं कि गम नहीं
हाँ मेरी आँख नम नहीं
तुम भी तो तुम नहीं हो आज
हम भी तो आज हम नहीं
अब न खुशी कि है खुशी
गम का भी अब तो गम नहीं
मौत अगरचे मौत है
मौत से जीस्त कम नहीं
फिराक गोरखपुरी

2 टिप्‍पणियां:

Manish ने कहा…

अच्छा लगा यहाँ फिराक के बारे में पढ़कर !
"ये तो नहीं की गम नहीं" मेरी पसंदीदा गजल रही है । चित्रा सिंह की आवाज में ये और भी जीवंत लगती है ।

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

बहुत बढिया लगा आप के ब्लाग पर आ कर आप को पढना आगे भी आते रहेंगे. इसी तरह लिखते रहिये..
मेरे ब्लाग पर भी कभी तशरीफ लाईये.... http:// dilkadarpan.blogspot.com