बुधवार, दिसंबर 02, 2009

किससे डरते हैं पाकिस्तानी फौजी शासक?


क्या पाकिस्तानी फौजी तानाशाह अमेरिका से डरते हैं? नहीं। भारत से डरते हैं? नहीं। तब वे किससे डरते हैं? आपको जानकर हैरत होगी वे कद्दावर और जनप्रिय शायर से डरते हैं। मुझे भी पाकिस्तान में यह देखकर हैरत हुई कि जो परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान में किसी को कुछ नहीं समझते थे, वे मरहूम अहमद फराज साहिब का न केवल एहतराम करते थे, बल्कि उनसे डरते भी थे। इसी तरह फै़ज अहमद फै़ज से वहां के फौजी तानाशाह डरते थे। शायरी की ताकत से डरते थे।

पिछले साल मैं पाकिस्तान गया था। जियो टीवी के पत्रकार मेरे दोस्त जनाब अब्दुर रऊफ साहिब ने इस्लामाबाद में मेरे ठहरने का इंतिजाम कर दिया था। जहां मैं ठहरा था वहां से डेनमार्क दूतावास बिल्कुल पास था, मात्र सौ मीटर की दूरी पर। वहां से मैंने इंतिजार हुसैन (उर्दू के मशहर कथाकार) साहिब को लाहौर फोन मिलाया और औपचारिक दुआ-सलाम के बाद इस्लामाबाद में रह रहे मशहूर इन्कलाबी शायर अहमद फराज साहिब का फोन नंबर मांगा। जो उन्होंने तत्काल दे दिया। फराज साहिब ने कहा कि पनकज साहिब (ठेठ उर्दू वाले पंकज का इसी तरह उच्चारण करते हैं), आप पांच बजे शाम को हमारे गरीबख़ाने पर तशरीफ लाएं। कुछ और दोस्त भी आ जाएंगे। तो मैंने उन्हें कहा कि ठीक है फराज साहिब, पर रात डिनर के लिए हमें आठ बजे तक एवान-ए-सदर पहुंचना है। तो उन्होंने कहा बिल्कुल जनाब आपको सही वक्त पर हम वहां पहुंचा देंगे। सदर साहिब ने इस खाकसार को भी दावत दी है सो हम लोग साथ चले चलेंगे। मुझे लगा ये तो बहुत अच्छा हो गया। फराज साहिब से भेंट भी हो जाएगी और वहीं से उनके साथ डिनर में चले जाएंगे। यहां यह बताते चलें कि पाकिस्तान में भारत के मुकाबले महंगाई इतनी अधिक है मेरे तो पसीने छूट गए। दो किलोमीटर भी जाएंगे तो वहां आटो का किराया दो सौ से कम नहीं मांगते हैं।

फराज साहिब के यहां पहुंचे। तीन-चार और लोग आ गए। बातचीत होने लगी। शराब का दौर शुरू हो गया। फराज साहिब रोज पीने वालों में से थे और यह बात सबको मालूम थी। हँसी-कहकहों में कब आठ बज गए पता ही नहीं चला। मैंने धीरे से कहा, फराज साहिब, जरा जल्दी करें। आठ तो यहीं बज गए। इस पर फराज साहिब ने बहुत बेफिक्री से कहा कि बजने दो यार, जब हम पहुंचेंगे तभी आठ बजेगा एवान-ए-सदर में।

...और सवा नौ बजे हम तत्कालीन फौजी तानाशाह परवेज मुशर्रफ के एवान-ए-सदर में पहुंचे और मुझे बहुत हैरत हुई कि वाकई जब तक अहमद फराज साहिब नहीं पहुंचे, तब तक परवेज मुशर्रफ ने खाना शुरू नहीं होने दिया था। फराज साहिब से दुआ-सलाम के बाद मुशर्रफ ने जरा तंज़ करते हुए कहा अरे फराज साहिब आप बिल्कुल सही वक्त पर तशरीफ लाए। इस पर फराज साहिब ने नहले पर दहला मारा, हां, सदर साहिब, ये इंडिया से हमारे दोस्त आए हैं और इनको आपके यहां डिनर में आने की जल्दी थी, सो जरा पहले ही आ गए। मेरी हालत ये थी कि मैं एक बार परवेज मुशर्रफ की ओर देखूं तो दूसरी ओर फराज साहिब की ओर। मुशर्ऱफ झेंप गए थे।

2 टिप्‍पणियां:

जी.के. अवधिया ने कहा…

सुन्दर संस्मरण!

पाकिस्तान से सम्बन्धित आपके लेख पढ़ कर बहुत सी नई जानकारियाँ मिलती हैं। धन्यवाद!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बहुत ही सुन्दर एवं रोचक लगा आपका ये संस्मरण्!!! कुछ नया भी जानने को मिला....
धन्यवाद्!