शनिवार, दिसंबर 26, 2009

हम सब डटे रहेंगे यहीं इसी धरती पर साथी

1988 में सैनिक तानाशाही ने बर्मा में लोकतंत्र को कुचल दिया। इसका मुखर विरोध छात्रों और नौजवानों ने किया। आज तक इस देश में सैनिक तानाशाहों का लौह-शिकंजा सीधी-सादी जनता को लहूलुहान कर रहा है। 1988 के जन उभार के ज्यादातर नायक आज भी जेल में बंद हैं, जो देश की सीमा लाँघ सके वे दूसरे देशों से भूमिगत आंदोलन का संचालन अब भी कर रहे हैं। इन नौजवान आंदोलनकारियों में अनेक कवि-कहानीकार हैं। ऐसे ही कुछ आंदोलनकारी कवियों की कुछ कवितायेँ यहाँ प्रस्तुत हैं। अपने वायदे के मुताबिक बड़े भाई यादवेन्द्र जी ने तय वक्त पर कुछ और बर्मी कविताएं अनूदित करके हमें भेजीं।

टूटे सितारों की संतान

- मिन को नाइंग

साथी, तुम अपने विश्वासों को
इस तरह पालते-पोसते रहे
जैसे हों वे तुम्हारी अपनी ही संतानें-
साथी, तुमने अनवरत जलाये रखी
लौ अपने जख्मों की
जैसे हों वे लम्बी बत्ती वाली प्रकाशमान ढिबरियां

साथी, तुम सहलाते रहे अपने जख्म
अपनी जीभ से ही निरंतर
और सीख लिया कैसे रहा जाता है
जीवित काल से परे जा कर भी...

साथी, तुमने उधेड़ ली अपनी चमड़ी
धारदार कर ली अपनी हड्डियाँ
नुकीली सुइयों-सी
और इनसे ही सिल लिए अपने लिए
सही नाप के सुन्दर लुभावने परिधान...

साथी, ठहरो मेरे साथी
संवारना जितना मुमकिन हो पाए
इस धरती की ठेसों और जख्मों को
जिस पर टूट-टूट कर गिरते रहते हैं अनगिन तारे
पर साथी, हम सब डटे रहेंगे इसी धरती पर...

आगे बढ़ो साथी
हम अपनी अपनी हथेलियों से ढांपे, रोके रखेंगे
धरती के अंदर का ताप
जिस पर कितने भी क्रुद्ध होकर
क्यों न चलते रहें अनेकों सूर्य
अपने-अपने कोप के बाण
पर साथी, हम सब डटे रहेंगे यहीं इसी धरती पर...

पहले कदम तुम बढ़ो साथी
निर्मित करो विषय-सूची वाला पहला पृष्ठ
कि तुम्हारे गीत ही प्रवहमान हों
धरती के शोकाकुल ग्रामोफोन के गर्भ से...
साथी, हम सब डटे हुए हैं यहीं इसी धरती पर...

साथी, तुम आगे बढ़ते जाओ अपने दृढ़ कदम
जब मयूरध्वज* सिर उठाकर फहराएगा
लहराएगा फिर से आसमान में
हमारे विश्वविद्यालयों के उन्नत परकोटों पर...
हम सब डटे रहेंगे यहीं इसी धरती पर साथी...

*मयूर ध्वज बर्मा के राष्ट्रीय सम्मान का पारंपरिक प्रतीक है।


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1988 के क्रांतिकारियों की कविताओं की वेबसाइट से साभार, जिसमे सुरक्षा कारणों से कवि का नाम उजागर नहीं किया गया है...

तुम किस से करते हो प्यार?

सैनिकों
तुम पैदा हुए थे
अपनी माँ के कोख से
या फिर तानाशाह के गर्भ से???

सैनिकों
तुम्हे सचमुच कौन करता है प्यार?
तुम्हारी माँ?
या वो तानाशाह?

किसी को चाहिए सौंदर्य
किसी को चाहिए दौलत
किसी को चाहिए सत्ता...
तुम दे दो यदि सत्ता पूरी तरह
खुद में सिमटे हुए एक इंसान के हाथ
क्या ये होगा ठीक और मुनासिब?

यदि तानाशाह फरमान जारी कर दे
तो क्या तुम बोलने लगोगे?
क्या तुम लिखने लगोगे?
क्या तुम काम करने लगोगे?
क्या तुम चलाने लगोगे गोलियां अंधाधुंध?

भेड़ें चल देती हैं सामने जाती भेड़ों के पीछे-पीछे
बगैर जाने कि जाना कहाँ हैं..
क्या सेना भी चल पड़ेगी भेंड चाल से
पीछे पीछे तानाशाह के
बंद किये किये अपनी दोनों आँखें?
या सोच-समझ कर तार्किक ढंग से
बनाएगी अपना रास्ता?

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जुलाई की बारिश

(शहीद आन्दोलन कारियों कि स्मृति में)

-ने यू

झमाझम बरसते पानी में
एक लड़की प्रवेश करती है कैम्पस में
पहने हुए लाल..रक्त की तरह दमकता हुआ लाल
पर नहीं दिख पा रही है उसकी पूरी-पूरी शक्ल

बहुत जल्दी जल्दी वो चलती जा रही है
तेज कदमों से...
अब, वो दिख रही है कुछ पास
पहनावा भी दिख रहा है साफ़-साफ़
लाल रंग उसे पसंद ही नहीं है
बल्कि वो लिपटी हुई है लाल रक्त से
और जुलाई की मूसलाधार बारिश भी धो नहीं पा रही है
उसका लाल रंग...

वो दौड़ने लगी अब
किसी को ढूंदती हुई जैसे
शायद किसी प्रेमी को
जुलाई की बारिश और निष्ठुर हो कर गिरने लगी
आखिर कहाँ जाए वो इस बारिश से बचने?

सोचा उसने और भाग कर आ गयी
जहाँ उसने बातें की थी अपने प्रेमी से
जहाँ उसने दोस्तों के साथ पढाई की थी
जहाँ उसने आजादी के लिए लड़ीं थी लड़ाइयाँ
वही अंत में मिल गया उसे उसका प्यार..

बरसता जा रहा है निष्ठुर पानी
एक लड़की भाग कर घुस गयी इस इमारत में
बदन पर पहने हुए रक्त..सुर्ख लाल रक्त
पर अब वो अकेली नहीं दिख रही
उसके साथ दिख रहे हैं उसके ढेर सारे साथी
और उसका प्रेमी भी

ये सब वो हैं जो मरे नहीं कभी
जुलाई की बारिश भी
उन्हें कभी धो मिटा नहीं पाई
बार बार अपना जोर आजमाती रही फिर भी नहीं
उनका रक्त यूँ ही बर्बाद होता रहा हर बार
पर न तो आजादी की दीवानगी चुकी कभी
और न ही इन्तजार ख़त्म हुआ
कभी आजादी के दिन का...

-अनुवाद-यादवेन्द्र, डॉ.मैंट जान के अंगरेजी अनुवाद पर आधारित।

4 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Shaandar Raachna.

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क्या आपने लोहे को तैरते देखा है?
पुरुषों के श्रेष्ठता के 'जींस' से कैसे निपटे नारी?

परमजीत बाली ने कहा…

बढ़िया रचनाएं प्रेषित की हैं।आभार।

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छे अनुवाद और भाव हैं.

अनिल कान्त : ने कहा…

यह तो ख़ज़ाना है.
अच्छी रचनायें पढ़कर दिल खुश हो जाता है.