बुधवार, दिसंबर 16, 2009

बोधिवृक्ष पर वीर्यपात करता हुआ...बिहार


सुशासन बाबू के सकर्मक दुष्प्रचार के कारण पिछले चार सालों से बिहार में गोयबल्स की आत्मा कराह रही है। निरंतर जारी मीडियाई यशोगान के कारण झूठ के बोझ तले सच घायल करहा रहा है। पत्रकार सोमरस में मदमस्त मुर्गे की टांग नोंच रहे हैं और अखबारों-न्यूज चैनलों के मालिकान आठ-आठ, दस-दस पेज के विज्ञापन पाकर.

कुछ तथ्यों पर गौर फरमाने से सुशासन बाबू के बिहार के विकास की असलियत सामने आ जाती है।
यहां की 90 प्रतिशत आबादी कृषि पर आश्रित है, मगर कृषि के क्षेत्र में विकास लगातार गिरती चली जा रही है।

वर्ष-2004—2005—4.47 प्रतिशत इकोनोमी ग्रोथ कृषि के क्षेत्र में था। जबकि 2005-2006—3.66प्रतिशत। 2006—2007 में यह गिरकर 1.62 प्रतिशत रह गया है।
देख लिया न सुशासन बाबू के यहां कैसा विकास चल रहा है।
जहां तक विकास दर का सवाल है, तो वह 4.06 प्रतिशत से बढकर 11.13 दिखाया जा रहा है। लेकिन आंकड़ों की बाजीगरी के महारत हासिल होने के बावजूद सुशासन बाबू उद्योगों के विकास के बारे में कुछ भी नहीं बताते. चरण-वंदना में नित नए आयाम स्थापित करने वाली संस्था आद्री ने लिखा हैं कि यह बढ़ोतरी शहरों में भवन निर्माण में तेजी आने के कारण हुई हैं। वहीं टेलीकम्युनिकेशन, बैंकिग और ट्रांसपोर्ट के क्षेत्र में .10 प्रतिशत की बढोतरी दिखायी गयी है। अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की माने तो यह ग्रोथ काले धन के फ्लो को दिखा रहा हैं।
...और यह हकीकत भी जान लीजिए कि क्यों राग दरबारी गाने में मस्त है बिहार की मीडियाः

सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक पिछले चार सालों में सुशासन बाबू की सरकार ने पचास करोड़ रूपये का प्रिंट मीडिया को और तीन करोड़ रूपये का इलेक्ट्रानिक मीडिया को विज्ञापन जारी किया है। अन्य माध्यमों को जारी किए गए विज्ञापनों को जोड़ दें, तो लगभग सौ करोड़ रूपये सरकार के उपलब्धियों की चर्चा के लिए घोषित तौर पर विज्ञापन पर खर्च किए गए हैं. अघोषित तौर पर मीडिया मैनेजमैंट के लिए जो-जो धतकरम किए जा रहे हैं, उसकी तो खैर यहां चर्चा ही नहीं की गई है।

सोचने की बात यह है कि जिस प्रदेश की आधी से अधिक आबादी की औसत आमदानी रोजाना बीस रुपये से कम है, वहां सरकार प्रचार-प्रसार पर सौ करोड़ रुपये खर्च करती है। ...और अभी तो चुनाव को एक साल बाकी है और बाकी है चुनाव से पहले जारी होने वाले विज्ञापनों की लंबी कड़ी।

कृष्णमोहन झा की एक कविता, जिसका शीर्षक है बिहार, आप गौर फरमाएं-

गंगा की जीभ पर
लगातार गिरता हुआ
न्याय का मवाद
हर आकुल पुकार के बाद
बोधिवृक्ष पर वीर्यपात करता हुआ...



(आंकड़े तूती की आवाज ब्लाग से साभार)

3 टिप्‍पणियां:

vyomesh ने कहा…

ऐसी वाचाल सरकारों पर लगातार निगाह रखी जानी चाहिए. यों ही. शुक्रिया पंकज भाई.

गिरिजेश राव ने कहा…

भैया, शीर्षक खतरनाक लग रहा है। जाने क्यों आशंका सी हो रही है। .. आगे आप जैसा उचित समझें।
अन्यथा न लें। बस साझा कर रहा हूँ। कोई और बात नहीं है।
ई मेल नहीं मिल पाया। मिल जाता तो टिप्पणी नहीं करता, मेल ही भेजता।

गिरिजेश राव ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.