रविवार, दिसंबर 07, 2008

इंसानियत के बौने पड़ते जाने का बराबर डर बना रहा

छह दिसंबर एक उदास और नजरअंदाज कर दिये जाने लायक आम तारीख की तरह बीत गया, जो एक बड़ी राहत की बात है। देश-विदेश के अधिकांश आम जनों के लिए हर तारीख की तरह महज एक आम तारीख, मगर इतिहास की स्मृतियों और अस्मिता के घावों को बार-बार खरोंचने की सियासत करने वालों के लिए खास तारीख। आतंकवाद के बढ़ते संजाल के कारण देश इस वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक गंभीर मंथन के दौर से गुजर रहा है, मगर ऐसे दौर में भी क्षेत्रीय, जातीय और धार्मिक संरचनाओं को तार-तार करने वाली वाचाल राजनीति लिहाजों से बिल्कुल परे जाकर निजी स्वार्थों को तरजीह दे रही है। अयोध्या के पूरे घटनाक्रम को लेकर सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं, अपना-अपना पक्ष है और उनके पक्ष-विपक्ष के बीच फंसा हुआ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र निरुपाय-सा लगता है।


नारों, जुलूसों और अतिवादी-अस्मितावादी राजनीति के कारण जब भी दंगे-फसाद होते हैं, आतंकी हमले होते हैं, तो सियासत से मजहब से कोसों दूर देश के दिहाड़ी मजदूर, गरीब कामकाजी वर्ग के लोग ही इसकी बलि चढ़ते हैं। पिछले कुछ समय से विजय और दुख व्यक्त करने वालों के पाटन में पिछले एक-डेढ़ दशक से पिसने वाली गरीब जनता कल भी रोटी के लिए जीवन-संघर्ष करने निकलेगी, मगर मजहब की सियासत के कारण इंसानियत के बौने पड़ते जाने का बराबर डर बना रहा। ताजा जनगणना रिपोर्ट को देखें तो इस देश में स्कूल और अस्पतालों की संख्या से ज्यादा धार्मिक स्थल हैं, मगर और-और धार्मिक स्थलों के निर्माण की अनंत कड़ी अनवरत जारी है। वह सामाजिक ताना-बाना, जिसमें एक के बगैर दूसरे का बिल्कुल काम नहीं चलता था, अब इतिहास बनता जा रहा है। वर्तमान राजनीति का यह सबसे डरावना पक्ष है कि जब अदालतों में लाखों मुकदमे लंबित हैं और सालों से लोग न्याय की बाट जोहते रहते हैं, तब अदालतों और संवैधानिक प्रक्रिया से बाहर सियासत के खुदमुख्तार काजी अपनी शैली में इंसाफ करने में मुब्तिला हैं। छह दिसबंर, 1992 के बाद से आज तक देश के अनेक भागों में, अनेक तरीकों से वे अपने-अपने हिसाब से इंसाफ कर रहे हैं। उनके इंसाफों से घायल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र डिगते आत्मविश्वास और हिलती हुई बुनियाद के कारण संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।


विभाजनकारी राजनीति के कारण पहले देश टुकड़ों में बंटा, पांच लाख लोग तब सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए थे और तकरीबन दस लाख लोग बेघरबार हुए थे। जिसका घाव अब भी बुजुर्गों के सीने में हरा हो जाता है। वक्त का तकाजा यह है कि विजय और दुख व्यक्त करने वालों और उनसे अलग अपनी कथित प्रतिबद्धताओं के कारण उनकी आलोचनाओं में मुब्तिला लोगों को अब भी उस देश के बारे में सोचना चाहिए, जिसमें प्रत्येक नागरिक को निर्भीक, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक तरीके से जीने का हक हो. पता नहीं यह सपना कब सपना से हकीकत में बदलेगा?