मंगलवार, दिसंबर 30, 2008

सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान प्रतिबंधित होने का साल


वर्ष 2008 तंबाकू उत्पादों के खिलाफ जारी मुहिम को मिली सफलता के लिए भी याद किया जाएगा। दो अक्तूबर से देश भर में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान रोकने संबंधी अधिनियम लागू हो गया। सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान को प्रतिबंधित करने संबंधी केंद्र सरकार के इस अधिनियम के विरोध में तंबाकू कंपनियों की ओर से कई याचिकाएं उच्चतम न्यायालय में दाखिल की गई थीं, जिन पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार की अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इस वजह से संशोधित सिगरेट और अन्य उत्पाद अधिनियम-2008 के तहत सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर पूर्ण प्रतिबंध लागू कर पाना संभव हुआ। इसके तहत सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान करते हुए पकड़े जाने पर दो सौ रुपये जुर्माने का प्रावधान है। इस अधिनियम की सफलता के बाद और आगे आते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने घोषणा कि भविष्य में पुलिस अधिकारियों के अलावा गैर सरकारी संगठनों तथा रेलों में चल टिकट परीक्षकों को भी धूम्रपान करने वालों को जुर्माना करने का अधिकार दे दिया जाएगा.



तंबाकू उत्पादों से होनेवाली बीमारियों के मामले में वैधानिक चेतावनी के साथ खतरे का निशान प्रकाशित करने को लेकर हालांकि अभी तक सफलता नहीं मिली पाई है। तस्वीर के रूप में वैधानिक चेतावनी छपने के बाद धूम्रपान के खतरों से अनजान उन गरीब और अशिक्षित लोगों को फायदा होगा जो तंबाकू उत्पादों पर लिखी चेतावनी नहीं पढ़ सकते। इसके लिए किए जा रहे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के प्रयासों की तारीफ विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी की। सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान करने वालों की वजह से उन लोगों को बहुत परेशानी उठानी पड़ती है, जो धूम्रपान नहीं करते और अकारण धूम्रपान संबंधी बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं। इसलिए तमाम लोगों के बीच केंद्र सरकार का यह अधिनियम इस साल चर्चा के केंद्र में रहा। धूम्रपान भारत में किस तरह एक महामारी का रूप लेता जा रहा है, इसको लेकर जारी एक आकंड़े में बताया गया है कि धूम्रपान की वजह से 2010 तक हर साल लगभग 10 लाख लोगों की मौत होने लगेगी और इसमें आधे गरीब और अशिक्षित लोग होंगे। इस अध्ययन से यह तथ्य सामने आया कि बीमार पड़ने से पहले केवल दो फीसदी लोग ही धूम्रपान छोड़ते हैं। धूम्रपान के विरुद्ध अधिनियम पारित हो जाने की सफलता के बाद इसको लागू करने को लेकर सरकार को अभियान चलाना चाहिए, क्योंकि नियम जब व्यवहारिक स्तर पर लागू नहीं होते तो धीरे-धीरे निरर्थक होने लगते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदॉस की सक्रियता की वजह से पारित अधिनियम के बाद आगामी समय में अब कार्यपालिका की सक्रियता ही इस अधिनियम को सार्थकता प्रदान कर पाएंगी।

2 टिप्‍पणियां:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

theek kaha sir aapne

Amit ने कहा…

बहुत सही जानकारी दी आपने