सोमवार, दिसंबर 15, 2008

शहीदों के प्रति संवदेनहीनता की हद

दो दिन पहले इस जन गण के भाग्य विधाता आतंक के खिलाफ संसद में एकजुटता की बात कर रहे थे, मगर अगली सुबह संसद पर आतंकवादी हमले में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए उंगलियों पर गिनने लायक सांसद भी नहीं पहुंचे। हैरानी की बात यह है कि इस मौके पर प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी, सोमनाथ चटर्जी-जैसे कुछ बड़े नेता ही मौजूद थे, बाकी सरकार के तमाम मंत्री, सांसद और विपक्ष के बड़े नेता नदारद थे। बड़े राष्ट्रीय दलों में से एक ने इसे अक्षम्य माना और दूसरे इसका कारण सप्ताहांत के अवकाश को माना। इस वक्त पूरे देश में शहीदों के प्रति लोग भावुक हैं और उनके बलिदान के कारण नत हैं, मगर जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले मंत्रियों-सांसदों ने इस जन भावना का आदर नहीं किया। संसद की बैठकों, बहसों में बेहद कम भागीदारी सांसदों के लिए अब आम बात हो चुकी है, लेकिन मुंबई हमले के बाद शहीदों के प्रति राजनेताओं की ऐसी संवेदहीनता बेहद क्षोभ का विषय है। आतंकवादियों ने जितनी तैयारी के साथ संसद पर हमला किया था, वे अगर मुंबई के ताज और ओबेरॉय होटल की तरह संसद के भीतर जाने में कामयाब हो जाते, तो उस भयंकर तबाही का शायद हम अनुमान भी नहीं लगा सकते कि क्या हो जाता! अपर्याप्त और निम्न स्तरीय संसाधनों के बावजूद लोकतंत्र की अस्मिता की रक्षा करने वाले बहादुर जवानों के प्रति जन प्रतिनिधियों की गैर मौजूदगी से लोगों के बीच ऐसा संदेश गया कि उनके मन में शायद उन जाबांज जवानों के प्रति आदर की कमी है। दिल्ली के बाटला हाउस इलाके में हुई मुठभेड़ को बहुत अरसा नहीं बीता है, मगर उस मुठभेड़ में शहीद दिल्ली पुलिस के बहादुर इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के परिवार वालों की मानें, तो उनके विभाग और सरकार दोनों के मन में वैसी भावना का अभाव अब साफ झलकती है, जो उसने शुरू में िदिखाई थी। शायद इन्हीं वजहों से आतंकवादी हमलों के तत्काल बाद शहीद जवानों के घरवालों के लिए अनेक तरह की घोषणाएं करने वाले नेताओं पर से आम जनता का भरोसा कम हो रहा है। मुंबई हमले के बाद देश भर के लोगों ने जिस तरह अपना दुख और आक्रोश जाहिर किया, उसके बाद क्या हमारे नेताओं के मन में शहीद जवानों के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा हुआ है? ऐसा लगता है कि राजनेताओं ने देश के वीर जवानों को बेहद अपर्याप्त संसाधनों और विषम परिस्थितियों के बीच अपने कत्र्तव्य का निर्वहन के लिए छोड़ दिया है। यदि ऐसा न होता तो सियाचिन की जानलेवा ठंड में सीमा पर तैनात जवानों को पुराने और फटे-चिथड़े कपड़े की जगह नये और बेहतर कपड़े दिये जाते, मुंबई हमले में शहीद होने वाले जवानों को बेहतर बुलेटप्रूफ जैकेट और हथियार दिये जाते। बेहतर होता कि सरकार आतंक से लड़ने के उपायों की घोषणा करते समय इन बातों पर भी गौर करती कि यदि कोई जवान आतंकी हमलों में शहीद हुआ, तो कृतज्ञ राष्ट्र उनके परिवार को किसी भी तरह से असहाय नहीं महसूस करने देगी।

1 टिप्पणी:

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

भावों और िवचारों का प्रखर प्रवाह है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है-आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com